‘क्या बताऊं कितना तन्हा हूं मैं कि तेरे अंदर मुझे एक शहर नज़र आता है
साथ मेरे है आइना फिर क्यों हर शख्स में मुझे अपना चेहरा नज़र आता है’
भाजपा के युवा व उत्साही राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन को अपनी नई टीम बनाने में भले ही पांच महीनों का वक्त लग गया हो, पर अपनी इस नई टीम को लेकर वे खासे उत्साहित जान पड़ते हैं। आने वाले कुछ दिनों में भाजपा अध्यक्ष अपनी इस टीम की घोषणा कर सकते हैं। 20 से 23 जून तक नितिन नबीन पंजाब में भगवा संभावनाओं की आहटें टटोलने अपनी तीन दिवसीय यात्रा पर जा रहे हैं, शायद वहां से लौटने के तुरंत बाद वे अपनी नई केंद्रीय कमेटी का ऐलान कर दें।
15 जून को अधिमास खत्म होने के ठीक अगले रोज़ 16 जून को राजनाथ सिंह के आवास पर भाजपा व संघ के आला नेताओं की एक अहम बैठक आहूत थी, बताया जाता है कि इस बैठक में राजनाथ सिंह, नितिन नबीन, अमित शाह, भाजपा के संगठन महामंत्री बीएल संतोष, संगठन सह प्रभारी शिव प्रकाश और संघ के एक अहम नेता अरुण कुमार मौजूद थे। समझा जाता है कि इसी बैठक में नबीन की नई टीम को लेकर विस्तार से चर्चा हुई और इस बात पर जोर दिया गया कि नई टीम के गठन में जातीय व क्षेत्रीय संतुलन, लैंगिक प्रतिनिधित्व, युवा व अनुभव के सम्मिश्रण और आने वाले सात राज्यों के चुनावों को देखते हुए केंद्रीय पदाधिकारियों का चयन किया जाए, सनद रहे कि अगले ही वर्ष यूपी, उत्तराखंड, गुजरात गोवा व पंजाब जैसे राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं।
सबसे ज्यादा माथापच्ची भाजपा के राष्ट्रीय महासचिवों के नाम को लेकर हुई, एक तरह से तय हो गया कि बीएल संतोष व शिव प्रकाश पहले की तरह संगठन की जिम्मेदारी उठाते रहेंगे। सुनील बंसल व अरुण सिंह अपने पद पर बने रह सकते हैं, तरूण चुघ को लेकर बैठक में कोई आम सहमति नहीं बन पाई तो फैसला अध्यक्ष पर छोड़ दिया गया, विनोद तावड़े को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने की बात चल रही है, अगर ऐसा हुआ तो उनकी जगह एक नया महासचिव लाया जा सकता है। वहीं राधामोहन दास अग्रवाल व दुष्यंत गौतम की जगह भी दो नए महासचिव ‘टीम नबीन’ में देखने को मिल सकते हैं। 11 उपाध्यक्षों में भी व्यापक फेरबदल की संभावना है यह भी माना जा रहा है कि जिन वरिष्ठ नेताओं ने संगठन में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है, इनमें से कईयों को राज्यों के राज्यपाल या अहम बोर्ड या कमीशन का मुखिया बनाया जा सकता है।
कहते हैं 16 जून की बैठक के बाद अध्यक्ष ने पार्टी पदाधिकारियों की एक लिस्ट को झाड़-पोंछ कर अंतिम रूप दे दिया है, चूंकि इस अवधि में प्रधानमंत्री मोदी ‘जी 7’ की बैठक में भाग लेने के लिए विदेश गए हुए थे, सो 19 तारीख को उनके स्वदेश लौटने का इंतजार किया गया, फिर यह लिस्ट अनुमोदन के लिए पीएम के पास भेज दी गई है, वहां से हरी झंडी मिलते ही बकायदा अध्यक्ष जी अपनी नई टीम का ऐलान कर देंगे।
ऑपरेशन टाइगर की दहाड़ और सियासी नेपथ्य की मिमियाहट
