भाजपा पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्य असम में अपनी चुनावी जीतों को लेकर भले ही उत्साहित हो, लेकिन मणिपुर और लद्दाख में उसे अब भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यह शांति केवल दिखावटी थी। यह स्थायी नहीं, बल्कि कुछ समय के लिए बनी हुई शांति थी। लद्दाख में वादे पूरे न होने को लेकर लोगों में नाराज़गी सुलग रही है, वहीं मणिपुर एक बार फिर तनाव के मुहाने पर खड़ा है। इसी महीने हुए एक बम विस्फोट में दो बच्चों की मौत हो गई। इसके साथ ही शांति फिर भंग हो गई। बाज़ार बंद रहे, पुरुष और महिलाएं सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने तेल के टैंकरों में आग लगा दी, जबकि महिलाओं और युवाओं की पुलिस से झड़पें हुईं।
इसके बाद सड़क जाम और नाकेबंदी का सिलसिला भी शुरू हो गया। स्थिति एक बार फिर विस्फोटक मोड़ पर पहुंच गई है।
अब रुख लद्दाख की ओर करें, जहां हालात अब भी पूरी तरह शांत नहीं हैं। हिंसा भले कम हुई हो और लोग राजनीतिक वार्ता की तैयारी कर रहे हों, लेकिन बातचीत में अब तक कोई खास प्रगति नहीं हुई है। राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची लागू करने जैसी प्रमुख मांगों के पूरा होने की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है। इसके बावजूद स्थानीय नेताओं को उम्मीद है कि बातचीत एकतरफा नहीं होगी। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के शब्दों में, “बातचीत का मतलब यह होता है कि दोनों पक्ष कुछ दें और कुछ लें।
वार्ता लचीलेपन पर आधारित होती है, जिद पर नहीं। जब मैं यह कहता हूं तो इसका मतलब यह नहीं कि लद्दाख के लोग अपनी मांगों से पीछे हट जाएंगे लेकिन हमें यह भरोसा मिलना चाहिए कि सरकार भी कुछ कदम आगे बढ़ाएगी और हम भी।” लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के बीच बातचीत जारी है, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। क्षेत्र के लिए राज्य का दर्जा और स्थानीय जमीन तथा नौकरियों की सुरक्षा के लिए संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग अब भी प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।
दूसरी ओर प्रशासन ने सामाजिक और पर्यटन क्षेत्रों में कई सुधारात्मक कदम उठाए हैं, लेकिन फिलहाल इन्हें “बहुत कम और बहुत देर से उठाए गए कदम” माना जा रहा है।
लोगों की नाराज़गी इस बात को लेकर है कि राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची के तहत संरक्षण जैसी बुनियादी मांगों को उस गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ नहीं लिया जा रहा, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी। गौरतलब है कि उपराज्यपाल ने लद्दाख में पांच नए जिलों के गठन की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य दूरदराज के गांवों तक प्रशासनिक सुविधाएं पहुंचाना बताया गया था। विश्वास बहाली की दिशा में उठाए गए कदम के रूप में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जारी आदेश वापस लिए जाने के बाद हिरासत से रिहा कर दिया गया।
हालांकि, वांगचुक की रिहाई को लेकर दो तरह की चर्चाएं हैं। पहला पक्ष यह मानता है कि यदि सरकार उन्हें रिहा नहीं करती तो अदालत ऐसा कर सकती थी, क्योंकि उनकी पत्नी गीतांजलि उस मामले को मजबूती से लड़ रही थीं, जिसे उस समय “पूरी तरह मजबूत” और “अभेद्य” मामला बताया जा रहा था। माना जा रहा है कि अदालत से संभावित फटकार और असहज स्थिति से बचने के लिए सरकार ने पहले ही उन्हें रिहा करने का फैसला कर लिया।
