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नीतीश बाबू का राजनीतिक ‘खेला’

बिहार के मुख्यमन्त्री श्री नीतीश कुमार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह उत्तर भारत की ग्रामीण राजनीति के संभ्रान्त चेहरा हैं। इसके चलते वह भाजपा के प्रथम प्रशासन दौर वाजपेयी काल में केन्द्रीय कृषि मन्त्री व रेल मन्त्री दोनों रहे और दोनों ही मन्त्रालयों में अपने व्यक्तित्व की छाप छोड़ने में भी सफल रहे। जब वह भाजपा के साथ गठबन्धन करके बिहार की क्षेत्रीय राजनीति में मुख्यमन्त्री पद पर रहे तो उन्हें ‘सुशासन बाबू’ का खिताब राज्य की जनता ने अता फरमाया। वह आजकल भी लालू जी की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के गठबन्धन में मुख्यमन्त्री हैं और उनकी पार्टी जनता दल(यू) का राज्य में अच्छा-खासा जनाधार भी माना जाता है। मगर नीतीश बाबू क्षेत्रीय राजनीति का राष्ट्रीय चेहरा भी माने जाते हैं। जिसके चलते उनके प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार होने की गाथा भी चल पड़ती है लेकिन आज ही उनकी पार्टी जद(यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष लल्न सिंह ने अपने पद से इस्तीफा देकर नीतीश बाबू को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रख दिया और वह सर्वसम्मति से स्वीकार हो भी गया। अतः अब नीतीश बाबू मुख्यमन्त्री होने के साथ जद(यू) के अध्यक्ष भी हो गये हैं। इस बात को लेकर तरह-तरह के रंग दिये जा रहे हैं मगर क्या किसी ने इस बात पर विचार किया है कि जनता दल(यू) से कुछ साल पहले स्व. शरद यादव के बाहर हो जाने के बाद ही जद(यू) का मतलब नीतीश कुमार नहीं हो गया था?
बिहार के मुख्यमन्त्री के रूप में नीतीश बाबू पिछले लगभग डेढ़ साल से यह कोशिश कर रहे थे कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के मुकाबले विपक्षी दलों का एक मजबूत गठबन्धन तैयार किया जाये। यह कार्य उन्होंने इतनी गंभीरता के साथ किया कि कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल को भी इस मोर्चे पर अपना आलस्य तोड़ना पड़ा और सभी प्रकार की अटकलबाजियों और उधेड़बुन के बावजूद विगत जून महीने में उस ‘इंडिया गठबन्धन’ के गठन की घोषणा करनी पड़ी जिसमें 28 राजनैतिक दल शामिल हैं। इस गठबन्धन के बनने में और देर हो सकती थी यदि नीतीश बाबू अति सक्रियता न दिखाते। इसमें भी कोई दो राय नहीं हैं कि 2012 के बाद बिहार की राजनीति के जो समीकरण अदलते- बदलते रहे उनमें नीतीश बाबू को ‘पलटू चाचा’ का खिताब भी दिया गया क्योंकि उन्होंने दो बार लालू जी का साथ छोड़ कर भाजपा की बांह पकड़ी। इससे बेशक उनकी छवि तो प्रभावित हुई मगर उनकी राजनीति का मूल चरित्र नहीं बदला जो कि ग्रामीण व पिछड़ा और दलित समर्थक व धर्मनिरपेक्षता मूलक था। यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि जब तक नीतीश बाबू का राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा से 2012 तक गठबन्धन रहा तब तक भाजपा ने राम मन्दिर, धारा 370 व एक समान नागरिक आचार संहिता जैसे मुद्दों को अपने एजेंडे से बाहर रखा। परन्तु इसके बाद उन्होंने क्षेत्रीय स्तर पर जब भी भाजपा के साथ सहयोग किया तो इन मुद्दों पर उनकी पार्टी के सांसदों ने लोकसभा व राज्यसभा में अपनी अलग राय रखने मंे संकोच नहीं किया।
नीतीश बाबू की राजनीति मूल रूप से कांग्रेस व समाजवादी सिद्धान्तों के बहुत ही निकट रही है। अतः प्राकृतिक रूप से वह गांधीवादी विचारधारा की पोषक राजनीति के पुरोधा वर्तमान समय में कहे जा सकते हैं परन्तु यह कार्य कभी उन्होंने पूरे मन से नहीं किया इसमें भी कोई दो राय नहीं हो सकतीं। सत्ता में रहने के लिए उन्होंने भी समझौते किये हैं जिसके कई उदाहरण गिनाये जा सकते हैं परन्तु इसके बावजूद वह राजनीति में ईमानदारी के समर्थन में ही पाये जाते हैं। जद(यू) का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद लेने से उनकी पार्टी का बिहार में मजबूत होना स्वाभाविक माना जा रहा है। हालांकि बिहार में ही लालू जी उनके कड़े राजनैतिक प्रतिद्वन्द्वी माने जाते रहे हैं परन्तु भाजपा की रणनीतिक चालों की वजह से अब ये दोनों दोस्त बन चुके हैं जिसे देखकर निश्चित रूप से माना जा सकता है। राजनीति में कुछ भी संभव हो सकता है लेकिन इसका मतलब यह निकालना बेमानी होगा कि नीतीश बाबू किसी तौर पर अब भाजपा से हाथ मिला सकते हैं जिसकी अटकलें मीडिया में लगातार लगाई जा रही थीं और कहा जा रहा था कि इंडिया गठबन्धन में उनकी उपेक्षा हो रही है जिसके चलते नीतीश बाबू फिर से पलटी मार सकते हैं। इसकी संभावना इसलिए नहीं है कि अब नीतीश बाबू के राजनैतिक जीवन का यह आखिरी दौर चल रहा है और इस दौर में कोई भी समझदार राजनीतिज्ञ एेसा काम नहीं करेगा जिससे उसके जीवन भर की कमाई पानी में धुल जाये।
हालांकि इसके उदाहरण भी राजनीति में हमें मिल जायेंगे। जिनमें सबसे बड़ा उदाहरण एक जमाने में दलितों के बहुत बड़े नेता और डा. अम्बेडकर के अनुयायी स्व. बी.पी. मौर्य का है जो भारत में रिपब्ल्किन पार्टी के प्रारम्भिक नेताओं में से एक थे मगर अपने जीवन के अन्तिम चरण में वह बारास्ता कांग्रेस के अन्त में भाजपा में शामिल हो गये। चूंकि नीतीश बाबू 1977 के आसपास लोकदल के नेता स्व. चौधरी चरण सिंह की निजी पसन्द थे और युवा लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी थे। अतः उनमें ग्रामीण राजनीति के उज्जवल पक्ष की कामना थी जिसके पीछे गरीबों, अल्पसंख्यकों, वंचितों व पिछड़ों को आगे लाने का संकल्प जुड़ा हुआ था। यही कामना चौधरी चरण सिंह ने लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान व शरद यादव से भी रखी थी और हमने देखा कि बिहार में वह दौर भी गया जब इसकी राजनीति इन्हीं चारों नेताओं के गिर्द-गिर्द घूमने लगी। अतः नीतीश बाबू इस विरासत को छोड़ने के बारे में अब सोच भी कैसे सकते हैं बेशक अंतिम दिनों में उनके स्व. शरद यादव से भी मतभेद तीव्र हो गये थे।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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