लाल किले का वो आखिरी मुशायरा

Summary :

तब न कोई ‘रेख्ता फाउंडेशन’, न ‘स्पिक मैके’ या ‘जयपुर टिट फेस्ट’ सरीखे ‘एनजीओ’। सिर्फ ढलते हुए शाही किले थे या महल। वह 27 अक्तूबर वर्ष 1851 की शाम थी जब लाल किले के उस अंतिम मुशायरे में शिरकत करने वालों में मोमिन खां ‘मोमिन’, मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली, इब्राहीम जॉक, दाग देहलवी, मुहम्मद अली ‘तिशना’ सदरुद्दीन अर्जुदा, हकीम सुखानंद आदि शामिल थे। सदारत अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर स्वयं कर रहे थे। चलिए आपको सन् 1850 के आसपास ले चलें। तब लाल किले पर अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर का शासन था। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लालकिले…

तब न कोई ‘रेख्ता फाउंडेशन’, न ‘स्पिक मैके’ या ‘जयपुर टिट फेस्ट’ सरीखे ‘एनजीओ’। सिर्फ ढलते हुए शाही किले थे या महल।
वह 27 अक्तूबर वर्ष 1851 की शाम थी जब लाल किले के उस अंतिम मुशायरे में शिरकत करने वालों में मोमिन खां ‘मोमिन’, मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली, इब्राहीम जॉक, दाग देहलवी, मुहम्मद अली ‘तिशना’ सदरुद्दीन अर्जुदा, हकीम सुखानंद आदि शामिल थे। सदारत अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर स्वयं कर रहे थे। चलिए आपको सन् 1850 के आसपास ले चलें। तब लाल किले पर अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर का शासन था। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लालकिले में शायरी की महफिलें कभी-कभी जम जाती थीं। वर्ष 1990 के आसपास एक अखबार में सम्पादक के रूप में नियुक्ति के मध्य मैं कई बार लाल किले के सामने से गुज़रा तो वहां के आखिरी मुशायरे के बारे में कुछ जानकारी एकत्र करने की धुन सवार हुई। वहां चांदनी चौक के कुछ पुराने लोगों को तलाशा। एक स्वीट शॉप के बुजुर्ग मालिक से इस बारे में किसी पुराने बुज़ुर्ग के बारे में पूछा तो उस मुशायरे के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी दे सके। उसने बताया कि लाल किले के उस चर्चित आखिरी मुशायरे के बारे में मेरे ताऊ तो बताया करते थे। वह बताते थे कि जिस दिन आखिरी मुशायरा होना था, उस दिन लाल किले के आसपास फूलों के गजरों की दुकानें सज गई थी। देश के नामी शायरों का स्वागत इत्र व फूलपत्तियों की वर्षा से किया गया था।
मुशायरे का सबसे बड़ा आकर्षण तो स्वयं बहादुर शाह ज़फर ही थे, मगर उस दिन अदब-आदाब के साथ आने वालों में शामिल थे, मिजऱ्ा गालिब, उस्ताद ज़ौक, दाग देहलवी, मुस्तफा खान शेफ्ता, आज़ुर्दा, मोमिन खान, आगा खान ऐश आदि। ज़फर के समय में यह मुमकिन था कि उस मुशायरे का कोई प्रामाणिक विवरण मिल जाता मगर हालात इतने तनावपूर्ण थे कि शायद किसी का ध्यान इस तरफ नहीं गया।
