इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि प. बंगाल की मुख्यमन्त्री सुश्री ममता बनर्जी देश की एेसी राजनीतिज्ञ हैं जिन्होंने जमीन पर संघर्ष करके लोकतान्त्रिक व्यवस्था में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है और अपने राजनीतिक सिद्धान्तों के प्रति समर्पित रहते हुए अपने राज्य से लम्बी वामपंथी सत्ता का खात्मा करने में सफलता प्राप्त की है। ममता दी की खासियत रही है कि वह वर्तमान राजनीति की सभी वर्जनाओं के बीच अपनी सफलता का रास्ता इस प्रकार बनाती हैं कि उनके विरोधी आश्चर्यचकित होकर नई बनी परिस्थितियों में अपनी भूमिका तलाशते रह जाते हैं। पिछले दिनों से उन्होंने जिस प्रकार देश के चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोला है उसे भी उन्होंने अपने अन्दाज में एक नया आयाम देते हुए सड़क से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक नई परिभाषा दी और सिद्ध किया कि वह जब कोई सैद्धान्तिक लड़ाई छेड़ती हैं तो उसमें सीधे जनता की भागीदारी को प्रमुख बनाकर ही संघर्ष करती हैं।
पूरे भारत को मालूम है कि ममता दी चुनाव आयोग द्वारा उनके राज्य में की जा रही गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण के विरुद्ध है और उनका मानना है कि जो कार्य अतीत में दो वर्ष के भीतर पूरा होता था उसे चुनाव आयोग केवल तीन महीने के भीतर ही पूरा करा रहा है अतः इस प्रक्रिया में एेसी गलतियां होना स्वाभाविक है जिनका असर सामान्य मतदाताओं पर पड़े बिना नहीं रह सकता। इस मामले में मूल प्रश्न यह है कि चुनाव आयोग एक एेसी स्वतन्त्र व संवैधानिक संस्था है जो अपना कार्य सीधे संविधान से शक्ति लेकर करती है। इस काम में कोई भी और किसी भी दल की देश में स्थापित सरकार किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। अतः चुनाव आयोग को ममता दी द्वारा दी गई चुनौती का अपना संवैधानिक महत्व है। इस सिलसिले में यह समझे जाने की सख्त जरूरत है कि चुनाव आयोग भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की पुख्ता जमीन तैयार करने के लिए जिम्मेदार इसी शर्त पर होता है कि देश के प्रत्येक जायज नागरिक के पास एक वोट देने का अधिकार पूर्णतः सुरक्षित रहेगा जिससे वह इसका प्रयोग करके देश के लोकतन्त्र में सहभागिता कर सके और सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सके। ममता दी का मूल तर्क यही है कि चुनाव आयोग गहन पुनरीक्षण लोगों को मताधिकार देने के लिए नहीं बल्कि उनके इस अधिकार को काटने के लिए कर रहा है। इस सन्दर्भ में उनकी सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं पहले से ही दायर थीं मगर उन्होंने कल एक निजी याचिका भी दायर की और दलील दी कि पुनरीक्षण के जरिये भारत के लोगों के मूलभूत अधिकारों का हनन किया जा रहा है। इस मामले में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अपनी पैरवी खुद भी की और न्यायाधीशों के समक्ष अपने तर्कों को प्रस्तुत किया।
स्वतन्त्र भारत में यह पहला मामला है कि जब किसी राज्य के मुख्यमन्त्री ने अपने मुकदमे की पैरवी खुद की हो। इससे उनकी उस दृढ़ इच्छा शक्ति का पता चलता है कि वह जिस काम को पकड़ लेती हैं उसे पूरा करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देती हैं। उन्होंने अपनी याचिक में कहा है कि चुनाव आयोग मतदाता पुनरीक्षण के जरिये उनके राज्य को निशाना बना रहा है और इसके लोगों पर मनमानी थोप रहा है। ममता दी के इस प्रकार से वकील रूप में प्रकट हो जाने के निश्चित रूप से राजनीतिक मायने भी हैं क्योंकि उनके इस तरह सर्वोच्च न्यायालय में पैरवी करने