देश के 12 राज्यों व केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों में चुनाव आयोग मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण कर रहा है जिसमें करोड़ों मतदाताओं के नामों को काटने का काम भी हो रहा है। इसे लेकर देश में विपक्षी पार्टियां शोर मचा रही हैं मगर सूचियों के शुद्धिकरण की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की ही है। संवैधानिक रूप से यह उसी की जिम्मेदारी है कि भारत के केवल वयस्क नागरिकों के नाम ही इन सूचियों में हों और एक भी वैध मतदाता का नाम न छूटे तथा नये वयस्क बने मतदाताओं के नाम इन सूचियों में दर्ज हों। अतः मतदाता सूचियों के बनाने पर किसी को भी आशंका नहीं होनी चाहिए और चुनाव आयोग को अपना काम पूरी ईमानदारी व निष्ठा से करने की छूट मिलनी चाहिए। हालांकि संसद के समाप्त हुए शीतकालीन सत्र में भी इस मुद्दे पर खुलकर चर्चा चुनाव सुधारों के नाम पर हुई मगर विरोधी दल यह सिद्ध नहीं कर सके कि चुनाव आयोग की नीयत में किसी प्रकार का दोष है। हां प्रक्रियागत खामियां जरूर गिनाई जा सकती हैं, मसलन पुनरीक्षण के काम के भारी दबाव में कई राज्यों में बीएलओ ने आत्महत्याएं तक कीं परन्तु इससे चुनाव आयोग की नीयत में खोट साबित नहीं होता है क्योंकि संविधान द्वारा प्रदत्त वह अपना काम ही कर रहा है।
चुनाव आयोग किसी भी सरकार का नहीं होता, बल्कि वह भारत राष्ट्र का होता है और अपना काम सीधे संविधान से शक्ति लेकर करता है। संविधान उसे मतदाताओं के प्रति सीधे जवाबदेह बनाता है लेकिन इस प्रक्रिया में राजनीतिक दल भी बीच में आते हैं क्योंकि भारत के लोकतन्त्र में इनकी सबसे बड़ी हिस्सेदारी होती है और आम लोग इन्हीं के माध्यम से चुनावों में अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं। यह इच्छा मतदाताओं को मिले एक वोट के संवैधानिक अधिकार के प्रयोग से ही प्रदर्शित होती है। भारत में आम जनता को यह एक वोट का अधिकार लम्बे संघर्ष के बाद मिला है। इसे लेने के लिए देश की आजादी की लड़ाई के दौरान स्वतन्त्रता सेनानियों की कई पीढि़यों ने अपनी जान खपाई तब जाकर स्वतन्त्रता के बाद यह अधिकार आम लोगों को मिला और भारत गणतन्त्र बना। गणतान्त्रिक भारत में लोगों की सरकार का गठन ही वोट की ताकत के माध्यम से होता है। यह वोट की ही ताकत है कि हर पांच साल बाद होने वाले चुनावों में देश की जनता सरकार तक बदल सकती है। यह ताकत भारत के लोगों को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ही देकर गये हैं जिन्होंने 1928 में ही घोषणा कर दी थी कि स्वतन्त्र भारत में वोट देने का अधिकार केवल कुछ संभ्रान्त कहे जाने वाले नागरिकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह बिना किसी ऊंच-नीच व स्त्री-पुरुष के भेदभाव के प्रत्येक वयस्क नागरिक को समान रूप से मिलेगा। यह अधिकार बिना किसी धार्मिक भेदभाव के प्रत्येक जाति व वर्ग और सम्प्रदाय के व्यक्ति के पास होगा जिससे भारत सच्चे अर्थों में गणतन्त्र बने और प्रशासकों का जन्म इसी वोट की ताकत से हो। अतः इस वोट के अधिकार की रक्षा के लिए स्वतन्त्र भारत में स्वतन्त्र चुनाव आयोग का गठन किया गया और इसका चरित्र पूरी तरह ‘अराजनैतिक’ रखा गया तथा इसे सरकार का अंग नहीं बनाया गया।