बहरहाल, लाल किले के हर मुशायरे में शायरों को मालामाल होने की उम्मीदें होती थी। मगर उस दिन ज़फर की आंखें नम भी थीं और कुछ-कुछ झुकी-झुकी सी भी थीं। उस दिन उन्होंने कुछ ‘शेअर’ पढ़े और फिर एक पूरी गज़ल। गज़ल इस तरह से थी-
न किसी की आंख का नूर हूं न किसी के दिल का कऱार हूं
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-गुब़ार हूं
मैं नहीं हूं नग़मा-ए-जां फज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बिरोग की हूं सदा मैं बड़े दुखों की पुकार हूं
मेरा रंग रूप बिगड़ गया मेरा यार मुझसे बिछड़ गया
जो चमन खिज़़ां से उजड़ गया मैं उसी की फस्ल-ए-बहार हूं
न मैं ‘मुज्तर’ उनका हबीब हूं न मैं ‘मुज्तर’ उनका रक़ीब हूं
जो बिगड़ गया वो नसीब हूं जो उजड़ गया वो दयार हूं
उसी मुशायरे को एक नाटक के रूप में कुछ वर्ष पहले दिल्ली में डॉ. एम. सईद आलम ने दिलचस्प ढंग से पेश किया था। उन दिन परिस्थितियां ऐसी नहीं थी कि उस ऐतिहासिक मुशायरे की कोई लिखित तफसील मिल सकती, लेकिन दिल्ली के अदबी क्षेत्रों में एक लम्बे अर्से तक उस मुशायरे की चर्चा होती रही और ​िफर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसका जि़क्र भी दिल्ली के पुराने अदबी घरानों में जारी रहा।
इस नाटक में ‘ज़फर’ की भूमिका टॉम आल्टर ने निभाई थी, जबकि मिर्जा गालिब की भूमिका प्रभावी ढंग से हरीश छाबड़ा ने निभाई।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्राप्त विवरणों के अनुसार इस मुशायरे में ऐसे भी शायर थे जो निजी रूप में व अदबी जि़न्दगी में एक-दूसरे को कतई बर्दाश्त नहीं करते थे। मसलन उस्ताद ज़ौक व मिर्जा गालिब, दोनों ही एक-दूसरे पर फब्तियां कसते रहते थे। ज़ौक शहंशाह के औपचारिक रूप से उस्ताद माने जाते थे, मगर गालिब को भी बहादुरशाह ज़फर के दरबार में उतनी ही इज्ज़त मिलती थी, जितनी कि उस्ताद ज़ौक को। एक घटना अदबी क्षेत्रों में बेहद चर्चित रही थी। एक बार उस्ताद ज़ौक, पालकी में बैठकर लाल किले में बादशाह के दरबार की ओर जा रहे थे। रास्ते में चांदनी चौक में एक पान वाले की दुकान पर बैठे मिर्जा गालिब ने बुलंद आवाज़ में व्यंग्य कस दिया,
‘बना है शाह का मुसाहिब
फिरे है इतराता’
गालिब ने यह मिसरा इतनी बुलंद आवाज़ में पढ़ा कि ज़ौक को भी सुनाई दे गया। वह बेहद तिलमिलाए। उन्होंने लाल किले में पहुंचते ही बादशाह को शिकायत की कि मिर्जा गालिब ने सरेआम उनका और साथ-साथ शहंशाह का अपमान किया था।
बादशाह को यह सब अच्छा नहीं लगा। उन्होंने फौरन मिर्जा गालिब को बुलावा भेजा। गालिब से ज़फर ने स्वयं पूछा, ‘मिर्जा आप तो अदब की दुनिया के सरताज माने जाते हैं। आपसे तो ऐसी बेअदबी की उम्मीद नहीं थी।’
मिर्जा गालिब व्यंग्यकार तो थे ही, अपने वक्त के विलक्षण ‘हाजि़र जवाब’ भी थे। उन्होंने सफाई दी, ‘आपने सही फरमाया बादशाह-आलम। मैं ऐसी गुस्ताखी कैसे कर सकता हूं? मैंने तो अभी अपने एक ताज़ा शेअर का पहला मिसरा ही पढ़ा था।, मगर उस्ताद ज़ौक ने दूसरा मिसरा सुना ही नहीं और आपके पास चले आए शिकायत लेकर। मेरा पूरा ‘शेअर’ तो अपने बारे में ही था। पूरा ‘शेअर’ यूं था-
