भारत में सर्वाधिक चावल!

Summary :

भारत ने आजादी के बाद से कृषि क्षेत्र में जो प्रगति व विकास किया है उसके पीछे देश के किसानों की अटूट मेहनत के साथ ही पिछले 75 वर्षों के दौरान सत्तारूढ़ सरकारों की दूरदृष्टि भी रही है। यह दुष्कर कार्य इन दोनों के आपसी सहयोग व तालमेल के बिना होना संभव नहीं था क्योंकि जब देश आजाद हुआ था तो भारत में अनाज की भारी कमी थी और इसे अपनी जनता की आवश्यकता की आपूर्ति के लिए विदेशों से अनाज आयात करना पड़ता था। यह हालत तब थी जबकि 1947 में भारत की 90 प्रतिशत के लगभग जनता कृषि…

भारत ने आजादी के बाद से कृषि क्षेत्र में जो प्रगति व विकास किया है उसके पीछे देश के किसानों की अटूट मेहनत के साथ ही पिछले 75 वर्षों के दौरान सत्तारूढ़ सरकारों की दूरदृष्टि भी रही है। यह दुष्कर कार्य इन दोनों के आपसी सहयोग व तालमेल के बिना होना संभव नहीं था क्योंकि जब देश आजाद हुआ था तो भारत में अनाज की भारी कमी थी और इसे अपनी जनता की आवश्यकता की आपूर्ति के लिए विदेशों से अनाज आयात करना पड़ता था। यह हालत तब थी जबकि 1947 में भारत की 90 प्रतिशत के लगभग जनता कृषि क्षेत्र में लगी हुई थी। आजादी के समय देश में उद्योग-धंधों के नाम पर टाटा, बिड़ला और डालमिया समूह की कुछ उत्पादन कम्पनियां थीं। मगर इसके बाद प. जवाहर लाल नेहरू की प्रथम सरकार से लेकर अब तक बनी सरकारों ने खेती की तरफ विशेष ध्यान दिया जिसका परिणाम यह है कि भारत आज अनाज निर्यात करने वाला देश है ।

असल में यह सपना देश के अभी तक के हुए सबसे बड़े किसान नेता चौधरी चरण सिंह का था कि भारत में किसानों के खेतों में उत्पादन बढ़ाकर उनकी आमदनी में वृद्धि की जाये और उनके ब्च्चों को आधुनिक शिक्षा प्रदान करके जीवन के अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ाया जाये। अतः हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि 75 वर्षों के सतत प्रयासों के कारण भारत आज चावल उत्पादन में दुनिया का नम्बर एक देश बन गया है और इसने इस क्षेत्र में चीन को पछाड़ दिया है। वर्ष 2024-25 के दौरान भारत ने कुल 1500 लाख टन से भी अधिक का चावल उत्पादन किया जबकि चीन में यह उत्पादन 1452 लाख टन से कुछ ऊपर रहा। केवल चावल के क्षेत्र में ही भारत ने यह उपलब्धि हासिल नहीं की है बल्कि दुग्ध व डेयरी उत्पादों में भी यह विश्व का नम्बर एक देश बन गया है।

बीते वर्ष में इसने 2480 लाख टन दुग्ध उत्पादों का उत्पादन किया । इससे यही अन्दाजा लगाया जा सकता है कि खेती के क्षेत्र में लगातार प्रगति करने की प्रेरणा भारत की विभिन्न सरकारें देती रही हैं। यह क्रम 1991 में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद 1996 तक कुछ जरूर ठंडा पड़ा था परन्तु उसके बाद की सरकारों ने पुनः कृषि क्षेत्र को पटरी पर लाने के प्रयास किये। वर्ष 1991 से लेकर 1996 तक कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बहुत घट गया था क्योंकि तब की सत्तारूढ़ नरसिम्हा राव सरकार का पूरा ध्यान औद्योगिकरण पर ही केन्द्रित था और वह निजी क्षेत्र को बढ़ावा दे रही थी। इस दौरान ग्रामीण व कृषि क्षेत्र में पूंजी सृजन में भी गुणात्मक कमी दर्ज की गई थी। परन्तु इसके बावजूद इस दौरान भी कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ता रहा था। कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता लाने के लिए भारत ने अथक प्रयास शुरू से ही किये हैं और किसानों का उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से ही राष्ट्रीय बीज निगम की स्थापना तक की गई थी।

