एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर देश का मिजाज जहां कुछ और ही कह रहा है, वहीं इन हालातों में भी सत्ता पक्ष की असली चिंता संसद में परिसीमन बिल को पास कराने की है। संसद के मानसून सत्र को स्थगित हुए कोई दो महीने का वक्त होने वाला है, फिर भी सरकार का इरादा विलंबित मानसून सत्र को दुबारा बुला इसमें परिसीमन बिल पास कराने का है। सरकार को इस बात का बखूबी इल्म है कि ’19 अलग-अलग दलों के विपक्षी इंडिया गठबंधन की ताकत सदन में घटी है, कभी इसके लोकसभा में 233 सदस्य हुआ करते थे, जो आज तृणमूल टूट व डीएमके के जाने से 47 सीटें घट कर महज़ 178 रह गई हैं।
भाजपा की असली चुनौती डीएमके को मनाने की है, मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर पूरे देश में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों से डीएमके ने अब तक अपने को अलग रखा हुआ है, वैसे तो इस बारे में सीएम विजय की पार्टी टीवीके का भी कोई आधिकारिक स्टैंड सामने नहीं आया है। टीवीके ने अभी राज्य में हुए दोनों उप चुनाव जीत लिए हैं, यह दोनों सीटें डीएमके विधायकों के इस्तीफे के उपरांत ही खाली हुई थी, जिसे टीवीके ने अपने टिकट पर फिर से चुनावी मैदान में उतार दिया और ये दोनों ही जीत गए। डीएमके को लगता है जहां एसआईआर से उसको नुक्सान हुआ है, वहीं टीवीके इसकी लाभार्थी है, शायद यही वजह है कि वह न तो मुख्य चुनाव आयुक्त और न ही एसआईआर के खिलाफ ही खुल कर कोई स्टैंड ले पा रही है। डीएमके का नेतृत्व जानता है कि परिसमीन बिल पर समर्थन देना एक तरह से अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है, इसीलिए वह बार-बार भाजपा के हाथ मिलाने के प्रस्ताव को इग्नोर कर रही है। चूंकि राज्य में कांग्रेस ने उसका साथ छोड़ टीवीके का दामन थाम लिया है सो, वह कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन का हिस्सा भी नहीं होना चाहती, हालांकि राहुल गांधी से स्टालिन के अब भी बेहतर रिश्ते हैं। सो, डीएमके में एक नई सोच ने जन्म लिया है कि ‘क्यों नहीं कॉकरोच पार्टी का ही समर्थन कर दिया जाए?’
बयानबाजियां ?
पिछले दिनों हैदराबाद की नालसार यूनिवर्सिटी में वहां के कानून के छात्रों को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के सबसे ईमानदार जज में शुमार होने वाले जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने अपने संबोधन में एसआईआर आर प्रक्रिया पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा था-‘लाखों भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी है।
बड़े आश्चर्यजनक तौर पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई का इस पर एक बयान सामने आया जिसमें वे जस्टिस भुइयां को ही आड़े हाथों लेते दिखे, गवई का कहना था-‘सार्वजनिक मर्यादा किसी सिटिंग जज को ऐसे मामले में सार्वजनिक टिप्पणी करने की अनुमति नहीं देती है जो पहले से ही अदालत में लंबित हो।’ तब से ही कानून जगत से जुड़े लोग जस्टिस गवई की बातों व उसके कहने के समय का निहितार्थ ढूंढने में लगे थे।
‘लाल हिट जनता पार्टी’ किसके लिए?
बदलते वक्त के साथ राजनीति जन सरोकारों को मुंह चिढ़ाते अपने प्रायोजित अवतार में ढलती जा रही है, इसकी ताजातरीन मिसाल है एक नई राजनैतिक पार्टी का उदय जिसे ‘लाल हिट जनता पार्टी’ का नाम दिया गया है। आपको ज्ञात रहे कि ‘हिट’ एक पॉपुलर कीटनाशक स्प्रे है, जिसका लाल हिट वर्जन खास कर काॅक्रोचों के सफाया के लिए इस्तेमाल होता है। अब तक आप इस पार्टी के गठन की मंशा और इसका असली उद्देश्य तो समझ ही गए होंगे। इस संगठन का कहना है कि हमें दिल्ली में अपार जनसमर्थन मिल रहा है।
यह संगठन दिल्ली पुलिस को भी समर्थन दे रहा है। संगठन के 200 सदस्य अपने लीडर अयान भटनागर के नेतृत्व में 9 अक्तूबर को कनाट प्लेस में इकट्ठा हुए थे। पर ये भटनागर कौन हैं? इनके बारे में कोई कुछ नहीं जानता, बस ये जन प्रदर्शनों के बजाए कानूनी व संस्थागत बातचीत की वकालत करते हैं।
क्या दो नावों की सवारी कर रहे हैं अखिलेश?
