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कर्ज जाल में फंसे राज्य

अभी पिछले दिनों ही भारत के निर्यात ने 400 अरब डॉलर का आंकड़ा छुआ था जिससे देश की आर्थिक स्थिति की बेहतर तस्वीर सामने आई थी।

अभी पिछले दिनों ही भारत के निर्यात ने 400 अरब डॉलर का आंकड़ा छुआ था जिससे देश की आर्थिक स्थिति की बेहतर तस्वीर सामने आई थी। हालांकि आर्थिक मोर्चे पर केंद्र सरकार के सामने कई चुनौतियां हैं। केंद्र सरकार ने देश की आर्थिक तरक्की के लिये कई योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिये लगातार प्रयास किये हैं।  लेकिन देश की जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये उठाये कदमों को नुक्सान पहुंचाने वाले कई ऐसे कारक हैं जिन्हें समय रहते नहीं संभाला गया तो देश को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। किसी भी संघीय देश में राज्यों की आर्थिक स्थिति ही देश को मजबूत बनाती है। इस समय केंद्र की मोदी सरकार को कुछ राज्यों की स्थिति परेशानी में डाल सकती है। इसी कड़ी में राज्यों की वित्तीय हालत पर आरबीआई की ओर से जारी ताजा रिपोर्ट में इन राज्यों की वित्तीय स्थिति और कर्ज के प्रबंधन पर चिंता जाहिर की गई है। आरबीआई की रिपोर्ट में देश के 10 ऐसे राज्यों का चिन्हित किया गया है जो कर्ज के जाल में धंस रहे हैं।आरबीआई ने इन राज्यों को चेतावनी दी है कि अगर इन्होंने खर्च और कर्ज का प्रबंधन सही तरीके से नहीं किया तो स्थिति गंभीर हो सकती है। यह चेतावनी दर्शाती है कि राज्यों को अपने आर्थिक प्रबंधन को संभालना होगा वरना कर्ज का यह जाल उनके गले की फांस बन जाएगा।
इन राज्यों की स्थिति की आंच केंद्र तक पहुंचने से देश की वित्तीय सेहत को नुक्सान होगा। रिपोर्ट के मुताबिक बिहार, केरल, पंजाब, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य कर्ज के भारी बोझ से दबे हैं। कर्ज के अलावा इन राज्यों का आमदनी और खर्च का प्रबंधन भी ठीक नहीं है। यानी ये राज्य ऐसी जगहों पर खर्च नहीं कर रहे हैं जहां से आमदनी के स्रोत पैदा हों। यही वजह है कि इन राज्यों में भविष्य में कर्ज की स्थिति और भयावह हो सकती है। यही नहीं इन राज्यों का वित्तीय घाटा भी चिंताएं बढ़ा रहा है। आरबीआई ने इन राज्यों को जरूरत से ज्यादा सब्सिडी का बोझ घटाने की सलाह दी है। कर्ज के जाल में सबसे तेजी से फंसने वाला राज्य पंजाब है। हाल ही में पंजाब सरकार की ओर से राज्य की वित्तीय हालत पर एक श्वेत पत्र जारी किया गया। इसमें बताया गया कि राज्य को कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ता है। पंजाब की स्थिति इतनी खराब है कि इसके पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिये भी कर्ज लेना पड़ रहा है। पंजाब की स्थिति के पीछे वहां  पूर्ववर्ती सरकारों की लोक-लुभावनी योजनाओं का खजाने पर पड़ने वाला भारी बोझ है। अब इस प्रकार की समस्याओं से कैसे निपटा जाए इस पर मंथन करने की जरूरत है।
