मोदी की झप्पी और टॉफी

Summary :

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस क्षमता को स्वीकार करना ही होगा जिसके माध्यम से वह हर अवसर को अपने पक्ष में साध लेते हैं। आलोचक इसे अत्यधिक प्रचार प्राप्त करने की प्रवृत्ति कह सकते हैं किंतु वास्तविकता यही प्रमाणित करती है कि यह प्रभाव स्वयं मोदी की राजनीतिक शक्ति का परिणाम है। यह बात कुछ लोगों को चाटुकारिता अथवा अंधभक्ति से प्रेरित प्रतीत हो सकती है किंतु ऐसा नहीं है। यह उस व्यक्ति का वस्तुनिष्ठ आंकलन है जिसने वर्ष 2014 से भारतीय राजनीति के केंद्र में अपनी उपस्थिति बनाए रखी है। एक ऐसा नेता जो साधारण पृष्ठभूमि उभरकर न…

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस क्षमता को स्वीकार करना ही होगा जिसके माध्यम से वह हर अवसर को अपने पक्ष में साध लेते हैं। आलोचक इसे अत्यधिक प्रचार प्राप्त करने की प्रवृत्ति कह सकते हैं किंतु वास्तविकता यही प्रमाणित करती है कि यह प्रभाव स्वयं मोदी की राजनीतिक शक्ति का परिणाम है। यह बात कुछ लोगों को चाटुकारिता अथवा अंधभक्ति से प्रेरित प्रतीत हो सकती है किंतु ऐसा नहीं है। यह उस व्यक्ति का वस्तुनिष्ठ आंकलन है जिसने वर्ष 2014 से भारतीय राजनीति के केंद्र में अपनी उपस्थिति बनाए रखी है। एक ऐसा नेता जो साधारण पृष्ठभूमि उभरकर न केवल भारत की सत्ता का संचालन कर रहा है, बल्कि पिछले एक दशक से अधिक समय से वैश्विक मंच पर भी प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक विमर्श से निकला यह कथन व्यापक रूप से प्रचलित हुआ कि जब मोदी बोलते हैं तो विश्व सुनता है।
इसकी शुरुआत उस प्रसिद्ध आलिंगन शैली से हुई जिसे आज ‘मोदी आलिंगन’ के रूप में जाना जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस भी वैश्विक नेता से मिलते, सहज भाव से उन्हें आलिंगनबद्ध कर लेते, चाहे सामने वाले की प्रतिक्रिया कैसी भी हो अथवा उसमें संकोच ही क्यों न दिखाई दे। फ्रांस के राष्ट्रपति हों, अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा, जापान और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री, संयुक्त अरब अमीरात के युवराज अथवा सामाजिक माध्यम मंचों के प्रमुख उद्योगपति और कलाकार, सभी के साथ मोदी का यही आत्मीय व्यवहार दिखाई दिया।
इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने तो इसे ‘वास्तविक आत्मीयता’ तक करार दिया। इज़राइली संसद में प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत के दौरान उन्होंने कहा कि आज जब मैं और मेरी पत्नी सारा हवाई अड्डे पर आपका स्वागत कर रहे थे तब हमने एक-दूसरे को आलिंगन किया। प्रधानमंत्री मोदी का आलिंगन कुछ विशेष है। इसे पूरी दुनिया ‘मोदी आलिंगन’ के नाम से जानती है। जब कोई व्यक्ति सच्चे मन से किसी को आलिंगन करता है तो उसमें कृत्रिमता नहीं होती, वह वास्तविक भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है। नेतन्याहू ने आगे कहा कि यह केवल व्यक्तिगत संबंधों अथवा मित्रता का प्रतीक नहीं है, बल्कि दोनों देशों की जनता के बीच मौजूद आत्मीयता और विश्वास का भी प्रतिबिंब है।
