दो धड़ों में बंटती नीतीश की पार्टी

‘तेरे पहलू में थे और
तेरे गुनहगार भी
तेरी हां में भी थे और तेरे
इंकार में भी’
दबाव में ही सही जब से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली जाने को राजी हो गए हैं, उनकी पार्टी में इस बात को लेकर आपसी खींचतान परवान चढ़ने लगी है। ताजा मामला जदयू के दो दिग्गजों नीतीश सरकार में मंत्री श्रवण कुमार और पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा के आपसी टंकार से समझा जा सकता है। झा जदयू के राज्यसभा सांसद भी हैं और भाजपा व जदयू के बीच एक समन्वय सेतु का काम करते हैं। सूत्रों की मानें तो नीतीश के राज्यसभा जाने के मुद्दे पर दोनों नेताओं में तीखी झड़प हो गई, जदयू के मंत्री ने अपनी ही पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पर भाजपा के हाथों में खेलने के आरोप मढ़ दिए। साथ ही यह तुर्रा भी उछाल दिया कि इससे अच्छा होता कि हम पिछली बार की तरह इस बार भी अकेले ही चुनाव लड़ जाते, बगैर भाजपा के सहारे के।’ कहते हैं श्रवण के इस उलाहने पर झा साहब के भी सब्र का बांध टूट गया, उन्होंने उलाहना भरे स्वरों में कहा-’अकेले लड़ कर कौन सा तीर मार लिया था, आप जैसे सलाहकारों ने ही विधानसभा में जदयू की गिनती 43 विधायकों पर समेट दी थी, इस बार हम भाजपा के साथ मिलकर लड़े तो हमारी गिनती 85 तक आ गई।’ सूत्रों की मानें तो नीतीश को राज्यसभा में ले जाने वाला भगवा चक्रव्यूह कल को उनके गले की ही मुसीबत बन सकता है। इस मुद्दे पर नीतीश की पार्टी में भी दोफाड़ हो सकता है।
भाजपा की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि बिहार में आज भी उसे अगड़ों की ही पार्टी माना जाता है। वह तो सुशासन बाबू का चमत्कार था कि वे थोक भाव में महिला वोट और 30 फीसदी से भी ज्यादा ईबीसी वोट भाजपा के पक्ष में ट्रांसफर करा सकने का माद्दा रखते हैं। लव-कुश वोटरों पर भी नीतीश की उतनी ही जबर्दस्त पकड़ है। अब अगर नीतीश बिहार छोड़-छाड़कर दिल्ली चले जाते हैं तो उनके परंपरागत कुर्मी-कोयरी, महिला वोटर और ईबीसी वोटरों का एक बड़ा तिलिस्म ढह सकता है, ये वोट टूट कर भाजपा विरोधी पार्टियों की झोली में जा सकते हैं।
शायद लालू परिवार की पार्टी राजद इस टूट की सबसे बड़ी लाभार्थी के तौर पर उभर सकती है। वहीं नीतीश को केंद्र में डिप्टी पीएम बनाने का मामला भी फिलहाल खटाई में पड़ गया लगता है, सो कहते हैं भाजपा की ओर से नीतीश को एक नया प्रस्ताव मिला है कि ‘वे एनडीए के संयोजक बन जाएं।’ वहीं नीतीश करीबियों का मानना है कि ‘नीतीश को लंबे वक्त तक नाथ कर नहीं रखा जा सकता, वक्त आने पर वे अपना असली रंग दिखाने में माहिर हैं।’
ममता को कैसे नाथने में जुटी है भाजपा : इस बार के बंगाल चुनाव में भाजपा अपनी पूरी ताकत झोंक रही है, वहीं ममता ने भी पलटवार के लिए पूरी तरह से कमर कस रखी है। भाजपा के पास एसआईआर के रूप में एक बड़ा हथियार है, एसआईआर के पहले ही फेज में पश्चिम बंगाल में 62 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए हैं, इसके बाद 65 लाख ऐसे मतदाताओं की सूची को तैयार कर उसे ‘विचाराधीन’ के अंतर्गत डाल दिया गया है। सूत्र बताते हैं कि इन 65 लाख विचाराधीन मतदाताओं के नाम भी कटने हैं। पर्यवेक्षकों का यह भी दावा है कि ‘इन 1 करोड़ 27 लाख मतदाताओं में ज्यादातर ममता के ही वोटर्स हैं।’ अगर बंगाल के कुल मतदाताओं के आंकड़ों पर एक नज़र डालें तो यह एक करोड़ 27 लाख का आंकड़ा लगभग 18 फीसदी बैठता है, यानी ममता एक ही झटके में अपने 18 फीसदी समर्थक वोटरों से हाथ धो बैठेंगी। यह इतना बड़ा आंकड़ा है जो ममता की हार-जीत के निर्णय पर अपनी अंतिम मुहर लगा सकता है। यदि ममता ने ज्यादा तेवर दिखाए, राज्य में उनके समर्थकों ने ज्यादा हाय-तौबा मचाई तो भाजपा के पास इसका ‘प्लॉन बी’ भी तैयार है, यानी राज्य में कानून व्यवस्था का हवाला देकर प्रदेश को फौरन राष्ट्रपति शासन के हवाले किया जा सकता है, राज्य में नए गवर्नर आर.एन. रवि की नियुक्ति भी कहीं इसी बात को ओर इशारा तो नहीं कर रही?