हमारे संविधान निर्माताओं ने आयोग पर जिम्मेदारी डाली कि वह देश में संसदीय लोकतन्त्र की जमीन इस प्रकार तैयार करेगा कि इसमें प्रत्येक भारतीय की बराबर की हिस्सेदारी हो। यह हिस्सेदारी एक वोट के अधिकार के जरिये इस प्रकार तय की गई कि किसी उद्योगपति या मजदूर के वोट की कीमत में कोई अन्तर न हो और एक व्यक्ति-एक वोट के सिद्धान्त पर चलकर सरकारों का गठन राज्य स्तर से लेकर केन्द्र स्तर तक हो। भारत अपने पुरखों के बनाये इसी सिद्धान्त पर चल रहा है और इस देश के लोग हर पांच साल बाद अपनी राजनीतिक इच्छा व्यक्त कर रहे हैं। इसे ही राजनीतिक स्वतन्त्रता व बराबरी का नाम दिया गया मगर इस बराबरी को कायम रखने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर ही डाली गई। अतः मतदाता सूचियों का शुद्धिकरण भी लोकतन्त्र के शुद्धिकरण से सीधे जुड़ा हुआ है। मतदाता सूचियों में यदि फर्जी मतदाता पाये जाते हैं तो यह चुनाव आयोग की कमजोरी ही कहलायेगी इसलिए उसका कर्त्तव्य बनता है कि वह एेसे मतदाताओं के नाम काटे और तय करे कि एक मतदाता केवल एक बार ही वोट डाल सके। इसके साथ ही कोई भी मतदाता एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत न हो और किसी भी मृत व्यक्ति के नाम पर वोट न डाले जायें।
चुनाव आयोग ने 12 राज्यों में से केरल, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व अंडमान निकोबार की पुनरीक्षित सूची का दूसरा प्रारूप जारी कर दिया है जिसमें कुल तीन करोड़ 68 लाख मतदाताओं के नाम काटे गये हैं। हालांकि अंडमान निकोबार छोटा सा केन्द्र प्रशासित द्वीप समूह है जिसमें कुल तीन लाख दस हजार मतदाता हैं परन्तु इसमें सबसे ज्यादा 21 प्रतिशत मतदाताओं के नाम कटे हैं। इसकी वजह यह है कि इनमें से 16.72 प्रतिशत मतदाता अन्य स्थानों को स्थानान्तरित हो चुके हैं तथा 2.56 प्रतिशत की मृत्यु हो चुकी है तथा .94 प्रतिशत एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत हैं। चुनाव आयोग की मतदाता सूची शुद्धिकरण प्रक्रिया में यदि 21 प्रतिशत मतदाता फर्जी पाये जाते हैं तो हम किस प्रकार चुनावों के शुद्धिकरण की शेखी बघार सकते हैं। इसी प्रकार मध्य प्रदेश में कुल पांच करोड़ 74 लाख मतदाता थे जिनमें से केवल पांच करोड़ 31 लाख ही वैध पाये गये। जहां तक दक्षिणी राज्य केरल का सवाल है तो इसमें दो करोड़ 78 लाख मतदाता थे इनमें से केवल दो करोड़ 54 लाख ही जायज निकले। छत्तीगढ़ में भी यह संख्या दो करोड़ 12 लाख से घटकर एक करोड़ 84 लाख रह गई। वोटों के कम होने पर विपक्षी दल प्रश्न चिन्ह तो लगाते हैं मगर यह बताना भूल जाते हैं कि भारत के विभिन्न राज्यों से रोजी-रोटी की तलाश में लोगों का पलायन अन्य राज्यों व देशों तक में किस गति से होता है। चुनाव आयोग की आलोचना करते समय इन सभी अवयवों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
गहन पुनरीक्षण का काम जारी
Summary :
देश के 12 राज्यों व केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों में चुनाव आयोग मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण कर रहा है जिसमें करोड़ों मतदाताओं के नामों को काटने का काम भी हो रहा है। इसे लेकर देश में विपक्षी पार्टियां शोर मचा रही हैं मगर सूचियों के शुद्धिकरण की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की ही है। संवैधानिक रूप से यह उसी की जिम्मेदारी है कि भारत के केवल वयस्क नागरिकों के नाम ही इन सूचियों में हों और एक भी वैध मतदाता का नाम न छूटे तथा नये वयस्क बने मतदाताओं के नाम इन सूचियों में दर्ज हों। अतः मतदाता सूचियों के बनाने…



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