प्रधानमंत्री मोदी की इस प्रसिद्ध शैली के कारण अनेक लोगों ने उन्हें हाल के वर्षों का ‘सबसे अधिक भावनात्मक अभिव्यक्ति करने वाला भारतीय नेता’ तक कहा है। भारतीय परंपरा और सामाजिक व्यवहार में आलिंगन सामान्य औपचारिकता का हिस्सा नहीं माना जाता। यह आत्मीयता, स्नेह और निकटता का प्रतीक होता है। वर्ष 1983 में नई दिल्ली में आयोजित एक शिखर सम्मेलन के दौरान क्यूबा के नेता फिदेल कास्त्रो ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जब सार्वजनिक रूप से आलिंगन किया था तब वह कुछ संकोच में दिखाई दी थीं। उनकी जीवनी लिखने वाले प्रणय गुप्त के अनुसार इंदिरा गांधी स्वभाव से भावनाओं का खुला प्रदर्शन करने वाली नेता नहीं थीं उस क्षण उन्होंने केवल औपचारिक मुस्कान के साथ स्थिति को संभाला था। वहीं नरेंद्र मोदी के जीवनीकार नीलांजन मुखोपाध्याय का मानना है कि मोदी के इस प्रकार के आलिंगन यह संदेश देते हैं कि वह एक अरब से अधिक भारतीयों के प्रतिनिधि हैं और विश्व मंच पर भारत की जनशक्ति तथा प्रभाव को प्रदर्शित करते हैं।
भारत में शब्दों की अपेक्षा शारीरिक हावभाव और व्यवहार को अधिक महत्व दिया जाता है। आलिंगन किसी औपचारिक प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं होता, बल्कि यह मित्रता और आत्मीयता की अभिव्यक्ति माना जाता है। कई बार यह शुरुआती झिझक को समाप्त कर सौहार्दपूर्ण संवाद का मार्ग भी प्रशस्त करता है। चाहे यह स्वाभाविक प्रवृत्ति हो अथवा सुनियोजित शैली, प्रधानमंत्री मोदी विश्व नेताओं के साथ संबंधों में शुरुआती दूरी को समाप्त करने में सफल दिखाई देते हैं। देश के भीतर अपेक्षाकृत संयमित और कार्य केंद्रित दिखाई देने वाले मोदी विदेश यात्राओं के दौरान अधिक मिलनसार और खुलकर संवाद करने वाले नेता के रूप में नजर आते हैं। कुछ लोग इसे अत्यधिक प्रदर्शन कह सकते हैं, किंतु अनेक पर्यवेक्षकों ने उन्हें उच्च कोटि का प्रभावशाली प्रस्तुतकर्ता माना है। यह कहना उचित होगा कि विश्व नेताओं के बीच आलिंगन सामान्य व्यवहार का हिस्सा नहीं माना जाता। सामान्यतः औपचारिक अभिवादन हाथ मिलाकर ही किया जाता है।
किंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विशिष्ट कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं और वह प्रचलित सीमाओं में बंधकर राजनीति करने वालों में नहीं हैं। वह प्रायः ऐसे कदम उठाते हैं जो चर्चा का विषय बन जाते हैं और कई बार पारंपरिक प्रोटोकॉल की सीमाओं को भी चुनौती देते दिखाई देते हैं। इससे सुरक्षा एजेंसियों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है, चाहे वह भारत की हों अथवा दूसरे देशों की। परंतु संदेश स्पष्ट रहता है कि भारतीय प्रधानमंत्री औपचारिक वार्ता से पहले व्यक्तिगत आत्मीयता स्थापित करने में विश्वास रखते हैं। यदि शब्दों से दूरी समाप्त न हो सके तो आत्मीय व्यवहार उस भूमिका को निभा देता है। यह हर बार सफल हो, ऐसा आवश्यक नहीं, किंतु शुरुआत के लिए इसे प्रभावी माना जाता है।
हालांकि प्रधानमंत्री मोदी की इस आलिंगन शैली की आलोचना भी हुई है। कुछ लोगों ने इसे गैर पेशेवर व्यवहार बताया तो कुछ ने इसे वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने वाला कदम माना। किंतु आलोचनाओं के बावजूद मोदी ने अपनी शैली में कोई परिवर्तन नहीं किया। यदि कुछ बदला है तो यह कि समय के साथ उनका यह व्यवहार और अधिक प्रमुख होता गया। इस बार हालांकि आलिंगन की जगह टॉफियों ने ले ली। इसे यदि “टॉफी कूटनीति” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस घटना ने सामाजिक माध्यमों पर असाधारण चर्चा बटोरी और एक अर्थ में यह प्रधानमंत्री मोदी की प्रसिद्ध आलिंगन शैली से भी अधिक प्रभावशाली साबित हुई।