यूपी के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं सपा व कांग्रेस में सीटों के तालमेल को लेकर संग्राम बढ़ता ही जा रहा है। अब कांग्रेस के नेतागण ही दबी जुबान से कहने लगे हैं कि ‘अखिलेश एक साथ दो नावों की सवारी करना चाह रहे हैं, बाहर से तो वह कांग्रेस के साथ का दिखावा कर रहे हैं, पर अंदरखाने से उन्होंने भाजपा से हाथ मिला रखे हैं। अपने चाचा प्रोफेसर राम गोपाल यादव को ऊपरी सदन भेज कर उन्होंने भाजपा के लिए अपना दूत दिल्ली में बिठा रखा है, क्योंकि यह कोई छुपी बात नहीं कि प्रोफेसर साहब के भाजपा नेताओं से बेहद मधुर रिश्ते हैं। वहीं अपनी दूसरी राज्यसभा सीट से अखिलेश ने रिलायंस समूह से जुड़े परिमल नाथवानी के जिस पुत्र धनराज नाथवानी को नवाजा है, अभी उन्होंने अपने एक्स हेंडिल से भाजपा सरकार की तारीफ में खुलकर कसीदे पढ़े हैं, क्योंकि भाजपा नेताओं की कृपा से वे 2022 में गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए थे।
यह भी कहा जा रहा है कि धनराज को राज्यसभा में लाने की सारी कवायद प्रोफेसर साहब ने ही की थी, सपा के बड़े नेताओं को कानों-कान इस बात की खबर ही नहीं हो पाई कि कब सैफई के तार अहमदाबाद से जुड़ गए। सो, अगर इस बार अखिलेश अपने दम पर भी चुनावी मैदान में उतरते हैं और सरकार बनाने के जरूरी बहुमत से कुछ पीछे भी रह जाते हैं तो उन्हें कमल का साथ मिल सकता है। रही बात कांग्रेस से मोलभाव की तो अखिलेश ने राहुल से साफ कह दिया है कि ‘आप वही सीटें मांगो जहां आप जीत सकते हैं, कहते हैं सीटों के तालमेल का यह जिम्मा राहुल ने प्रियंका के हवाले कर दिया है।
….और अंत में
अभी पिछले दिनों जब राहुल पुणे में थे तो उनसे मिलने के लिए बड़े उद्योगपतियों में भी एक क्रेज देखा गया। राजीव बजाज भी उनसे मिलने पहुंचे। जब बात एनसीपी नेता शरद पवार की चली तो राहुल ने साफ किया कि ‘मुद्दा चाहे परिसीमन का हो या मुख्य चुनाव आयुक्त के विरोध का शरद पवार विपक्ष के साथ हैं। वहीं भाजपा रणनीतिकारों का अपना भरोसा है कि ‘जब बात परिसीमन बिल पास कराने की आएगी तो अपनी कुछ शर्तों के साथ शरद पवार इसका समर्थन कर देंगे।’
सत्ता पक्ष : नज़र परिसीमन बिल पर
Summary :
एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर देश का मिजाज जहां कुछ और ही कह रहा है, वहीं इन हालातों में भी सत्ता पक्ष की असली चिंता संसद में परिसीमन बिल को पास कराने की है। संसद के मानसून सत्र को स्थगित हुए कोई दो महीने का वक्त होने वाला है, फिर भी सरकार का इरादा विलंबित मानसून सत्र को दुबारा बुला इसमें परिसीमन बिल पास कराने का है। सरकार को इस बात का बखूबी इल्म है कि ’19 अलग-अलग दलों के विपक्षी इंडिया गठबंधन की ताकत सदन में घटी है, कभी इसके लोकसभा में 233 सदस्य हुआ करते थे,…


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