आम बजट और चुनौतियां

Summary :

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण लगातार 9वीं बार बजट पेश करेंगी। बजट हमेशा ही भारत के आर्थिक और राजनीतिक कैलेंडर का महत्वपूर्ण क्षण होता है। बजट केवल आंकड़ों की बाजीगरी नहीं होती, बल्कि इस प्रक्रिया के पीछे की गहराई में देश के विकास की जड़ें होती हैं। बजट से करोड़ों मध्यम वर्गीय परिवारों और वेतनभो​िगयों से लेकर उद्योगपतियों और वाणिज्यक घरानों तक को बहुत उम्मीदें होती हैं। बजट से पहले आम आदमी को उम्मीद होती है कि उन्हें टैक्स के बोझ से राहत मिलेगी या नहीं। क्या उनकी जेब में कुछ पैसा बचेगा या नहीं। इस वर्ष का बजट न केवल वित्तमंत्री…

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण लगातार 9वीं बार बजट पेश करेंगी। बजट हमेशा ही भारत के आर्थिक और राजनीतिक कैलेंडर का महत्वपूर्ण क्षण होता है। बजट केवल आंकड़ों की बाजीगरी नहीं होती, बल्कि इस प्रक्रिया के पीछे की गहराई में देश के विकास की जड़ें होती हैं। बजट से करोड़ों मध्यम वर्गीय परिवारों और वेतनभो​िगयों से लेकर उद्योगपतियों और वाणिज्यक घरानों तक को बहुत उम्मीदें होती हैं। बजट से पहले आम आदमी को उम्मीद होती है कि उन्हें टैक्स के बोझ से राहत मिलेगी या नहीं। क्या उनकी जेब में कुछ पैसा बचेगा या नहीं। इस वर्ष का बजट न केवल वित्तमंत्री के लिए बल्कि सरकार के लिए काफी चुनौतीपूर्ण समझा जा रहा है। यह बजट ऐसे समय में आ रहा है जब भू-राजनीतिक और व्यापार वार्ता को लेकर अनिश्चितता का माहौल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ से ग्लोबल ऑर्डर में डिस्आर्डर दिखाई दे रहा है। इस बजट में वित्त मंत्री की चुनौती अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाने के लिए कुछ बड़े कदम उठाने और हर वर्ग को कुछ न कुछ राहत देने की होगी। निर्मला सीतारमण के सामने चुनौती घरेलू नहीं बल्कि वैश्विक ज्यादा है। बजट में बिंग-बेग घोषणा की उम्मीदें कुछ ज्यादा नहीं हैं लेकिन सरकार का फोकस सर्टक्चल रिफार्म्स और ​िवत्तीय विवेकशीलता पर रहेगा।
पिछले वर्ष बहुत कुछ साकारात्मक रहा। महंगाई कई वर्षों के न्यूनतम स्तर पर रही। आरबीआई ने ब्याज दरें घटाईं। 12 लाख तक की आय को कर मुक्त किया गया। जीएसटी 2.0 में राहत दी गई जिससे बाजार में मांग बढ़ी और मानसून सामान्य रहा। इस वर्ष जियो पॉलिटिकल टैंशन, ट्रम्प के टैरिफ वॉर से उत्पन्न जटिल स्थिति, डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत। स्टॉक मार्किट का रोज-रोज लहूलुहान होना नकारात्मक बातें हैं। नीतिगत चुनौती की बात करें तो वित्तीय घाटे को नियंत्रण में रखना महत्वपूर्ण है। कर्ज-जीडीपी अनुपात को 2031 तक 50 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। अगर सरकार की इन्कम नहीं बढ़ेगी तो कर्ज बढ़ेगा। इसलिए वित्तीय सतर्कता बहुत जरूरी है। भारत इस समय आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस के दम पर सैंकड़ों अरब डॉलर की ग्रोथ हासिल करने की कोशिश में लगा है। देश के पास एआई प्रतिभाओं का भंडार तो है लेकिन उनके पास रोजगार नहीं है। ग्रोथ हासिल करने के लिए सिर्फ प्रतिक्रियाएं ही काफी नहीं हैं, उसके लिए बुनियादी ढांचे की भी जरूरत है। एक धारणा यह भी है कि एआई मौजूदा नौकरीपेशा लोगों को बेरोजगार करेगा। इसलिए जरूरी है कि भारत की एआई रणनीति को शिक्षा, बुनियादी ढांचे और कम्पनियों द्वारा एआई को अपनाने के साथ-साथ गहराई से जोड़ा जाए। प्रतिभाओं के भंडार को रोजगार देने के​ लिए और एआई क्षमताएं विकसित करने के लिए वित्तमंत्री बजट में प्रावधान कर सकती हैं। उद्योग जगत की मांग भी यही है कि एआई क्षमता बढ़ाने पर जोर देना चाहिए ताकि रोजगार के अवसर पैदा हो सकें।