से आम जनता तक सकारात्मक सन्देश गया है। राज्य में जल्दी ही विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं अतः उनके विरोधियों को इसकी काट भी अभी से सोचनी होगी। ममता दी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अपनी निजी याचिका दाखिल की है जिसमें मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए न्याय पाने का अधिकार समाहित है। ममता दी ने सर्वोच्च न्यायालय में दलील देते हुए कहा कि चुनाव आयोग इसी न्यायालय के आदेशों की अवहेलना भी कर रहा है क्योंकि प. बंगाल में वह आधार कार्ड को नागरिकों के निवास प्रमाण पत्र के रूप में स्वीकार नहीं कर रहा है जबकि न्यायालय ने आदेश दिया था कि आधार कार्ड भी जायज मतदाताओं की पहचान का एक दस्तावेज माना जायेगा। मगर प. बंगाल में चुनाव आयोग आधार कार्ड को स्वीकार नहीं कर रहा है और अपनी मनमानी कर रहा है जिसकी वजह से लाखों मतदाताओं को भारी परेशानी हो रही है जबकि अन्य राज्यों में किये गये पुनरीक्षण में न केवल आधार कार्ड को, बल्कि आवास प्रमाणपत्र, परिवार पंजीयन कार्ड, सरकारी आवास प्रमाणपत्र व स्वास्थ्य कार्ड स्वीकार किये जा रहे हैं। इस मामले में जाति प्रमाणपत्र भी स्वीकार किया जा रहा है परन्तु प. बंगाल में पुनरीक्षण करते वक्त चुनाव आयोग इन्हें स्वीकार नहीं कर रहा है जिससे राज्य के लोगों के समक्ष अपने मतदाता होने का दावा प्रस्तुत करने में भारी कठिनाई आ रही है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी दलील दी कि चुनाव आयोग ने पुनरीक्षण का एेसा समय चुना जो कि उनके राज्य में त्यौहारों का समय होता है और लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते-जाते रहते हैं। जाहिर है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस बारे में संज्ञान लिया है और मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी को तय की है परन्तु सर्वोच्च न्यायालय में गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया की संवैधानिकता पर भी सुनवाई पूरी हो चुकी है और इस सन्दर्भ में फैसला सुरक्षित रख लिया गया है।
अब सवाल यह है कि प. बंगाल में चुनाव आयोग जिन आधारों पर मतदाताओं के नाम सूची से काट रहा है उनकी गहन जांच हो। इस बारे में स्पष्ट है कि एेसी किसी भी महिला मतदाता का नाम सूची से नहीं हटाया जा सकता है जिसने शादी करने के बाद अपना निवास बदल लिया हो और उसके नाम में नया उपनाम जोड़ दिया गया हो। ममता दी का तर्क है कि उनके राज्य में चुनाव आयोग यह काम कर रहा है। अतः सर्वोच्च न्यायालय को इन सभी पक्षों पर अपना निर्णय देना होगा। जहां तक ममता दी का सवाल है तो वह निश्चित रूप से देश के सभी राजनीतिज्ञों के बीच अपना एक अलग व विशिष्ट स्थान रखती हैं और राजनीति को सोते-जागते जीती हैं।
ममता बनर्जी का ‘वकील’ रूप
Summary :
इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि प. बंगाल की मुख्यमन्त्री सुश्री ममता बनर्जी देश की एेसी राजनीतिज्ञ हैं जिन्होंने जमीन पर संघर्ष करके लोकतान्त्रिक व्यवस्था में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है और अपने राजनीतिक सिद्धान्तों के प्रति समर्पित रहते हुए अपने राज्य से लम्बी वामपंथी सत्ता का खात्मा करने में सफलता प्राप्त की है। ममता दी की खासियत रही है कि वह वर्तमान राजनीति की सभी वर्जनाओं के बीच अपनी सफलता का रास्ता इस प्रकार बनाती हैं कि उनके विरोधी आश्चर्यचकित होकर नई बनी परिस्थितियों में अपनी भूमिका तलाशते रह जाते हैं। पिछले दिनों से उन्होंने जिस प्रकार…


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