प्रवासियों पर ब्रिटेन में दो-फाड़

Summary :

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर इस्तीफ़ा देने का दबाव बढ़ता जा रहा है, ऐसे में लेबर पार्टी आंतरिक कलह में घिरी हुई है। स्थानीय चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन के चलते संसद में लेबर पार्टी के लगभग एक चौथाई सदस्यों ने उनके इस्तीफे की मांग की है। इस राजनीतिक अस्थिरता ने निवेशकों को चिंतित कर दिया है जिससे सरकार की ऋण लेने की लागत प्रभावित हो रही है। परिवर्तन की बढ़ती मांगों के बीच, उनके दो राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी खुले तौर पर उनके उत्तराधिकारी बनने की रणनीति बना रहे हैं, जबकि स्टार्मर अपने सरकारी कर्त्तव्यों के प्रति दृढ़ संकल्पित हैं। लेबर…

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर इस्तीफ़ा देने का दबाव बढ़ता जा रहा है, ऐसे में लेबर पार्टी आंतरिक कलह में घिरी हुई है। स्थानीय चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन के चलते संसद में लेबर पार्टी के लगभग एक चौथाई सदस्यों ने उनके इस्तीफे की मांग की है। इस राजनीतिक अस्थिरता ने निवेशकों को चिंतित कर दिया है जिससे सरकार की ऋण लेने की लागत प्रभावित हो रही है। परिवर्तन की बढ़ती मांगों के बीच, उनके दो राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी खुले तौर पर उनके उत्तराधिकारी बनने की रणनीति बना रहे हैं, जबकि स्टार्मर अपने सरकारी कर्त्तव्यों के प्रति दृढ़ संकल्पित हैं।

लेबर पार्टी के मुख्यालय के दौरे के दौरान उन्होंने चुनौतीपूर्ण राजनीतिक माहौल के बावजूद देश की सेवा करने पर अपना ध्यान केंद्रित करने की बात दोहराई। हाल ही के कुछ वर्षो में ब्रिटेन में दक्षिणपंथी नेताओं और विचारों का उत्थान हुआ है। उनका आंदोलन मुख्य रूप से अवैध आप्रवासन और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों पर केंद्रित है। दुनिया भर में भी कुछ वर्षो में कई प्रमुख देशों में दक्षिणपंथी सरकारों ने सत्ता संभाली है। लेकिन ब्रिटेन में नेतृत्व को लेकर तनाव ज्यादा बढ़ गया है क्योंकि संभावित उत्तराधिकारी अपनी स्थिति मजबूत करने की होड़ में लगे हैं।

स्वास्थ्य मंत्री पद से हाल ही में इस्तीफा देने वाले वेस स्ट्रीटिंग और ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर एंडी बर्नहैम जैसे प्रमुख व्यक्ति नेतृत्व की दौड़ में शामिल होने के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। वहीं, उपप्रधानमंत्री डेविड लैमी ने स्टार्मर के पद पर बने रहने के इरादे की पुष्टि की है, हालांकि उन्होंने पद छोड़ने की कोई समय सीमा नहीं बताई है। ब्रिटेन की राजनीति इस वक्त दो बिल्कुल अलग ध्रुवों पर खड़ी है, जहां एक तरफ इंग्लैंड में ‘बाहरियों’ के खिलाफ नफरत की लहर है, वहीं स्कॉटलैंड ने एक भारतीय छात्र को सांसद चुनकर पूरी दुनिया को दंग कर दिया है।

तमिलनाडु के रहने वाले और ओ.पी. जिंदल यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र क्यू. मणिवन्नन, जो स्कॉटलैंड में महज एक स्टूडेंट वीजा पर पीएचडी करने गए थे, वहां की संसद में पहुंचने वाले पहले भारतीय छात्र और ट्रांसजेंडर बन गए हैं, जैसे हमारे यहां घुसपैठिए कहते हैं, वहां अवैध प्रवासी कहते हैं और इस मुद्दे पर कई गोरे लोगों के नेता वहां की पॉलिटिक्स में आ चुके हैं और धीरे-धीरे उनको काफी समर्थन भी मिलता जा रहा है। एक तरह से ये वहां की राजनीति का घुसपैठिया फैक्टर बन गया है तो इंग्लैंड में तो ये साफ दिख गया लोकल काउंसिलों के चुनावों में कि अब इस मुद्दे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रिफॉर्म यूके पार्टी अब बड़ी पार्टी बन चुकी है और प्रधानमंत्री स्टार्मर का इस्तीफा तो उन्हीं की पार्टी के लोग मांग रहे हैं।