उम्मीद है कि आम बजट में सरकार स्टार्टअप्स की परिभाषा का दायरा बढ़ाए जिससे देश में इनोवेशन को बढ़ावा मिले और रोजगार के नए मौके बन सकें। कई एआई स्टार्टअप कुछ वर्षों में अमेरिका और अन्य देशों में शिफ्ट हो चुके हैं। क्योंकि वहां ग्राहकों, पैसों और एआई टेक्नोलाॅजी तक आसान पहुंच है। भारत को वि​िनर्माण क्षेत्र में एक बड़ी ताकत बनाने के लिए उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहनों को बढ़ावा भी जरूरी है। देखना है कि वित्तमंत्री किस तरह से विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए प्रबंधन करती हैं। भारत को 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए विनिर्माण और निर्यात पर स्पष्ट रूपरेखा तैयार करनी बहुत जरूरी है। हम एक खंडित विश्व आैर अस्थितर वैश्कि वातावरण में विनिर्माण और निर्यात को कैसे बढ़ा सकते हैं, इस संबंध में क्रांतिकारी कदम उठाने की जरूरत है।
इस बजट में मिडिल क्लास और नौकरीपेशा लोगों की नजरें स्टैंडर्ड डिडक्शन पर टिकी हुई हैं। महंगाई के बढ़ते बोझ को देखते हुए एक्सपर्ट्स का मानना है कि स्टैंडर्ड डिडक्शन को मौजूदा 75,000 रुपये से बढ़ाकर 1 लाख रुपये किया जाना चाहिए। इससे सैलरीड क्लास को सीधी राहत मिल सकेगी। हालांकि, नए आयकर कानून के चलते टैक्स स्लैब में बड़े बदलाव की संभावना कम मानी जा रही है लेकिन इस दौरान सबसे ऊंचे 30 प्र​तिशत टैक्स स्लैब की लिमिट को 24 लाख से बढ़ाकर 35 लाख रुपए करने की मांग जरूर उठ रही है, ताकि ज्यादा सैलरी पाने वालों को भी राहत मिल सके। शेयर बाजार के निवेशकों और उद्यमियों के लिए भी यह बजट काफी अहम होगा। निवेशकों की मांग है कि लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (एलटीसीजी) और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स (एसटीसीजी) की दरों को आसान बनाया जाए। वहीं, छोटे उद्योग उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार सस्ता कर्ज उपलब्ध कराएगी और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए खास इंसेंटिव देगी, ताकि अमेरिकी टैरिफ से होने वाले संभावित नुक्सान की भरपाई हो सके और व्यवसाय सुचारू रूप से चल सके।
बजट से महिलाओं भी बड़ी उम्मीदें हैं। किसानों, छात्रों, व्यापारियों की भी अपनी उम्मीदें हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस समय अर्थव्यवस्था के सभी संकेतक काफी अच्छे हैं। बैंकिंग क्षेत्र काफी मजबूत है। खाद्यान्न से सरकारी गोदाम भरे पड़े हैं। ग्रामीण आय में उछाल आया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने तेज विकास और कम महंगाई के इस मेल को गोल्डी लोक्स बताया है लेकिन मजबूत दिखने वाले आंकड़ों के पीछे गहरी चुनौतियां भी होती हैं। ट्रम्प टैरिफ एक ऐसा गतिरोध है जिससे व्यापार पर पड़ने वाला प्रभाव साफ दिखाई देता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने नए बाजार हा​िसल करने के ​िलए एक के बाद एक मुक्त व्यापार समझौते किए हैं जिनमें हाल ही में यूरोपीय संघ के साथ हुआ समझौता शामिल है। चिंता की बात यह है ​िक तेज विकास के बावजूद कार्पोरेट सैक्टर देश में निवेश नहीं कर रहा। कमजोर ​िनजी निवेश इसलिए है कि कार्पोरेट सैक्टर का ​िनवेश 2012 से ही ठहरा हुआ है। इसकी बड़ी वजह यह है कि उनके लिए नियम सहज नहीं हैं। ​िनजी निवेश को बढ़ाने के लिए वित्तमंत्री को ठोस कदम उठाने होंगे। देखना होगा कि वित्तमंत्री के पिटारे से क्या-क्या निकलता है।

Aditya Chopra

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