यह नए दौर की नई राजनीति का संकम्रण काल है, यहां जो भी होता है सब डंके की चोट पर होता है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना को तोड़ने के प्रयास काफी पहले से चल रहे थे, इस पूरे अभियान को सिरे चढ़ाने में दिल्ली के सियासी गलियारों के उस चर्चित व्यक्ति की एक खास भूमिका रही, दुनिया जिन्हें अभिषेक वर्मा के नाम से जानती है, और जो शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे के बेहद खासमखास में शुमार होते हैं। अपने ऊपर चल रहे तमाम मुकदमों से निबट कर पिछले कुछ समय से अभिषेक भगवा रणनीति के आंगन के एक चहेते दीपक हो गए हैं। वे एनडीए के कुछ घटक दल व भाजपा के बीच की एक मुख्य कड़ी बन गए हैं। शिंदे ने भी इन्हें अधिकारिक रूप से अपनी पार्टी का ‘नेशनल कॉर्डिनेटर’ और मुख्य रणनीतिकार बना रखा है।
कहते हैं ‘ऑपरेशन टाइगर’ को सिरे चढ़ाने में अभिषेक ने एकनाथ शिंदे के सांसद पुत्र श्रीकांत शिंदे के साथ मिल कर काम किया। वर्मा के दिल्ली स्थित फॉर्म हाउस पर कई डिनर पार्टियों का आयोजन हुआ जिसमें िशवसेना उद्धव के सांसदों की मौजूदगी देखी गई। एक-दो पार्टियों में एकनाथ शिंदे भी अपनी पत्नी के साथ शामिल हुए बताए जाते हैं। इस पूरे अभियान को मंजिल तक पहुंचाने के बाद कहा जा रहा है कि कांग्रेसी सांसद रहे श्रीकांत वर्मा और वीणा वर्मा के पुत्र अभिषेक अब डीएमके के अखाड़े में चहलकदमी करते देखे जा सकते हैं। माना जाता है कि वे अब डीएमके को एनडीए में लाने की जुगत भिड़ाने में जुटे हैं। सूत्रों का दावा है कि डीएमके दो प्रमुख नेताओं ए राजा और कनिमोझी से अभिषेक की गहरी मित्रता है, इन दोनों नेताओं को अक्सर अभिषेक द्वारा दी जाने वाली भव्य पार्टियों का हिस्सा बनते देखा जा सकता है।
कहते हैं कि डीएमके ने एनडीए में आने की कीमत की तौर पर दिल्ली में दो मंत्री पद मांगे हैं। एक तो टेलिकॉम और दूसरा वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री का पद। कहते हैं भाजपा टेलिकॉम देने को एक बार तो राजी हो सकती है, पर उन्होंने वित्त मंत्रालय देने से साफ इंकार कर दिया है। वहीं इस पूरे मामले में स्टालिन और उसके पुत्र उदयागिरी को लेकर भी संशय बरकरार है, ये दोनों भाजपा के साथ आने में असहज महसूस कर रहे हैं क्योंकि डीएमके की पूरी राजनीति ही हिंदी व सनातन विरोध की है।
कैसे किया गया टाइगर का शिकार?
उस वक्त भाजपा के एक कद्दावर नेता बंगाल चुनाव को उसके अंजाम तक पहुंचाने में बेतरह व्यस्त थे, कहा जाता है कि तब ही उद्धव के ये 6 सांसद उनसे मिलने दिल्ली पहुंचे थे, इनके साथ स्वयं शिंदे भी थे। उन्हें बताया गया कि ये उद्धव का साथ छोड़ने को तैयार तो हैं पर ये सीधे भाजपा में नहीं आना चाहते क्योंकि इससे उनकी ‘मराठी मानुष’ की राजनीति पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है।
