पाकिस्तान में सिखों के ऐतिहासिक गुरुद्वारों और शहीदी स्थलों की बदहाल स्थिति एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करती है। एक ओर पाकिस्तान खुद को सिखों का हमदर्द बताकर उन्हें अपने धार्मिक स्थलों के दर्शन के लिए आमंत्रित करता है, वहीं दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट दिखाई देती है। लाहौर में शहीद भाई तारु सिंह के शहीदी स्थल का पिछले लगभग छह वर्षों से सील रहना इसी विरोधाभास का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह स्थल न केवल पाकिस्तान के सिखों, बल्कि पूरी दुनिया की सिख संगत के लिए गहरी आस्था और इतिहास से जुड़ा हुआ है। सिख धर्म में भाई तारु सिंह का विशेष स्थान है, मुगलिया हकूमत ने भाई तारु सिंह की खोपड़ी सिर से अलग कर दी क्यांेकि उन्हांेने अपना धर्म बदलने से इन्कार कर दिया था। ऐसी लासानी शहादत की मिसाल और कोई नहीं मिल सकती। सिख धर्म में अरदास में भाई तारु सिंह का जिक्र हमेशा आता है। उन्हीं भाई तारु सिंह की यादगार को मिटाने की सोच के चलते पाकिस्तानी इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड द्वारा इसे बंद कर देना और वर्षों तक कोई ठोस समाधान न निकलना यह दर्शाता है कि उनमें धार्मिक विरासत के संरक्षण को लेकर गंभीरता का अभाव है। इससे भी चिंताजनक बात यह है कि इस दौरान संगत को बार-बार आश्वासन दिया जाता रहा कि गुरुद्वारों के नवीनीकरण और शहीदी स्थलों के पुनरुद्धार के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर स्थिति वैसी ही बनी हुई है। स्थानीय विवादों और प्रशासनिक उदासीनता के चलते इस पवित्र स्थल के आसपास अतिक्रमण बढ़ता गया, दुकानों और मकानों का दबाव बढ़ा, और नतीजतन यह ऐतिहासिक धरोहर उपेक्षा का शिकार होती चली गई। सवाल यह है कि जब किसी स्थान का संबंध इतनी महान शहादतों से हो, तो क्या उसे इस तरह बंद कर देना और उसकी देखभाल में लापरवाही बरतना क्या उचित ठहराया जा सकता है? पाकिस्तान में यह कोई एक स्थान नहीं है अनेक ऐसे गुरुद्वारा साहिब और शहीदी स्थलों पर भी इसी तरह के हालात हैं। यह मुद्दा केवल एक धार्मिक स्थल का नहीं, बल्कि अल्पसंख्यकों की आस्था, अधिकारों और सांस्कृतिक विरासत के सम्मान का है। अगर पाकिस्तान वास्तव में सिख समुदाय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाना चाहता है, तो उसे केवल बयानबाज़ी से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। बंद पड़े शहीदी स्थलों को तुरंत खोला जाए, उनके संरक्षण और रखरखाव की पारदर्शी व्यवस्था की जाए और संगत को बिना किसी बाधा के दर्शन की अनुमति दी जाए। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसे मुद्दों पर ध्यान दिया जाए, ताकि धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित किया जा सके। शहादत की इस पवित्र विरासत को यूं उपेक्षित छोड़ देना न केवल इतिहास के साथ अन्याय है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों से उनकी पहचान छीनने जैसा भी है।
धर्म के ठेकेदारों द्वारा सिखी का दायरा कम करना शर्मनाक : सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोबिन्द सिंह जी तक सभी गुरु साहिबान ने सिखों को कर्मकाण्ड, पाखण्ड से दूर करते हुए बहुत ही सरल भाव से सिखी की मान्यताओं का पालन करने की प्रेरणा दी थी। गंुरु साहिबान ने तो यहां तक कहा था कि नाम सिमरन, गुरबाणी पाठ का कोई समय निर्धारित नहीं है बल्कि दिन के 24घंटे सिख को अकाल पुरख का ध्यान करना चाहिए। मगर मौजूदा समय में जो लोग धर्म के ठेकेदार बने बैठे हैं उनके द्वारा एक बार फिर से सिखी के तौर तरीकों को पाबंदियों की जंजीरों में जकड़ते हुए सिखी का दायरा निरन्तर कम किया जा रहा है। इसी के चलते युवा वर्ग सिखी से दूर हो रहा है, गैर सिख जिनकी आस्था गुरुघर के प्रति हो उन्हें सहजधारी कहा जाता है, मगर उन्हें भी यह लोग अपने से दूर करते जा रहे हैं। सिख नेताओं की तंग सोच के चलते आज रविदास भाईचारा सिखों से दूरी बनाता दिख रहा है।
