फारसी के इतिहासकार, मिर्जा संगी बेग ने बिल्कुल सही कहा था कि दिल्ली की एक-एक ईंट पर इतिहास लिखा है, मगर आमतौर से लाल किला, कुतुब मीनार, इंडिया गेट, जामा मस्जिद, संसद भवन, आकाशवाणी भवन, जैन मंदिर, गौरी शंकर मंदिर आदि का तो गुणगान होता रहता है, मगर बस अड्डे से आगे अलीपुर रोड पर स्थापित ऐतिहासिक सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली, अर्थात केंद्रीय विधानसभा भवन को भुला दिया गया है। इसका एक प्रगाढ़ रिश्ता विट्ठलभाई पटेल (1873-1933) कृतित्व और नेतृत्व से भी जुड़ा हुआ है। भले ही उन्हें भुला दिया गया हो, मगर इतिहास हमेशा यह याद रखेगा और याद दिलाता रहेगा कि यह भवन एक ऐसे महामानव को समर्पित है, जिसने भारतीय संसदीय परंपरा को लोक सम्मत दिशा देते हुए उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।
यह भी एक खेद का विषय है कि दिल्ली वाले विट्ठलभाई पटेल के बारे में कुछ नहीं जानते, सिवाय इसके कि उनके नाम में दिल्ली के संसद मार्ग पर एक विट्ठलभाई पटेल भवन है। केंद्रीय विधानसभा भवन के गलियारों में 1925 से 2025 तक की संसदीय यात्रा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव, म्यूरल्स, कोलाज आदि द्वारा दिल्ली व नई दिल्ली का पूर्ण इतिहास दर्शाया गया है। इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल से सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली तक और संविधान सदन से लेकर, नवनिर्मित संसद भवन का, जहां इसके पहले स्पीकर स्पीकर विट्ठलभाई पटेल थे आज 2025 में इसके स्पीकर विजेंद्र गुप्ता हैं, जिनके नेतृत्व में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण कॉफी टेबल बुक है, “शताब्दी यात्रा-वीर विट्ठलभाई पटेल”, जिसे दिल्ली विधानसभा सचिवालय ने तैयार किया है। वास्तव में संसद भवन की स्थापना से पूर्व यही सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली भवन, भारत की संसद का कर्त्तव्य निभाता रहा। यह गवाह है कई दिल्ली दरबारों का, भारत की आजादी के दिल की है धड़कन का और सौ साल की दिल्ली के उतार-चढ़ाव का।
इस भवन की दीवारों में विठ्ठलभाई पटेल की आत्मा है। वे वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई थे और उनसे कहीं अधिक प्रतिभाशाली और गुणवान थे। यह अलग बात है कि राजनीति में उन्हें वह स्थान नहीं प्राप्त हुआ जो उनके भाई वल्लभभाई को, जो कि आजाद भारत के प्रथम मंत्रालय में गृहमंत्री बन गए थे। भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के बिल्कुल केंद्र में विट्ठलभाई पटेल खड़े थे, जो 1925 में केंद्रीय विधानसभा के प्रथम निर्वाचित भारतीय अध्यक्ष थे। एक कानूनी दिग्गज, स्वराज पार्टी के सह-संस्थापक, वैश्विक क्रांतिकारी और सरदार वल्लभभाई पटेल के ज्येष्ठ भ्राता और भारत के सड़कों पर लड़े गए संग्रामों के आधार स्तंभों में एक थे। यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य है कि 1912 से 1933 का कालखंड, भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सर्वाधिक निर्णायक युग था जिसमें महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, मौलाना आज़ाद, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, डॉ. साहब केशव बलिराम हेडगेवार, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सरदार पटेल जैसे अग्रिम पंक्तियों के स्वतंत्रता सेनानियों ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी थी। इन सभी में, विट्ठलभाई पटेल वह केंद्रीय शक्ति थे, जिन्होंने इन विविध प्रयासों को मूल भाव से प्रेरित रणनीतिक मस्तिष्क के रूप में उनकी परिणिति तक पहुंचाया।