ब्रिटेन में तीन देश गिने जाते हैं। इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स ये तीन मिलकर ब्रिटेन कहे जाते हैं और इनमें उत्तरी आयरलैंड जोड़ दो तो उसको कहते हैं यूके यानी यूनाइटेड किंगडम। इंग्लैंड में लोकल काउंसिल के चुनाव हुए और स्कॉटलैंड में वहां की संसद के चुनाव हुए। स्कॉटलैंड में माहौल इस मामले में बिल्कुल ही अलग है। स्कॉटलैंड ने तो 2020 में ये भी नियम बना दिया था कि कोई विदेशी अगर स्कॉटलैंड में आया हुआ है वैलिड वीजा पर। यानी वहां वैध कागजों के साथ रह रहा है तो वो वहां वोट भी डाल सकता है। उनका कहना था कि विदेशियों से अगर टैक्स ले रहे हैं तो उनको वोट देने का भी अधिकार होना चाहिए। इंग्लैंड के लोगों का कहना है कि इंग्लैंड गोरे लोगों का ही था और गोरे लोगों का ही रहना चाहिए।

ये रोष जो है वो खासकर नावों के जरिये गैर कानूनी तरीके से इंग्लैंड पहुंच रहे लोगों के खिलाफ ज्यादा है। जिन लोगों के खिलाफ नफरत की आग में इंग्लैंड जल रहा है उनमें जिनमें सीरिया, इराक वगैरह जैसे देशों के लोग होते हैं। यही विरोध फिर पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों की तरफ भी मुड़ रहा है और क्योंकि देखने में तो भारतीय भी अलग नहीं होते तो उनके लिए भी वही भावना कई जगह दिख जाती है कि ये सब बाहर से आए लोग, गोरे लोगों के संसाधनों पर कब्जा करते जा रहे हैं।

स्कॉटलैंड में वैसे भी वहां के गोरे लोगों की जनसंख्या घटती जा रही है और वो तो चाहते हैं कि वहां डॉक्टर आएं, इंजीनियर आएं, आईटी वाले आएं और वहां की अर्थव्यवस्था को बढ़ाएं। इसी वजह से उन्होंने 2020 में उनको वोट का ही अधिकार दे दिया था। भले ही वो स्कॉटलैंड के नागरिक ना हों। इतना ही नहीं, वोट का अधिकार दिया तो वहां ये भी मांग उठी कि अगर ये लोग वोट दे सकते हैं तो फिर चुनाव क्यों नहीं लड़ सकते? इसलिए पिछले साल उन्होंने अपने कानून में बदलाव ऐसा किया कि दुनिया ही दंग रह गई। अब वैध तरीके से अगर वहां कोई वीज़ा लेकर रह रहा है तो वो स्कॉटलैंड के संसद का चुनाव भी लड़ सकता है। क्योंकि अगर देश को आगे बढ़ाने में उनकी भागीदारी है तो सरकार में होने का उनको हक देना चाहिए।

ब्रिटेन की सियासत में उथल-पुथल चल रही है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने अपने करीबी लोगों से कहा है कि वो पीएम पद छोड़ने के लिए तैयार हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कैबिनेट के एक सदस्य ने बताया कि स्टार्मर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं लेकिन वो पीएम पद से इस्तीफा अपनी शर्तों पर ही करेंगे। स्टार्मर प्रशासन से मतदाताओं की बढ़ती नाराजगी के बीच, ब्रिटेन की लेबर सरकार खुद को संकट में फंसा हुआ पा रही है। पीटर मैंडेलसन की नियुक्ति और बाल यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन के साथ उनके संबंधों से जुड़े विवाद से लेकर स्थानीय चुनावों में लेबर पार्टी के खराब प्रदर्शन तक स्टार्मर के इस्तीफे की मांग अब काफी ज्यादा बढ़ गई है।

सबसे ताजा झटका तब लगा जब स्टार्मर कैबिनेट में पूर्व स्वास्थ्य सचिव वेस स्ट्रीटिंग ने इस्तीफा दे दिया। शनिवार को स्ट्रीटिंग ने कहा कि वो लेबर पार्टी के नेतृत्व के लिए भविष्य में होने वाले किसी भी मुकाबले में स्टार्मर को चुनौती देंगे और प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश करेंगे। अपने भाषण के दौरान पूर्व स्वास्थ्य सचिव ने स्टार्मर से यह भी अपील की है कि वे अपना पद छोड़ने के लिए एक समय-सीमा तय करें।

इस सारी उथल-पुथल के बीच कीर स्टार्मर की लोकप्रियता भी तेजी से गिरी है। सर्वे के अनुसार, लगभग 69 प्रतिशत ब्रिटेन के लोगों की लेबर पार्टी के इस नेता के बारे में राय बिल्कुल उल्टी है। स्टार्मर फिलहाल रिकॉर्ड पर सबसे कम लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं। कई लोग उनकी तुलना लिज ट्रस के 49 दिनों के कार्यकाल से कर रहे हैं। इसके अलावा स्टार्मर की अपनी पार्टी का भी उनकी लीडरशिप पर से भरोसा उठता दिख रहा है। लेबर पार्टी के कई सांसदों को अब डर है कि अगर स्टार्मर की अलोकप्रियता का ये सिलसिला जारी रहा तो इससे भविष्य में किसी भी लेबर सरकार के बनने की संभावनाएं खतरे में पड़ जाएंगी और हो सकता है कि देश ​रिफार्म यूके के नेता नाइजेल फराज के नेतृत्व वाले धुर-दक्षिणपंथी खेमे के हाथों में चला जाए।

Aakash Chopra