लोकतन्त्र में राजनीति कभी भी निर्वात (खाली स्थान) में विचरण नहीं करती है, बल्कि लोगों की जनांकाक्षाओं की पूर्ति के लिए एक निर्दिष्ट सिद्धान्तावली के आधार पर चलती है। सिद्धान्तों व विचारधारा के अनुसार ही इस प्रणाली में विभिन्न राजनीतिक दलों का गठन होता है मगर सबका लक्ष्य एक ही होता है कि वे अपने-अपने रास्ते के अनुसार देश के लोगों व समाज और राष्ट्र का विकास करें और इसे चहुंदृष्टि से समृद्ध बनायें। इसीलिए राजनीति में यह माना जाता है कि यह आने वाली पीढि़यों का भविष्य सुन्दर और सुरक्षित बनाने का मार्ग होती है परन्तु इसके लिए वर्तमान की राजनीति को विशुद्ध सिद्धान्तवादी मार्ग पर चलते हुए ही भविष्य का मार्ग खोजा जा सकता है।
भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के आन्दोलन में इस सिद्धान्त की जड़ें छिपी हुई हैं जिसमें महात्मा गांधी के नेतृत्व में इस देश के लोगों ने अपनी आजादी की लड़ाई को एक जनान्दोलन में तब्दील किया और स्वयं के गणतन्त्र कहलाने का अधिकार पाया। इस गणतन्त्र की सफलता के लिए जरूरी था कि स्वतन्त्र भारत के प्रत्येक नागरिक को उन अधिकारों से लैस किया जाये जिनकी बदौलत वह अपने बीच से ही अपने नेतृत्व का चुनाव कर सके और उसका शासक किसी राजघराने में पैदा होने के आधार पर उसका भाग्य विधाता न बन सके। इसके लिए स्वतन्त्र भारत में प्रत्येक नागरिक को एक वोट का अधिकार दिया गया और प्राधिकृत किया गया कि इसका इस्तेमाल करने पर वह अपना भाग्य विधाता स्वयं ही बन सकता है।
मगर वर्तमान समय में हम जो विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच टूट-फूट देख रहे हैं और केवल सत्ता पाने की खातिर सिद्धान्तों की बलि का नजारा कर रहे हैं उसका असली कारण पिछले चार दशकों में भारतीय राजनीति में व्याप्त सिद्धान्त विहीनता ही है जिसकी शुरूआत हम कांग्रेस के 1969 में हुए पहले विघटन से मान सकते हैं। उस समय सत्ता पर काबिज प्रधानमन्त्री स्व. इन्दिरा गांधी ने अपनी पार्टी को दो हिस्सों में केवल इसलिए बांट दिया था कि वह राष्ट्रपति पद पर अपने मनपसन्द उम्मीदवार स्व. वी.वी. गिरी को चाहती थीं। तब उन्होंने कांग्रेस कार्य समिति द्वारा घोषित राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार स्व. नीलम संजीव रेड्डी का विरोध किया और पार्टी के उस अनुशासन को तोड़ डाला था जिससे कांग्रेस पार्टी का प्रत्येक कार्यकर्ता बंधा हुआ होता था।
अतः जब कांग्रेस दो हिस्सों में बट गई तो उन्होंने सत्ता में बने रहने के खातिर उस भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन लिया जिस पर भारत के आजाद होते ही उनके पिता प्रथम प्रधानमन्त्री स्व. जवाहर लाल नेहरू ने प्रतिबन्ध लगा दिया था। उन्होंने इस प्रतिबन्ध को तभी हटाया जब कम्युनिस्टों ने भारत की संसदीय प्रणाली के लोकतन्त्र में अपनी पूरी निष्ठा व्यक्त करते हुए भारतीय संविधान को अंगीकार किया और यह स्वीकार किया कि वे चुनावों के माध्यम से पूर्ण अहिंसक तरीके से सत्ता परिवर्तन के सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं। इन्दिरा गांधी ने सत्ता में रहते हुए पहला केन्द्रीय गठजोड़ किया और समाजवादी नीतियों के साये तले आजादी दिलाने वाली कांग्रेस पार्टी का पूरा चरित्र ऊपर से लेकर नीचे तक बदल दिया और संगठन को अपने पूर्ण नियन्त्रण में लेते हुए तदर्थ आधार पर पार्टी के पूरे ढांचे को लोकतन्त्रीय पद्धति से दूर कर दिया जिसका खामियाजा यह पार्टी आज तक भुगत रही है।