विशेषज्ञों के अनुसार माना जाता है कि राज्यों की कमाई का कम से कम एक तिहाई हिस्सा निर्माण और विकास कार्यों पर खर्च किया जाना चाहिए ताकि राज्य में विकास का पहिया घूमता रहे और इस चक्र में राज्य की कमाई के स्रोत पैदा होते रहें, लेकिन चिंता ये है कि इन राज्यों के खर्च का 90 फीसदी हिस्सा रेवेन्यू एक्सपेंसेस यानी सैलरी, पेंशन, सब्सिडी वगैरह में चला जाता है। इससे राज्यों की वापस कमाई होना नामुमकिन है, जबकि निर्माण कार्यों, कौशल विकास,नई स्वास्थ्य इकाइयों के लिए पैसा सिर्फ 10 फीसदी ही बचता है जो बहुत कम है।
राज्यों के पास न तो केन्द्र की तरह इनकम टैक्स कलेक्शन जैसे आमदनी के बड़े जरिया हैं और न ही नोट छापने जैसे विकल्प। लिहाजा राज्यों के पास आमदनी के सीमित साधन बचते हैं और इसीलिए इनका सही इस्तेमाल करना जरूरी हो जाता है। भारत में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की आर्थिक सेहत को सही रखने के लिये भारत सरकार ने एफआरबीएम कानून में बदलाव की जरूरत को महसूस करते हुए एन.के.सिंह समिति का गठन किया था।  इस समिति ने अपनी सिफारिशों में केन्द्र और राज्यों की वित्तीय जवाबदेही के लिए कुछ मानक भी तय किए थे। समिति ने सरकार के कर्ज के लिये जीडीपी के 60 फीसदी की सीमा तय की थी। यानी केंद्र सरकार का जीडीपी रेश्यो 40 फीसदी और राज्य सरकारों का सामूहिक कर्ज 20 फीसदी तक ही रखने की सिफारिश की गई थी। अब अगर आरबीआई की रिपोर्ट में राज्यों के कर्ज की स्थिति देखें तो कर्ज के मामले में टॉप पांच राज्यों का कर्ज रेश्यो 35 फीसदी से भी ऊपर जा चुका है जो बेहद खतरनाक स्थिति को दर्शा रहा है। केंद्र सरकार का कर्ज सीमा से कुछ उपर है लेकिन वह ऐसी स्थिति नहीं है जिसे कंट्रोल नहीं किया जा सके। राज्यों की इस हालत के पीछ के कारणों में सबसे ज्यादा बिजली को लेकर लोक लुभावने वायदे करके उन्हें लागू करना है। देश का हर राज्य बिजली महंगी करने के फैसले से बचता रहा है। लिहाजा डिस्कॉम्स का घाटा सरकार के कर्ज में इजाफा करता रहता है।
बिजली कंपनियों का सबसे ज्यादा घाटा आरबीआई की ओर चिन्हित इन्हीं 5 राज्यों से है। पूरे देश का 25 फीसदी डिस्कॉम लॉस इन्हीं 5 राज्यों यानी बिहार, केरल, पंजाब, राजस्थान और पश्चिम बंगाल से है। देश के पांच और राज्य आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड और मध्य प्रदेश भी केंद्र सरकार और आरबीआई की चिंता बढ़ा रहे हैं।  इन प्रदेशों की कर्ज की समस्या कभी भी विकराल हो सकती है। इन प्रदेशों का मानक कर्ज भी 20 प्रतिशत से आगे निकल चुका है। ये राज्य डिफॉल्ट की स्थिति की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। केंद्र सरकार और अन्य राज्यों को चाहिए की कर्ज की इस स्थिति से बचने के लिये फौरी कदम उठायें। ऐसे कदमों में अर्थव्यवस्था को बेहतर करने के लिये केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को लोकलुभावनी योजनाओं के बजाय ऐसी नीतियां अपनाने पर ध्यान लगाना होगा जो लोगों के हित में हों और विकास पर भी उसका प्रतिकूल असर नहीं हो। देश के सभी राज्यों को वित्त प्रबंधन के समय सब्सिडी का बोझ घटाने और अपने खर्च घटाने पर ध्यान लगाना होगा। अर्थवयवस्था के मोर्चे पर केंद्र और राज्य सरकारों को एकजुट होकर काम करना होगा तभी देश आगे बढ़ेेगा। इन कर्ज जाल में फंसे प्रदेशों को त्वरित उपायों को लागू करना होगा वरना काफी देर हो जाएगी। 
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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