हाल ही बंगाल की एक नेता द्वारा मंच से मूल मंत्र का उच्चारण करने को लेकर बिना वजह का विवाद खड़ा कर दिया गया। सिख धर्म के लोगों को इस बात पर गर्व होना चाहिए था कि एक बंगला औरत के द्वारा सिख धर्म के प्रति ज्ञान रखते हुए मूल मंत्र को याद किया गया और जिस प्रकार से उन्हांेने उच्चारण किया उसे देखकर ऐसा प्रतीत नहीं होता कि उन्होंने सिर्फ पब्लिसिटी के लिए ऐसा किया। इतना ही नहीं तख्त दमादमा़ साहिब के जत्थेदार टेक सिंह धनौआ ने तो पत्र लिखकर उन्हें नसीहत तक दे डाली। किसी गैर सिख के द्वारा अंजाने में भी मामूली सी गलती पर धर्म के ठेकेदार जमकर हौ हल्ला करते हैं मगर जब सिखों के द्वारा गुरु साहिबान के प्रति पूरी जानकारी होने के बावजूद गुरु की हजूरी एक दूसरे की पगड़ियां तक उतार दी जाती हैं और नंगे सिर एक दूसरे पर हमला बोलते हैं, जो हाल ही में विदेश के एक गुरुद्वारा में देखने को मिला, मगर अफसोस कि इस पर किसी जत्थेदार यां धार्मिक नेता यां जत्थेदार का कोई बयान नहीं आया।
धर्म प्रचार के क्षेत्र में अन्थक सेवाएं देने वाले सिख नेता परमजीत सिंह वीरजी की माने तो सिख धर्म का मूल स्वरूप समावेशी और सार्वभौमिक रहा है। “इक ओंकार” का संदेश ही यह बताता है कि ईश्वर एक है और उसका मार्ग किसी एक जाति, भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। अगर हर पहल को आपत्ति और विरोध के नजरिए से देखा जाएगा, तो यह सिखी के उस वैश्विक और उदार स्वरूप के विपरीत होगा, जिसने सदियों से लोगों को जोड़ने का काम किया है। आज के दौर में जब पहचान की राजनीति और धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, ऐसे उदाहरणों को एक अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है। जहां संवाद, समझ और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिले। यदि सयानी घोष जैसे जनप्रतिनिधि सिखी के प्रति सम्मान दिखाते हैं तो यह एक सकारात्मक संकेत भी हो सकता है, जिसे सही दिशा में ले जाने की जरूरत है। निस्संदेह, मर्यादा और परंपरा की रक्षा जरूरी है लेकिन उतना ही जरूरी है उसका विस्तार और प्रसार। सिखी की ताकत उसकी समावेशिता में है, न कि सीमाओं में बांधकर उसे सीमित करना चाहिए।
पाकिस्तान आस्था को कैद कर ‘हमदर्दी का ढोंग बंद करे
Summary :
पाकिस्तान में सिखों के ऐतिहासिक गुरुद्वारों और शहीदी स्थलों की बदहाल स्थिति एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करती है। एक ओर पाकिस्तान खुद को सिखों का हमदर्द बताकर उन्हें अपने धार्मिक स्थलों के दर्शन के लिए आमंत्रित करता है, वहीं दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट दिखाई देती है। लाहौर में शहीद भाई तारु सिंह के शहीदी स्थल का पिछले लगभग छह वर्षों से सील रहना इसी विरोधाभास का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह स्थल न केवल पाकिस्तान के सिखों, बल्कि पूरी दुनिया की सिख संगत के लिए गहरी आस्था और इतिहास से जुड़ा हुआ है। सिख धर्म…


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