संयुक्तराष्ट्र में अपने कार्यकाल के दौरान, हमने नारी हत्या की अवधारणा को मान्यता दिलाने के लिए प्रयास किए-महिलाओं और लड़कियों की हत्या, क्योंकि वे स्त्री हैं-जो लैटिन अमेरिका के बेलेम दो पारा सम्मेलन और नारी हत्या/नारी-हत्या पर अंतर-अमेरिकी मॉडल कानून में परिलक्षित होती है। यदि भारत में किसी अपराध को वास्तव में नारी हत्या कहा जा सकता है, तो वह दहेज हत्या है। दहेज से जुड़ी हर त्रासदी राष्ट्रीय चेतना को झकझोर देती है, लेकिन अगली खबर उसे भुला देती है। जिन घटनाओं की अब जांच चल रही है, उन्हें सनसनीखेज खबरों या आत्म-प्रशंसा का जरिया नहीं बनाना चाहिए। बल्कि, उन्हें सभ्यतागत विरोधाभास का आईना बनना चाहिए। भारत जो महिलाओं को त्रिदेवियों -लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती के समान पूजता है, उनकी गरिमा का सौदा कैसे कर सकता है और नारी शक्ति का अपमान कैसे कर सकता है? 2047 तक विकसित भारत बनने की आकांक्षा रखने वाला भारत, बेटियों को कारों, नकदी, सोने और फ्लैटों के मुकाबले कैसे तोल सकता है? विज्ञापन दहेज कोई रीति-रिवाज, उपहार या शादी के रेशमी वस्त्रों या चमक-दमक से सजा ‘पारिवारिक प्रतिष्ठा’ नहीं है। यह एक ऐसा बाज़ार है जहां विवाह अपनी आत्मा खो देता है।
दहेज महज एक पुरानी सामाजिक बुराई नहीं है। यह हिंसा का एक निरंतर चक्र है। इसकी शुरुआत मांग से होती है, फिर अधिकार की भावना हावी हो जाती है, जबरदस्ती में तब्दील हो जाती है और अक्सर उत्पीड़न, मारपीट, आत्महत्या के लिए उकसाने और हत्या में तब्दील हो जाती है। यह वर्ग, जाति, धर्म और क्षेत्र की सीमाओं को पार करती है। भारत में 2024 में दहेज से संबंधित 5,737 मौतें दर्ज की गईं -यानी लगभग हर दिन 16 महिलाओं की मौत। जिन मामलों में मुकदमे पूरे हुए, उनमें सजा की दर लगभग 35 प्रतिशत रही। यही स्थिति दक्षिण एशिया के अधिकांश अन्य देशों में भी दिखाई देती है। दहेज सतत विकास लक्ष्य 5 पर सीधा हमला है, जो विश्व को लैंगिक समानता, भेदभाव को समाप्त करने, महिलाओं के खिलाफ हिंसा को खत्म करने और हानिकारक प्रथाओं को जड़ से मिटाने के लिए प्रतिबद्ध करता है।
दहेज पुरुष की गरिमा पर भी आघात है। दहेज मांगने या स्वीकार करने वाला पुरुष स्वयं को बाजार मूल्य पर बेचता है। वह अपने पुरुषार्थ और पुरुषत्व अपनी क्षमता, चरित्र और पुरुषत्व को कम करता है। यह एक प्रकार का दिखावटी पुरुषत्व है, जो जबरन वसूली के माध्यम से मान्यता प्राप्त करने का प्रयास करता है। दुख की बात यह है कि दहेज अपेक्षा, प्रतिष्ठा, ‘मिलनसार परिवार’, सिर्फ एक कार या घर बसाने में मदद जैसे भेषों में आता है। लेकिन पहली मांग कोई बातचीत नहीं होती। यह एक चेतावनी होती है। युवतियों को पहले खतरे के संकेत को पहचानना चाहिए। शिक्षा और रोजगार महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मानसिक तैयारी भी उतनी ही जरूरी है। दहेज मांगने वाले रिश्ते से दूर रहना न तो सगाई टूटना है और न ही शादी, यह आत्मरक्षा है।
लड़की के माता-पिता की भी उतनी ही गंभीर ज़िम्मेदारी होती है। पहली ज़िम्मेदारी है दहेज बिल्कुल न देना। जहां शादी के बाद दहेज की मांग की जाती है, वहां उनकी सोच ‘किसी भी कीमत पर शादी बचाना’ से बदलकर ‘किसी भी कीमत पर बेटी को बचाना’ हो जानी चाहिए। दहेज उत्पीड़न में शामिल सास, ननद या कोई भी महिला रिश्तेदार दूसरी महिला की गुलामी की रक्षक बन जाती है। पितृसत्ता न केवल पुरुष वर्चस्व से, बल्कि महिलाओं की मिलीभगत से भी कायम रहती है। पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाला दर्द पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली क्रूरता में तब्दील नहीं हो सकता।
भारत में एक कानूनी ढांचा मौजूद है। दहेज निषेध अधिनियम, 1961 दहेज देने और लेने को दंडनीय बनाता है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 दहेज से होने वाली मौतों से संबंधित है, जबकि धारा 85 क्रूरता और उत्पीड़न से संबंधित है। फिर भी, कानून का क्रियान्वयन न होना एक बंद दरवाजे के समान है जिसकी कोई चाबी नहीं है। न ही उच्च दोषमुक्ति दर को झूठे मामलों का प्रमाण माना जाना चाहिए, दोषमुक्ति अक्सर विलंबित जांच, विरोधी गवाहों, सामाजिक दबाव, बदनामी या अदालत के बाहर हुए समझौतों के कारण होती है।
आगे बढ़ने का रास्ता चार ‘पी’ के ढांचे पर आधारित होना चाहिए। रोकथाम का अर्थ है दुल्हनों को सशक्त बनाना, ज़ीरो टॉलरेंस नीति अपनाना और सख्त प्रवर्तन के माध्यम से रोकथाम को मजबूत करना। सुरक्षा का अर्थ है सुरक्षित रिपोर्टिंग प्रणाली, हेल्पलाइन और त्वरित पुलिसिंग। अभियोजन का अर्थ है पतियों, ससुराल वालों और उनका समर्थन करने वालों को शीघ्रता से जवाबदेह ठहराना। संकटकालीन सेवाओं का प्रावधान का अर्थ है आश्रय स्थल, परामर्श, कानूनी सहायता, वित्तीय सहायता और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल।
दहेज प्रथा का उन्मूलन न केवल इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह गैरकानूनी है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि यह अमानवीय और असभ्य है। यह स्त्री का अपमान करती है, पुरुष को नीचा दिखाती है, परिवार को भ्रष्ट करती है और विवाह को एक समान साझेदारी की संस्था के रूप में दूषित करती है। कोई भी रीति-रिवाज ज़बरदस्ती को पवित्र नहीं ठहरा सकता। कोई भी पारिवारिक प्रतिष्ठा जबरन वसूली को उचित नहीं ठहरा सकती। कोई भी विवाह पवित्र नहीं हो सकता यदि उसकी शुरुआत कीमत से हो।
-लेखिका संयुक्त राष्ट्र की पूर्व सहायक महासचिव और संयुक्त राष्ट्र महिला की पूर्व उप कार्यकारी निदेशक हैं।


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