दरअसल, इस सप्ताह जब प्रधानमंत्री मोदी इटली पहुंचे तो उन्होंने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का स्वागत आलिंगन से नहीं बल्कि टॉफियों के पैकेट से किया। उन्होंने उन्हें पारले कंपनी की प्रसिद्ध ‘मेलोडी’ टॉफियां भेंट कीं। ‘मेलोडी’ और ‘मेलोनी’ के नामों की समानता को संयोग नहीं माना जा सकता। ऐसा प्रतीत हुआ मानो यह उपहार विशेष रूप से उसी संकेत के लिए चुना गया हो। प्रधानमंत्री मोदी इस माध्यम से क्या संदेश देना चाहते थे, यह स्पष्ट नहीं है, किंतु ‘स्वीट मेलोडी’ नाम से चर्चित लगभग बारह सेकंड का यह दृश्य इंटरनेट पर व्यापक रूप से फैल गया। इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भी तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी हमारे लिए एक बहुत अच्छी ‘मेलोडी’ टॉफी लेकर आए हैं। दोनों नेताओं की टॉफी के पैकेट के साथ मुस्कुराती हुई तस्वीरें तेजी से वायरल हो गईं। कुछ ही घंटों में इस दृश्य को लाखों लोगों ने देखा और इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई।
इसके बाद चर्चा केवल टॉफियों तक सीमित नहीं रही। लोगों ने इसे मेलोनी और मेलोडी के नामों की समानता से जोड़कर देखा, वहीं कुछ ने दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच दिखाई देने वाली सहज निकटता और आपसी सामंजस्य को इसका कारण माना। यह प्रसंग केवल टॉफियों का नहीं बल्कि दोनों नेताओं के बीच दिखाई देने वाले विशेष आत्मीय संबंध का प्रतीक बन गया, जिसमें टॉफी ने मानो मिठास का कार्य किया। स्वाभाविक रूप से इस ‘टॉफी कूटनीति’ ने अन्य सभी विषयों को पीछे छोड़ दिया। यात्रा के दौरान जारी संयुक्त वक्तव्य, आतंकवाद, प्रौद्योगिकी, नवाचार तथा पश्चिम एशिया और यूक्रेन के युद्ध जैसे गंभीर मुद्दों की अपेक्षा लोगों का ध्यान टॉफियों और दोनों नेताओं के बीच की निकटता पर अधिक केंद्रित रहा।
यही कारण है कि अतीत में भी दोनों नेताओं को लेकर कई प्रकार की अटकलें और हल्की टिप्पणियां सामने आती रही हैं। कुछ लोगों ने तो दोनों की जोड़ी को लेकर अनावश्यक और अपरिपक्व टिप्पणियां तक कीं। हालांकि इस प्रकार की बातें वास्तविकता से काफी दूर हैं। फिर भी यह स्पष्ट दिखाई देता है कि जब भी दोनों नेता एक साथ मंच साझा करते हैं तो उनके बीच एक सहज आत्मीयता दिखाई देती है जो सामान्य कूटनीतिक व्यवहार से कुछ अलग प्रतीत होती है। उसमें औपचारिकता की अपेक्षा व्यक्तिगत निकटता का भाव अधिक नजर आता है। शायद यही कारण है कि जब भी नरेंद्र मोदी और जॉर्जिया मेलोनी एक साथ दिखाई देते हैं तो चर्चा आधिकारिक वार्ताओं से अधिक उनके व्यक्तिगत सामंजस्य की होती है। यह प्रधानमंत्री मोदी की सोची-समझी रणनीति है अथवा उनकी स्वाभाविक कूटनीतिक शैली, यह अलग विषय हो सकता है, किंतु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि भारतीय प्रधानमंत्री स्वयं को चर्चा के केंद्र में बनाए रखना भलीभांति जानते हैं, चाहे वह प्रसिद्ध ‘मोदी आलिंगन’ हो या फिर ‘टॉफी कूटनीति’।

Shera Rajput