गांधी जी उन्हें फकीर कहा करता थे क्योंकि अपनी जरूरत भर का पैसा रख, शेष गांधीजी को भेज दिया करते थे। जिस समय विट्ठलभाई पटेल जेनेवा, स्विट्जरलैंड में थे और भारत की आजादी के प्रयत्न हेतु अमेरिका भी गए, उस समय सुभाष चंद्र बोस भी जेनेवा में थे। दिन-रात अत्यधिक कार्य करते उनका स्वास्थ्य बिगड़ा और 22 अक्तूबर 1933 को वे परलोक सिधार गए। जब वे अस्वस्थ थे और बचने की उम्मीद कम थी तो अपनी वसीयत वे 2 अक्तूबर को ही सुभाष चंद्र बोस जी के लिए छोड़ गए, जिस में उन्होंने लिखा था, “यदि मेरा देहांत यूरोप में होता है, तो मेरी इच्छा है कि मेरे पार्थिव शरीर को सुभाष चंद्र बोस भारत लाएं और अंतिम संस्कार बम्बई की चौपाटी पर हो, जहां बाल गंगाधर तिलक का अंतिम संस्कार हुआ था।”
विट्ठलभाई पटेल की वसीयत को पूर्ण करने के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने लिखा, “मैं यह कहना चाहूंगा कि इस वसीयत के उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए मुझे इन मित्रों की सहायता और सलाह की आवश्यकता है, जो उनकी नीति और कार्यक्रमों को ईमानदारी से लागू करने के इच्छुक हैं। इस समय उन लोगों के नाम ले पाना मेरे लिए कठिन है, किन्तु मैं श्री के.एफ. नरीमन, श्री एस.ए. बावेरी, श्री आर. भवन, श्री दीपनारायण सिंह आदि को साथ लेना चाहता हूं। वसीयत से स्पष्ट है कि मुझे इसका एकमात्र उत्तराधिकारी बनाया गया है, मैं इस कार्य को जनता की संतुष्टि के लिए पूरी जिम्मेदारी से वैधानिक विधि से पूरा करना चाहता हूं ताकि वसीयत और नियमों का उल्लंघन न हो और स्वर्गीय नेता के प्रति मैं जिम्मेदार रहूं।”हालांकि वीर विट्ठलभाई पटेल ने अपनी वसीयत में अपना अंतिम संस्कार बम्बई की चौपाटी में लोकमान्य तिलक का जहां अंतिम संस्कार हुआ था, वहीं उनके बराबर के स्थान पर किए जाने की इच्छा व्यक्त की थी, मगर दुर्भाग्यवश उस समय की जालिम ब्रिटिश सरकार ने इनका संस्कार वहां पर नहीं होने दिया, अतः उनका अंतिम संस्कार सोनापुर श्मशानघाट पर किया गया।
1951 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने चौपाटी पर, जहां वे अपना अंतिम संस्कार चाहते थे, किया और उसी स्थान पर उनकी आदमकद प्रतिमा लगा दी। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 14 अक्तूबर 1950 को अहमदाबाद के टाउन हॉल ने वीर विट्ठलभाई पटेल की प्रतिमा के अनावरण के समय कहा, ” मैं श्री विट्ठलभाई का एक प्रकार से भक्त रहा हूं और वे भारत वर्ष के उन लोगों में थे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, अपनी जान तक दे दी और इस काम को सफल बनाया। जो लोग बच गए हैं, उन्हें इस बात का दुख अवश्य है कि वे उस दिन तक जीवित न रह सके कि जिस दिन उनके प्रयत्नों की, उनके त्यागों का फल भारत को और संसार को देखने को मिला।
इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि उनकी आत्मा भारत को देखकर खुश होती होगी और जिस आजादी के लिए, जिस स्वतंत्रता के लिए उन्होंने अपना जीवन दान दे दिया, उस स्वतंत्रता की मर्यादा बढ़ाने में देश के लोग कोई भी कसर नहीं रख छोड़ेंगे और उसे हमेशा के लिए सुरक्षित रखेंगे। “विट्ठलभाई पटेल के अंतिम शब्द थे, “मेरे देशवासियों और विश्व भर में भारत के सभी मित्रों को मेरा आशीर्वाद देना। अपने प्राण त्यागने से पूर्व मैं भारत की शीघ्र स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए प्रार्थना कर रहा हूं।”
भारतीय संसद के सौ साल और विट्ठलभाई पटेल
Summary :
फारसी के इतिहासकार, मिर्जा संगी बेग ने बिल्कुल सही कहा था कि दिल्ली की एक-एक ईंट पर इतिहास लिखा है, मगर आमतौर से लाल किला, कुतुब मीनार, इंडिया गेट, जामा मस्जिद, संसद भवन, आकाशवाणी भवन, जैन मंदिर, गौरी शंकर मंदिर आदि का तो गुणगान होता रहता है, मगर बस अड्डे से आगे अलीपुर रोड पर स्थापित ऐतिहासिक सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली, अर्थात केंद्रीय विधानसभा भवन को भुला दिया गया है। इसका एक प्रगाढ़ रिश्ता विट्ठलभाई पटेल (1873-1933) कृतित्व और नेतृत्व से भी जुड़ा हुआ है। भले ही उन्हें भुला दिया गया हो, मगर इतिहास हमेशा यह याद रखेगा और याद दिलाता…


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