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बिहार में नीतीश बाबू की पहेली

बिहार के मुख्यमन्त्री श्री नीतीश कुमार को लेकर जिस तरह अटकलों का बाजार पिछले कुछ अर्से से गर्म नजर आ रहा है उसमें उन्ही की पार्टी जद (यू) के नेताओं का योगदान कुछ ज्यादा नजर आता है क्योंकि वे अपने नेता के बारे में जिस तरह के अधकचरे बयान दे रहे हैं उससे नीतीश बाबू की छवि को ही बट्टा लग रहा है। उनके बारे में अधपके बयानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि वह इंडिया गठबन्धन छोड़ कर पुनः सत्ताधारी भाजपा नीत एनडीए गठबन्धन में जा सकते हैं, वास्तव में उनका अपमान करना ही है जिसे उन्हीं की पार्टी के लोग हवा देते नजर आ रहे हैं। अतः इसके लिए भाजपा को भी दोष नहीं दिया जा सकता। पिछले दिनों बिहार की महागठबन्धन सरकार के प्रमुख घटक दल राष्ट्रीय जनता दल के नेता श्री लालू प्रसाद यादव ने अपने पुत्र तेजस्वी यादव के साथ नीतीश बाबू के घर जाकर उनसे मुलाकात की। तेजस्वी नीतीश सरकार में उपमुख्यमन्त्री हैं। लालू जी राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष हैं अतः तीनों नेताओं की मुलाकात का सबब राज्य सरकार के कार्यसंचालन से ही हो सकता था।
सभी जानते हैं कि पिछला विधानसभा चुनाव नीतीश बाबू ने भाजपा के साथ मिल कर लड़ा था और बहुमत के आंकड़े को उनके इस गठबन्धन ने छुआ था। मगर बीच में ही नीतीश बाबू ने भाजपा का साथ छोड़ कर लालू जी की पार्टी का हाथ थाम लिया और वह मुख्यमन्त्री के पद पर भी बरकरार रहे। राजनीति में यह कोई अनैतिक कार्य नहीं माना जाता है क्योंकि इससे पहले नीतीश बाबू ने 2015 में विधानसभा चुनाव लालू जी की पार्टी के साथ मिल कर लड़ा था और बहुमत आने के बाद मुख्यमन्त्री पद संभाला था। मगर 2017 में वह लालू जी का हाथ छोड़ कर भाजपा के साथ हो लिए थे। असल बात यह समझी जा रही है कि नीतीश बाबू चाहते हैं कि 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों के साथ ही बिहार विधानसभा के चुनाव भी करा लिये जायें और राज्य के माहौल को देखते हुए भाजपा के खिलाफ निर्णायक जीत प्राप्त की जाये। फिलहाल 243 की विधानसभा में भाजपा के 78 सदस्य हैं जो कि अभी तक के बिहार विधानसभा के इतिहास में भाजपा की सबसे बड़ी संख्या है। नीतीश बाबू मानते हैं कि भाजपा की यह जीत 2020 के चुनावों में इस वजह से हुई क्योंकि वह भाजपा के साथ थे। जनता ने उनका मुंह देख कर भाजपा व जद(यू) गठबन्धन के प्रत्याशियों को वोट दिये थे। भाजपा भी जानती है कि बिहार में 2005 से ही उसकी असली ताकत नीतीश बाबू रहे हैं क्योंकि इसके बाद से ही राज्य में भाजपा का ग्राफ बढ़ना शुरू हुआ है। परन्तु राजनीति में चीजें सदा एक जैसी नहीं रहती हैं।
2020 में नीतीश बाबू की पार्टी के केवल 45 विधायक ही जीत पाये थे। इसका दुख उन्हें तभी से साल रहा है। इसीलिए वह बिहार विधानसभा का चुनाव समय से पहले कराने पर जोर देते लग रहे हैं और मान रहे हैं कि लोकसभा चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनावों में भी जनता उनके लालू के साथ व कांग्रेस के सहयोग के गठबन्धन को अच्छे मत देकर जितायेगी क्योंकि उनकी सरकार ने जनता से किये गये वादों को पूरा किया है। रोजगार के मोर्चे पर नीतीश सरकार ने लाखों युवकों को शिक्षकों की नौकरियां दी हैं और गरीब से गरीब परिवार को दो लाख रुपये देने के वादे पर अमल शुरू कर दिया है। जाति गत जनगणना कराने के बाद गरीबों व अति पिछड़ों की जो संख्या निकल कर आयी है उसकी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उनकी सरकार कृत संकल्प है। मगर लालू जी जल्दी चुनाव कराने के पक्ष में नहीं लगते हैं और मानते हैं कि जब विधानसभा का कार्यकाल डेढ़ साल और है तो इतनी जल्दी चुनाव कराने से क्या लाभ हो सकता है। वर्तमान में लालू जी की पार्टी के 79 सदस्य है और वह विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है। मगर नीतीश कुमार को राजनीति का घाघ माना जाता है। वैसे लालू भी कम घाघ नहीं समझे जाते मगर एक अन्तर है। अन्तर यह है कि लालू जी अब सक्रिय चुनावी राजनीति में नहीं हैं। उनके स्थान पर उनके दोनों बेटे व कुछ बेटियां हैं।
नीतीश बाबू को वैसे महागठबन्धन का अभिभावक कहा जाता है और उनका मत बताया जाता है कि जल्दी चुनाव कराने से उनकी पार्टी में छिपे बैठे उन तत्वों को किनारे किया जा सकता है जो अब भी भाजपा से आस लगाये हुए हैं। इस प्रकार यह नीतीश बाबू की पार्टी का अन्दरूनी मामला भी है मगर उनका भविष्य लालू जी की पार्टी के साथ बावस्ता है अतः वह अपने दम पर कोई फैसला नहीं ले सकते और यदि एेसा करते हैं तो उन पर ‘पलटूराम’ का तगमा फिर चिपक जायेगा। वैसे नीतीश बाबू का फैसला राजनीतिक रूप से ज्यादा समझदारी का लगता है क्योंकि बिहार में इंडिया गठबन्धन का जो फिलहाल समीकरण है उसमें भाजपा के पास राज्य की कुछ एेसी छोटी पार्टियां हैं जिन्हें ‘लटकन पार्टियां’ कहा जा सकता है। इनमें जीतन राम मांझी की पार्टी से लेकर पासवान की लोकजन शक्ति पार्टी के दोनों समूह शामिल हैं। भाजपा इन लटकनों के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने में सक्षम नहीं मानी जा रही है। अब यह लालू जी को देखना है कि उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता क्या कहती है।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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