‘बना है शाह का मुसाहब/फिरे है इतराता/
वरना शहर में ‘गालिब’ की आबरू क्या है/’
बादशाह ज़फर, गालिब की चतुराई भांप गए थे, मगर उन्होंने एक अच्छे ढंग से विवाद समेटने के लिए गालिब के शेअर की तारीफ की। उस्ताद ज़ौक को इस सारे प्रकरण में स्वयं ही अपनी शिकायत के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। पुराने खानदानी आख्यानों के अनुसार उस आखरी मुशायरे पर बादशाह ज़फर की आंखें बार-बार नम हो आती थीं। अपने दरबार में शायरों को अशर्फियों के उपहार देने वाले बादशाह का खज़ाना उस दिन लगभग खाली था। चांदनी चौक के कुछ पुराने खानदान अपने बुज़ुर्गों के हवाले से बताते हैं कि उस शहंशाह ने अपने शॉल व गले में पहने कुछ आभूषण, अपनी अंगूठियां व अपने डायनिंग-हाल की कुछ बेशकीमती चांदी की प्लेटें ही शायरों की नज़र की थी। उस बार अशर्फी न दे पाने के लिए ‘ज़फर’ ने हर शायर से आंखें झुकाकर मुआफी भी मांगी थी और यह आशंका भी व्यक्त कर दी थी कि ‘शायद यह नशिस्त (संगोष्ठी)’ आखिरी नशिस्त ही होगी।
तब जफर क्या थे। हिन्दुस्तान के एक बेबस शहंशाह। शायर थे सो शायरी के शौकीन होने के बायस मुशायरा रखते थे। दाग ने मिर्जा गालिब पर ये शेर दागा था-
अगर अपना कहा जो आप ही समझे तो क्या समझे
मज़ा तो तब है जब कि एक बोले और सब समझें।
चूंकि बादशाह जफर उस दिन मंच संचालन नहीं कर रहे थे, सो शम्मां अपनी जगह ही रोशन रही और बारी-बारी से शायरों के पास नहीं लाई गई। उम्मीद थी कि पहले की तरह गालिब छा जाएंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन्होंने हाजिर-जवाब मंच संचालक की भूमिका निभाई। मसलन जब बतौर शायरी अपनी एक शायर की बारी आती है तो ग़ालिब उसके बारे में कहते-साहब ब्रितानिया सरकार में अफसर हैं। ग्यारह सौ रुपए सालाना की तनख्वाह पाते हैं इतने के ही बाजार में मेरे नाम कर्ज है। वहां नौकरी और यहां शाइरी। सो साहब जादूबयानी करते हैं।’ कहते हैं कि मुशायरे में मंच लूटी मोमिन ने।
तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता।
हाले दिन उनको मैं लिखूं क्योंकर
हाथ दिल से जुदा नहीं होता।
टूटे हाथ से जब मोमिन ये शेर पढ़ते थे तो शेर और भी मौज़ूं हो उठता था। मोमिन की आवाज मधुर और धीमी थी। वहीं दाग सबसे बुलंद आवाज वाले थे। जौक अपने रूतबे के बरक्स बुलंद रहते थे। जफर ने जो सुनाया वो तत्कालीन हिन्दुस्तान का हालाते हाज़रा था। उनके बुढ़ापे ने उनकी बादशाहत की बेबसी को और उभारा। अंत में जफर साहब की बात- शेर वो नहीं जिसे सुनकर वाह निकल जाए, शेर वो जिसे सुनकर आह निकल आए और इस तरह से चला था लाल किले का वह आखिरी मुशायरा। वैसे चलते-चलते आप ही देख लें, अब मुशायरे/कवि सम्मेलन न होते हैं, न ही मुमकिन हैं। होगा भी एकाध तो कड़ी सुरक्षा में।

Dr. Chander Trikha