भारत पर युद्ध की आंच

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान से युद्ध छेड़कर पश्चिम एशिया में विनाश मचा दिया है और पूरी दुनिया में आर्थिक संकट पैदा कर दिया है। 22 दिन बीत जाने के बाद भी ईरान इजराइल और पड़ोसी फारस की खाड़ी के उन देशों पर मिसाइलें और ड्रोन दाग रहा है जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने और खाड़ी देशों में तेल और गैस सुविधाओं पर जवाबी हमले करने से तेल और गैस की कीमतें बढ़ गई हैं जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ गई है। युद्ध शुरू होने से पहले ही कई लोगों ने चेतावनी दी थी कि ईरान पर पूर्ण आक्रमण से क्षेत्रीय संकट उत्पन्न हो सकता है। ट्रम्प ने भी इतने लम्बे संघर्ष की कल्पना नहीं की थी लेकिन ईरान के लगातार मिसाइल हमलों ने ट्रम्प और नेतन्याहू के सामने बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। अब इस युद्ध की आंच भारत तक पहुंच चुकी है। घमासान के बीच भारत में भी प्रीमियम पैट्रोल आैर उद्योगों में प्रयोग ​िकए जाने वाले डीजल के मूल्यों में बढ़ौतरी कर दी गई है। अभी सामान्य पैट्रोल और डीजल के दामों में कोई वृद्धि नहीं की गई। यदि तेल और गैस की सप्लाई लम्बे समय तक बाधित रही तो इसका असर आम लोगों पर पड़ना तय है। उद्योग और व्यापार जगत पहले से ही दबाव में हैं।
भारत के ​िलए संकट केवल ऊर्जा का ही नहीं है। इसने सोने आैर हीरे से लेकर खाद और विमानन उद्योग तक कई सैक्टरों में संकट खड़ा कर ​िदया है। कुछ सैक्टरों पर इसका असर खासतौर पर ज्यादा है। भारत के लगभग 47.5 प्रतिशत हीरो के आयात, 63 प्रतिशत खाद, 50 फीसदी पॉलीमर और 48 प्रतिशत हाइड्रोकार्बन ​िमडिल ईस्ट से आता है। युद्ध संकट का असर आयात और निर्यात दोनों पर ही होगा। भारत मिडिल ईस्ट से सोना, हीरे और कीमती धातुओं जैसे कच्चे माल का आयात करता है। उन्हें देश के अन्दर ही प्रोसैस करता है। ऐसे में आयात में किसी भी तरह की रुकावट से निर्यात प्रभावित होगा। खाद का सैक्टर चिंता का मुख्य विषय बना हुआ है। मिडिल ईस्ट से आने वाली नाइट्रोजन-आधारित खाद पर अत्यधिक निर्भरता के कारण अगर सप्लाई में लंबे समय तक रुकावट रहती है तो ग्लोबल कीमतें बढ़ सकती हैं। सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ सकती है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान जैसा देखा गया था। इन खतरों के बावजूद विश्लेषकों का कहना है कि भारत की मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति (समग्र आर्थिक स्थिति) अभी भी काफी मजबूत है। यह बाहरी झटकों से कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करती है। आयात के स्रोतों में विविधता लाना और घरेलू उत्पादन को स्थानीय खपत की ओर मोड़ना जैसे उपाय इस असर को कम करने में मदद कर सकते हैं। कुल मिलाकर कहें तो भले ही तेल की खबरें सुर्खियों में छाई हैं लेकिन मिडिल ईस्ट संघर्ष के दूरगामी असर कहीं ज्यादा व्यापक हैं। ये उन महत्वपूर्ण सप्लाई चेन को प्रभावित करते हैं जो भारत के व्यापार, कृषि और मैन्युफैक्चरिंग सैक्टरों की नींव हैं।
भारत में तेल का कोई संकट नहीं है। हम रूस समेत अन्य कई देशों से तेल खरीद रहे हैं लेकिन गैस संकट की चुनौती हमारे सामने है। कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। इसके बावजूद सरकार पैट्रोल पम्प पर कीमतों को समायो​जित करने में अनिच्छुक हो सकती है जिससे राजकोषीय दबाव उत्पन्न होगा। यदि सामान्य पैट्रोल की कीमत बाजार की वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं की जाती तो भी भारत का खर्च काफी बढ़ जाएगा। रुपया अब तक के निचले स्तर को छू चुका है। तेल आैर गैस की ऊंची कीमतें आयात बिल ​बढ़ाएंगी जिससे चालू खाते का घाटा बढ़ेगा। तेल की आसमान छूती कीमतों के चलते ही अमेरिका ने ईरानी तेल की खरीद पर लगे प्रतिबंधों को 30 दिन के लिए हटा दिया है, जबकि अमेरिका ने कई वर्षों से ईरान पर तेल प्रतिबंध लगाए हुए हैं। इस छूट से वैश्विक बाजारों में लगभग 140 मिलियन बैरल तेल आएगा। ईरान को छूट देना अमेरिका की मजबूरी बन गया है। या फिर यह कोई नई चाल है। युद्ध में एक दर्जन से अधिक अमेरिकी सैनिकों की मौत, अमेरिकी एफ-35 जैसे लड़ाकू विमानों को लगातार नुक्सान, खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर तबाही के चलते ट्रम्प को देश में बढ़ते राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
विडम्बना यह है ​िक ट्रम्प जिन्होंने अमेरिका के लम्बे समय तक चलने वाले युद्धों का विरोध करने के वादे पर दो बार राष्ट्रपति चुनाव जीता। उन्होंने इजराइल के इशारे पर अमेरिका को एक विनाशकारी संघर्ष में धकेल दिया है। ट्रम्प बौखला कर अपने लक्ष्यों और समय सीमा में परिवर्तन कर रहे हैं। ट्रम्प कभी कहते हैं कि वे ईरान में जमीनी युद्ध के लिए अपनी सेना नहीं भेजेंगे और कभी वे कहते हैं कि वे ईरान में जमीनी सेना भेज सकते हैं। अगर गलती से भी ट्रम्प ने अमेरिकी सेना को ईरान की जमीन पर उतारा तो यह एक अत्यंत जोखिम भरा दाव होगा। इजराइल लगातार ईरानी नेतृत्व को खत्म करने में लगा हुआ है। उसने ईरान के साऊथ पार्स गैस क्षेत्र पर हमला करके सीमाएं पार कर दी हैं। इसके जवाब में ईरान ने भी कतर, यूएई और सऊदी अरब में गैस स्थलों पर हमले कर ​िचंताएं बढ़ा दी हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी न केवल ईरान बल्कि खाड़ी देशों के नेतृत्व से सम्पर्क बनाए हुए हैं। भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन का सदस्य होने के चलते कई देशों द्वारा पेश उस प्रस्ताव का समर्थन किया है जिसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग को खोलने के लिए दबाव बनाना है। अगर खाड़ी देश समुद्री मार्ग को खुलवाने के​ लिए मिलकर अपनी नौसेनाओं का इस्तेमाल करते हैं तो युद्ध बहुत जटिल हो जाएगा। बेहतर होगा कि संवाद और कूटनीति का रास्ता अपनाया जाए। अमेरिका और इजराइल आक्रामकता छोड़ें तो समझौते का मार्ग निकल सकता है। अन्यथा पूरी दुनिया में बहुत बड़ा संकट पैदा हो जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Make Punjab Kesari Your Trusted News Source

पंजाब केसरी एक हिंदी भाषा का समाचार पत्र है जो भारत में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के कई केंद्रों से प्रकाशित होता है।