दूसरा पक्ष इसे विश्वास बहाली का प्रयास मानता है, जिसके जरिए सरकार लद्दाख के लोगों को यह संदेश देना चाहती थी कि वह बातचीत के पक्ष में है और गतिरोध समाप्त करना चाहती है। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि सरकार राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची लागू करने की मांग मानने के लिए तैयार है। इस मुद्दे पर सरकार का अपना तर्क भी है। यदि किसी एक क्षेत्र में आंदोलनों और प्रदर्शनों के दबाव में सरकार झुकती दिखाई देती है तो देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसी मांगों की बाढ़ आ सकती है। साथ ही कोई भी मजबूत सरकार खुद को दबाव में झुकती हुई नहीं दिखाना चाहती। इसी वजह से प्रदर्शनकारियों को शांत करने के लिए सरकार पूरी तरह झुकने से बच रही है।
वांगचुक की रिहाई को लेकर यहां भी दो तरह की चर्चाएं हैं। एक पक्ष का कहना है कि उनकी रिहाई बिना किसी शर्त के हुई है, जबकि दूसरा मानता है कि इसके पीछे कोई समझौता हुआ है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि केंद्र सरकार ने उन्हें रिहा कर उनकी चुप्पी “खरीद” ली है। हालांकि इस दावे की पुष्टि के लिए ठोस आधार बहुत कम हैं, लेकिन रिहाई के बाद वांगचुक का अपेक्षाकृत शांत रहना संदेह जरूर पैदा करता है। उनकी ओर से दिखाई जा रही संयमित प्रतिक्रिया को देखते हुए यह कहना पूरी तरह गलत नहीं होगा कि उन्हें फिलहाल शांत रहने की सलाह दी गई है।
वांगचुक का मानना है कि इस समय “सकारात्मक शुरुआत” सबसे अधिक जरूरी है। उन्होंने कहा, “कई लोग मुझसे कहते हैं कि सरकार की मंशा कोई सकारात्मक कदम उठाने की नहीं है, बल्कि वह केवल मुश्किल स्थिति से निकलना चाहती है, लेकिन मैं इस बात पर विश्वास नहीं करना चाहता। मुझे उम्मीद है कि सरकार अपना वादा निभाएगी और भरोसे का ऐसा माहौल बनाएगी जिससे लंबे समय से लंबित मुद्दों पर सार्थक बातचीत हो सके, लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो समस्या खड़ी हो सकती है। फिलहाल हमें इंतजार करना होगा और देखना होगा।”
फिलहाल “इंतजार करो और देखो” की स्थिति मणिपुर और लद्दाख, दोनों जगह दिखाई दे रही है। हालांकि हाल के दिनों में मणिपुर का संघर्ष एक बार फिर हिंसक मोड़ ले चुका है। ताजा हिंसा के बाद राज्य सरकार की पकड़ कमजोर पड़ती नजर आ रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जो संघर्ष अब तक मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जातीय तनाव तक सीमित था, वह अब नागा समूहों तक भी फैल गया है। हालिया हत्याओं के पीछे नागा उग्रवादी समूहों का हाथ होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। चर्च सभा से लौट रहे चर्च नेताओं की राजमार्ग पर गोली मारकर हत्या कर दी गई।
कुकी और नागा समुदायों के बीच आरोप-प्रत्यारोप के बीच मणिपुर की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। सरकार के लिए यह स्थिति किसी दुविधा से कम नहीं है। एक ओर वह संघर्षरत समूहों के बीच शांति स्थापित करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर समुदायों के बीच खाई हर पल और गहरी होती जा रही है। सबसे बड़ी चुनौती पहाड़ी जनजातियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ मैतेई समुदाय की चिंताओं का समाधान निकालना है। यह काम कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल। हालांकि कुछ लोगों को नए मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह के नेतृत्व में उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है, जिन्होंने इसी वर्ष अशांत राज्य की कमान संभाली है।
उनके साथ दो उपमुख्यमंत्री भी नियुक्त किए गए हैं, जिनमें एक कुकी-जो समुदाय और दूसरा नागा समुदाय से है। अब जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर है कि वह लद्दाख और मणिपुर दोनों को राहत और भरोसे का एहसास दिलाए, जबकि इन क्षेत्रों के लोग लगातार उपेक्षा और उदासीनता के आरोप लगा रहे हैं। हालिया चुनावी जीतों के बाद भाजपा निश्चित रूप से उत्साह में है और इसके पर्याप्त कारण भी हैं लेकिन समय की मांग यह है कि उन घावों को भरा जाए जो वक्त, परिस्थितियों और शायद सरकारी उदासीनता ने लद्दाख और मणिपुर के लोगों तथा समुदायों को दिए हैं।


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