सबके राम कांशीराम: आज के दिन रविवार को यानी 15 मार्च को दलित समाज के बड़े नेता कांशीराम की जयंती है, यूं तो बसपा उनकी विचारधारा की कोख से ही पनपी है, पर अब यूपी के तमाम राजनैतिक दलों में कांशीराम की विरासत हासिल करने की एक अघोषित जंग छिड़ गई है। कांग्रेस, बसपा, सपा, आजाद समाज पार्टी जैसे तमाम दल कांशीराम की वैचारिक विरासत पर अपना दावा ठोक रहे हैं। सूच पूछिए तो यह सारा उपक्रम 2027 के आने वाले यूपी चुनावों की आहटों से ही जुड़ा है। ये तमाम दल यूपी के दलित मतदाताओं तक पहुंचने की सीधी कवायद में जुटे हैं। 1990 से पहले यूपी के दलित जनाधार पर बसपा के उभार से पहले कांग्रेस पार्टी का दबदबा हुआ करता था। राहुल गांधी ने सबसे पहले दलित चेतना का अलख जगाने का काम किया है, उनका पूरा फोकस हालिया दिनों में सामाजिक न्याय, जाति जनगणना और अनुपातिक प्रतिनिधित्व पर रहा है जो कहीं न कहीं कांशीराम के उस चर्चित नारे की याद दिलाता है, जिसमें वे कहते थे-’ जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी।’ कांशीराम की वारिस मायावती ने भी इसी संदेश को आगे बढ़ाने का काम किया। वहीं यूपी में अगली बार सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार सपा भी इस रेस में पीछे नहीं है। अखिलेश और उनकी पार्टी का पूरा फोकस पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) सामाजिक गठबंधन को बढ़ावा देने वाला है। सपा ने 15 मार्च को कांशीराम के जन्मदिवस के मौके पर राज्यभर में कई समारोह आयोजित किए हैं। जबकि आजाद समाज पार्टी के सिरमौर चंद्रशेखर आजाद की भी इस मौके पर आगरा में एक बड़ी रैली करने की योजना है। यूपी में दलित मतदाताओं का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि राज्य की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं। वहीं कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी भी 13 मार्च से लगातार यूपी में अपनी दस्तकें दे रहे हैं।
शंकराचार्य बनाम योगी : यूपी के उत्साही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भाजपा की तरफ से बार-बार यह गुहार लगाई जा रही है कि ‘वे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के मुद्दे को अब ज्यादा छेडे़ नहीं, क्योंकि आने वाले यूपी चुनाव में यही मुद्दा सत्ताधारी दल को एक अलग दर्द दे सकता है।’
शंकराचार्य मुद्दे पर लोगों में भी किंचित रोष दिख रहा है। बदलते सियासी घटनाक्रमों के मद्देनज़र पिछले दिनों शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की मुलाकात सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के संग हुई। शंकराचार्य 10-11 मार्च को अपनी 81 दिवसीय ‘कविष्टि यात्रा’ (गौ रक्षा संघर्ष के लिए एक वैदिक शब्द) की पहले ही घोषणा कर चुके हैं। यह गौ-कल्याण पर केंद्रित एक राज्यव्यापी अभियान होगा, जिसका शंखनाद 3 मई को योगी के गढ़ गोरखपुर से ही होगा। यह यात्रा यूपी के सैकड़ों गांवों को कवर करने के बाद वापिस 23 जुलाई को लखनऊ में ही समाप्त होगी। इसके बाद 24 जुलाई को लखनऊ में एक बड़े आयोजन का प्लॉन है, जिसमें गौ हत्या के तथ्यों का खुलासा किया जाएगा। शंकराचार्य की इस यात्रा का उद्देश्य गाय को ‘राष्ट्र माता’ घोषित करना और पूरे देश में गौ हत्या पर प्रतिबंध लगवाना है। शंकराचार्य ने एक चतुरंगिणी सेना के गठन का भी ऐलान किया है। अब सपा सुप्रीमो के साथ शंकराचार्य की क्या बात हुई यह ज्ञात नहीं पर इतना तय है कि यूपी चुनाव से पहले शंकराचार्य की इस ‘कवि​िष्ट यात्रा’ ने संघ व भाजपा की पेशानियों पर जरूर बल ला दिए हैं।
…और अंत में
भाजपा के नए-नवेले राष्ट्रपति अध्यक्ष नितिन नबीन भले ही पार्टी की मुख्यधारा की राजनीति में नए-नए हों पर उन्होंने सियासी शह-मात के दांव सीखने शुरू कर दिए हैं। इस 16 मार्च को उनका चुनाव ऊपरी सदन या राज्यसभा के लिए होना है। सूत्र बताते हैं कि इसके बाद उन्हें एक और सीढ़ी चढ़ने को मिल सकती है। उन्हें राज्यसभा में सदन के नेता जेपी नड्डा की जगह भाजपा ऊपरी सदन में अपना नया नेता चुन सकती है यानी अध्यक्ष जी का रुतबा भी बढ़ेगा और उनका दायित्व भी।

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