राष्ट्रपति ट्रम्प के अमेरिका का पुनः सरपरस्त बनने के बाद भारत के साथ इस देश के सम्बन्धों का मंथन जिस प्रकार चल रहा है उसके विश्व व्यापी आयाम हैं क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र होने के साथ ही दुनिया की तेज गति से प्रगति कर रही अर्थव्यवस्था का देश भी है। दोनों देशों के सम्बन्ध भारत के स्वतन्त्र होने के बाद से हिचकोले भी खाते रहे हैं मगर 1991 में भारत की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बाद इनमें गुणात्मक परिवर्तन आया और अमेरिका ने भारत को बाजार मूलक अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान भी अपने पूंजी निवेश से दिया परन्तु भारत में 1991 के बाद बनी सरकारों ने इस मोर्चे पर एहतियात से काम लिया और भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के लिए उसी हद तक खोला जिससे उसके राष्ट्रीय आर्थिक हितों पर विपरीत प्रभाव न पड़ सके।
1991 के बाद के भारत-अमेरिकी सम्बन्धों की यदि समीक्षा की जाये तो हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि आज की तारीख में भारत अमेरिका को अधिकतम निर्यात करने वाला देश है और व्यापार सन्तुलन इसके पक्ष में करीब 46 अरब डाॅलर का है। यह स्थिति तब है जबकि अमेरिका दुनिया का सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश माना जाता है और आधुनिकतम टैक्नोलॉजी का अधिष्ठाता भी समझा जाता है। अतः भारत को इसके साथ अपने सम्बन्ध निर्धारित करते समय सबसे पहले अपने राष्ट्रीय हितों का संरक्षण करना होता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा ‘महाजन’ देश भी है जिसके चलते यह आपसी सम्बन्धों में सबसे पहले अपने हितों को साधता है।
भारत के साथ इसके सम्बन्धों की भी हमें निरपेक्ष भाव से इसी दृष्टि से समीक्षा करनी होगी और सोचना होगा कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने पिछले दिनों भारतीय आयात माल पर सर्वाधिक ऊंची 50 प्रतिशत शुल्क दरें क्यों लागू की थीं ? हालांकि इसके बाद अमेरिका की ओर से भारत के साथ जिस व्यापार समझौते की घोषणा की गई और भारत ने भी जिसे स्वीकार किया, उसमें शुल्क दरों में बदलाव किया गया परन्तु यह मानना पड़ेगा कि इस समझौते में भारत ने अपने कृषि क्षेत्र के लिए सीमित समझौतावादी नीति को भी अपनाया जिससे भारतीय राष्ट्रीय आर्थिक हित सधे रहे और भारत का इसके साथ व्यापार सन्तुलन लाभ में ही चलता रहे।
हालांकि इस समझौते की भारत के राजनीतिक क्षेत्रों में तीखी आलोचना हुई परन्तु अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ट्रम्प की शुल्क नीति के विरुद्ध फैसला आने के बाद यह समझौता बट्टे-खाते में चला गया है और दोनों देश नये सिरे से कारोबारी करार करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। अमेरिका के विदेश मन्त्री श्री मार्को रूबियो इसी पृष्ठभूमि में आगामी 23 मई से भारत की चार दिवसीय यात्रा पर आ रहे हैं जिसे भारत के नजरिये से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसी दौरान नई दिल्ली में ‘क्वाड’ संगठन देशों के विदेश मन्त्रियों की बैठक भी होगी जिसमें श्री रूबियो हिस्सा लेंगे। ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद किसी अमेरिकी विदेश मन्त्री की यह पहली भारत यात्रा होगी।
अपनी इस यात्रा में श्री रूबियो भारत के साथ व्यापार के अलावा ऊर्जा व रक्षा क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए भी बातचीत करेंगे। दरअसल अगले महीने फ्रांस में दुनिया के सात अग्रणी देशों का जी-7 का शिखर सम्मेलन हो रहा है जिसमें प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी को भी न्यौता दिया गया है। इस सम्मेलन में श्री मोदी की राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ मुलाकात होगी। अतः श्री रूबियो द्वारा अपनी भारत यात्रा के दौरान ट्रम्प-मोदी मुलाकात का मोटा एजेंडा भी तय किये जाने की संभावना बनी रहेगी। इसलिए भारत को अपनी कूटनीतिक विशेषज्ञता का इस्तेमाल इस प्रकार करना होगा कि भारत के हित सर्वोच्च रहे। श्री रूबियो अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी हैं अतः भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजित डोभाल से भी उनकी बैठक होना निश्चित माना जा रहा है।
श्री रूबियो की भारत यात्रा के बारे में अमेरिकी विदेश मन्त्रालय ने एक वक्तव्य जारी करके बताया है कि वह नई दिल्ली के अलावा कोलकाता, जयपुर व आगरा भी जायेंगे। जाहिर है कि जब भी कोई प्रमुख विदेशी मेहमान भारत आता है तो वह आगरा का ताजमहल देखने का अपना लोभ संवरण नहीं कर पाता है। वक्तव्य में कहा गया है कि विदेश मन्त्री भारत के साथ ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर व्यापक चर्चा करेंगे तथा सामान्य व्यापार, दुर्लभ खनिज व रक्षा सहयोग के बारे में भारतीय नेताओं के साथ गहन विचार-विमर्श करेंगे। वह क्वाड देशों के विदेश मन्त्रियों की बैठक में भी हिस्सा लेंगे।
क्वाड वह संगठन है जिसके भारत, जापान, आस्ट्रेलिया व अमेरिका सदस्य हैं। इसका मुख्य काम हिन्द व प्रशान्त महासागर क्षेत्र में शान्ति का वातावरण व सैनिक शक्ति सन्तुलन बनाये रखना है मगर इस संगठन का उद्देश्य इस महासागरीय क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को नियन्त्रित करना भी माना जाता है। यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि यह वर्ष अमेरिकी स्वतन्त्रता का 250वां वर्ष है जिसका आयोजन नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास भी करेगा। श्री रूबियो इसमें भी हिस्सा लेंगे। यहां यह उल्लेखनीय है कि भारतीय विदेश सचिव श्री विक्रम मिसरी पिछले महीने वाशिंगटन की यात्रा पर गये थे जहां उन्होंने श्री रूबियो से भी मुलाकात की थी।
इस मुलाकात में भारत में स्थित अमेरिकी राजदूत श्री सर्जियो गोर भी उपस्थित थे। श्री गोर ने मुलाकात के बाद ही घोषणा कर दी थी कि श्री रूबियो जल्दी ही भारत की यात्रा करेंगे। इससे यह तो स्पष्ट होता ही है कि अमेरिका को भारत की जरूरत है जबकि इसके उलट भारत की स्थिति चीन से अमेरिकी लागडांट के चलते एक उभय पक्षीय देश की हो सकती है क्योंकि चीन भारत का निकटतम पड़ोसी देश है। कुल मिलाकर दक्षिण एशिया में भारत अमेरिका के लिए एक जरूरी शर्त है अतः इसी दिशा में भारत की कूटनीति भी चलनी चाहिए। ईरान से अमेरिका के चलते युद्ध की वजह से भारत और अधिक महत्वपूर्ण बन चुका है मगर अमेरिका पाकिस्तान को तवज्जो देकर इसे सन्तुलित करने के प्रयास में है। हमें इस बारे में भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।


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