कहते हैं इस पूरी योजना से पार्टी के दिग्गजों को भी अवगत करा दिया गया। उनकी सहमति भी हासिल कर ली गई। पर अब तक इस पूरे ऑपरेशन से महाराष्ट्र की कुल 42 लोकसभा सीटों का पूरा गणित बदल सकता है, अभी 13 कांग्रेस के पास, एक एनसीपी अजित के पास, 8 सीटें शरद पवार के पास, 9 भाजपा व शिंदे के पास 7 सीटें हैं। अगर उद्धव गुट के ये 6 सांसद शिंदेे के साथ चले जाते हैं तो शिंदे की कुल सीटें बढ़ कर 13 हो जाएंगी यानी भाजपा से ज्यादा। सो, जब इस मुलाकात के बाद शिंदे व ये सांसदगण लौट कर मुंबई आए तो फड़णवीस ने इनके इरादों में पलीता लगाने का काम किया, उन्होंने इन सांसदों के फोन सर्विलांस पर लगवा दिए और यह खबर उद्धव को भी लीक कर दी गई, जैसे ही उक्त बड़े नेता बंगाल चुनाव से फारिग हुए और उन्हें इस पूरे मामले की जानकारी मिली तो उन्होंने फौरन फड़णवीस को दिल्ली तलब कर उनकी क्लास लगा दी।
इसके बाद फड़णवीस भी शिंदे के साथ मिल कर ऑपरेशन टाइगर को सिरे चढ़ाने में जुट गए। हालांकि शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस पर गोरेगांव के नेस्को में एकनाथ शिंदे दहाड़ते हुए कहते हैं कि ‘ये तो ट्रेलर है, पिक्चर अभी बाकी है।’ इससे दो आशय निकाले जा सकते हैं कि उद्धव गुट के तीन बचे हुए सांसद यानी अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजाभाऊ वाजे भी पाला बदल कर एनडीए में आ सकते हैं या फिर भाजपा व शिंदेे ने शरद पवार गुट के भी 5-6 सांसदों को तोड़ने की व्यवस्था कर ली है।
सूत्र यह भी बताते हैं कि भाजपा की ओर से बड़े पवार से कहा गया है कि वे अपनी पार्टी का विलय सुनेत्रा ताई की पार्टी में कर दें ताकि दोनों एनसीपी वहां एक हो सकें। बदले में पवार पुत्री सुप्रिया सूले को केंद्र में मंत्री और उनके कुछ विधायकों को फड़णवीस सरकार में जगह मिल सकती है।’
बागी से दागी होने का ईनाम
शिवसेना उद्धव के राज्यसभा सांसद संजय राउत दावा करते हैं कि ये 6 सांसद पैसों के लालच में पार्टी छोड़ कर गए हैं, इन्हें पार्टी छोड़ने के एवज में बड़ी रकम अदा की गई है। वहीं इन 6 बागियों में एक सांसद ऐसे भी हैं जो अपने मेडिकल कॉलेज को मिल रहे अनुदान अटकने से परेशान थे।
कहते हैं इन सांसद महोदय के मेडिकल कॉलेज का 130 करोड़ रुपया केंद्र पर बकाया था। जो पिछले दो वर्षों से रिलीज ही नहीं पा रहा था। यह पैसा केंद्र सरकार की ओर से ‘इकोनॉमिक वीकर सेक्शन’ यानी आर्थिक तौर पर पिछड़े छात्रों को बतौर अनुदान के तौर पर मिलता है। सूत्र बताते हैं कि इस सांसद महोदय से वायदा किया गया था कि ‘जिस रोज वे उद्धव को छोड़ कर आएंगे उसके अगले ही रोज उनके कॉलेज का बकाया पैसा रिलीज़ कर दिया जाएगा।’
…और अंत में
लाख मशक्कत के बाद भी भाजपानीत एनडीए परिसीमन बिल संसद में पास कराने के जरूरी आंकड़े तक नहीं पहुंच पा रहे। इस बिल को पास कराने के लिए सत्ता पक्ष को लोकसभा के दो तिहाई सांसदों की हामी चाहिए, यह आंकड़ा फिलवक्त 360 का बैठता है, अभी लोकसभा में एनडीए का आंकड़ा 293 सांसदों का है। इसमें अगर ममता के बागी गुट के 20 सांसदों को जोड़ भी लिया जाए तो यह आंकड़ा 313 पर आकर ठिठक जाता है, चलिए अब इसमें शिवसेना उद्धव से टूटे 6 सांसदों को भी जोड़ देते हैं तो भी यह आंकड़ा 319 पर आकर ठहर जाता है। अब भाजपा रणनीतिकारों ने इसका एक नायाब नुस्खा ढूंढा है अगर सदन में वोटिंग के दिन सपा, राजद व झामुमो के कोई 20-30 सांसद गैर हाजिर हो जाते हैं तब परिसीमन बिल का रास्ता साफ हो सकता है, सो, इस दिशा में काम चालू है।


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