इसके बाद 90 के दशक के दौरान जब कांग्रेस पार्टी का अपने बूते पर पूर्ण बहुमत में आना बन्द हुआ और विरोधी दल भाजपा का विस्तार होना शुरू हुआ तो केन्द्र में विभिन्न दलों के गठबन्धन की सरकारों का बनना चालू हुआ और इनमें राजनीतिक दलों की विचारधारा हाशिये पर चली गई। तब ऐसे गठबन्धनों को शासन के लिए गठबन्धनों का नाम दिया गया और कहा गया कि सुशासन के लिए लोकसभा की सदस्य संख्या के गणित में विचारधारा को एक तरफ रखते हुए यह काम किया जाना आवश्यक है जिससे भारत में लोकतान्त्रिक सरकारों का गठन हो सके। इसीलिए हमने देखा कि 1996 से लेकर 1998 तक केन्द्र की सरकार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता स्व. इन्द्रजीत गुप्ता देश के गृमन्त्री रहे।
मगर 90 के दशक में भारत में एक और आधारभूत परिवर्तन हुआ कि इसकी अर्थव्यवस्था विदेशी कम्पनियों के लिए खोल दी गई और विदेशी निवेश के भरोसे भारत के विकास की परिकल्पना मूर्त रूप लेने लगी। यह ऐसा परिवर्तन था जिसका देर-सबेर राजनीति पर गुणात्मक प्रभाव पड़ना लाजिमी था, क्योंकि किसी भी देश की अर्थ नीति उसकी राजनीति को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकती। अतः खुले बाजारवाद की अर्थ नीति ने भारत के आधारभूत ढांचे के मूल मानकों जैसे शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्रों को भी अपने कब्जे में लेना शुरू किया और इनमें विशुद्ध मुनाफे की प्रवृत्ति को जन्म दिया जिससे लोगों के एक वोट से चुनी गई उनकी अपनी सरकारों की जवाबदेही लगातार कम होती चली गई । इसका असर राजनीति पर इस प्रकार पड़ा कि भारतीय राजनीतिक दलों की चुनाव लड़ने के लिए अपनी सैद्धान्तिक ताकत लगातार कम होती चली गई और उसका स्थान धनशक्ति लेती चली गई।
वरना सोचिये कि 1974 में शुरू हुए जिस जेपी आन्दोलन का मूल आधार यह था कि चुनाव प्रणाली में सुधार होना चाहिए और चुनावों को सस्ता बनाया जाना चाहिए, उसका जिक्र करते हुए आज हर राजनीतिक दल क्यों घबराता है? दरअसल राजनीति में आया हुआ ऐसा स्वाभाविक बदलाव है जो वर्तमान सामाजिक चेतना को भी परिलक्षित करता है। यह बेवजह नहीं है कि आज प. बंगाल में ममता दीदी की तृणमूल कांग्रेस के बुरी तरह हार जाने के बाद इस पार्टी के सांसद बगावत कर रहे हैं और दूसरे नम्बर पर अब महाराष्ट्र की उद्धव गुट की शिवसेना के सांसद बागी होने के मुहाने पर बैठे हैं। इसका मूल कारण यह है कि ये सांसद राजनीति के सत्तापरक समीकरणों को ही जनसेवा का असली जरिया मानते हैं।
वे सोचते हैं कि सत्ता के निकट रहते हुए वे अपने क्षेत्र के लोगों की सेवा बेहतरी के साथ कर सकते हैं। मगर दूसरा बड़ा और वृहद कारण यह है कि बाजारमूलक अर्थव्यवस्था ने विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच की सैद्धान्तिक दूरियों को समाप्त कर दिया है। अतः नेताओं के दल बदलने से अब राष्ट्रनीतियों पर फर्क ही नहीं पड़ता, क्योंकि खुले बाजारवाद की नीति 1991 में कांग्रेस लेकर आयी जिस पर इसके बाद केन्द्र में गठित हर दल की सरकार चल रही है । इसने सैद्धान्तिक मतभेदों को बहुत ही संकीर्ण कर दिया है क्योंकि सरकारी कम्पनियों में विनिवेश तो कांग्रेस ने ही शुरू किया। कुल मिलाकर राजनीति का यह वह दौर है जिसमें विचारधारा का सत्ता समीकरणों से कोई लेना-देना नहीं है।


Download Android App
Download iOS App