निगम स्थापित करने का एकमात्र लक्ष्य यही था कि किसान आधुनिक वैज्ञानिक खोजों का अधिकाधिक प्रयोग अपने खेतों में करके उपज बढ़ायें जिससे उनकी आमदनी में इजाफा हो। इसके लिए न्यूनतम खरीद प्रणाली भी शुरू की गई। ये सारे कार्य सरकारी हस्तक्षेपों से ही संभव हुए । इसके लिए भारत की पिछली सरकारों ने भी जी तोड़ मेहनत की है और यह कार्य वर्तमान मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान भी बदस्तूर जारी है। किसानों की आमदनी बढ़ाने के काम को वरीयता किस प्रकार दी जा रही है उस क्रम में हमें इस बात का संज्ञान लेना होगा कि केन्द्रीय कृषि मन्त्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने विगत दिन ही राष्ट्रीय बीज निगम के एक समारोह में 25 फसलों के 184 किस्म के बीजों को किसानों के लिए उपलब्ध कराया जिससे उनकी उपज विविध क्षेत्रों में बढ़ सके इनमें 122 बीज विभिन्न अनाजों के हैं और 24 कपास के हैं व 13 तिलहन के हैं तथा छह बीज दलहन के व छह बीज गन्ने के हैं।

इनके उगाने पर उपज में वृद्धि होगी जिसके परिणामस्वरूप किसानों की आमदनी में भी इजाफा होगा। दरअसल भारत ने कृषि क्षेत्र में आज विश्व में जो अपना स्थान बनाया है उसके पीछे विभिन्न प्रधानमन्त्रियों की अटूट लगन भी रही है। दुग्ध के क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने को लेकर भी स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री बहुत उत्सुक रहते थे जबकि अन्न उत्पादन के क्षेत्र में तो उन्होंने भारत में कृषि क्रांति की शुरूआत ही की थी। अपने 18 महीने के 1964-65 के छोटे से कार्यकाल के दौरान स्व. शास्त्री ने सर्वाधिक कार्य कृषि क्षेत्र में ही किया। 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान जब अमेरिका से पी एल-480 के तहत भारत को मिलने वाली अनाज मदद बन्द हो गई तो उन्होंने इसे भारत के आत्म सम्मान का विषय बना लिया।

परन्तु इसके साथ ही उन्होंने दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने के लिए अथक प्रयास किये। 1965 में ही स्व. शास्त्री ने गुजरात के खेड़ा जिले से इसकी शुरूआत की और क्षेत्र के किसानों के साथ रात दो बजे तक बैठक करके निष्कर्ष निकाला कि कृषि वैज्ञानिक स्व. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में यह कार्य हो सकता है और उन्होंने राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की स्थापना की। इसके बाद से गुजरात से शुरू हुई दुग्ध क्रान्ति का आज असर यह है कि भारत इसके उत्पादन में दुनिया का सर्वोच्च देश बन गया है। मगर मोदी काल में ही एक प्रयोग महाराष्ट्र के बीड जिले में किसानों की आय बढ़ाने के क्षेत्र में भी हुआ है। इस क्षेत्र में 2015-16 में सूखा पड़ा था और किसानों की सोयाबीन व कपास की फसल बर्बाद हो गई थी। उसके बाद से एक गैर सरकारी संगठन कृषिकुल के छाते तले किसानों ने अपनी खेती का विविधीकरण किया और पारंपरिक फसलें छोड़कर फलों के उत्पादन का काम शुरू किया जिससे पिछले दस वर्षों के दौरान उनकी आय में इतने ही गुणा वृद्धि दर्ज हो चुकी है। अतः कृषि क्षेत्र में विकास भारत में इसीलिए सफल रहा क्योंकि इसमें सरकारों व किसानों की बराबर की भूमिका रही।

Aditya Chopra

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