आजादी के बाद से आज तक इस देश के बच्चों को केवल बाल दिवस की जानकारी इसलिए थी कि 14 नवम्बर को पंडित जवाहर लाल नेहरु का जन्म हुआ था। गुरु तेग बहादुर जी जिनकी शहादत की बदौलत ही हिन्दू धर्म कायम है, गुरु गोबिन्द सिंह जी जिन्होंने इस देश, धर्म के लिए अपना पूरा सरबंस कुर्बान कर दिया। चार साहिबजादों, माता जी ने शहादत दी मगर अफसोस कि सिख धर्म के लोग इस इतिहास को दूसरों तक पहुंचा ही नहीं पाए। 21 दिसम्बर से लेकर 27 दिसम्बर तक का समय शहादतों का समय है जब गुरु साहिब के परिवार और अनेकों सिखों की शहादतें हुई। मगर देशवासी यहां तक कि सिख समाज के लोग भी साहिबजादों की शहादत को नजरअन्दाज करते हुए क्रिस मिस का त्यौहार मनाते देखे जाते हैं। ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि जिन लोगों के हाथों में देश की कमान रही उन्होंने बड़े दिनों की छुट्टियां करके देशवासियों को ऐसा करने की ओर अग्रसर किया।
सिखों की सर्वोच्च धार्मिक जत्थेबंदी शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी, प्रचारक, रागी सिंह, सभी की जिम्मेवारी बनती थी कि गुरु साहिब और साहिबजादों की शहादत को घर-घर तक पहुंचाएं मगर वह तो सिखों के घरों तक भी पहुंचाने में असफल रहे, पांच बार प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री बने मगर उनके द्वारा इस दिशा में कोई कदम सरकारी तौर पर नहीं उठाया गया। साल 2022 में देश के प्रधानमंत्री द्वारा एक पहल करते हुए साहिबजादों की शहादत को ‘‘वीर बाल दिवस’’ के तौर पर मनाने का ऐलान किया। दिल्ली के इन्डिया गेट पर स्वयं प्रधानमंत्री ने पहुंचकर देशवासियों को सम्बोधन किया और साहिबजादों की शहादत को नमन किया। दिल्ली से लेकर कन्याकुमारी तक समूचे देश में इसका प्रचार किया गया। पैट्रोल पंपों से लेकर अन्य पब्लिक स्थानों पर साहिबजादों की फोटो वाले बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए गए, स्कूलों में इस दिन को मनाने के निर्देष दिए गए जिसका असर यह हुआ कि जिन स्कूलों में आज तक क्रिस मिस का त्यौहार ही मनाया जाता वहां भी अब साहिबजादों को याद करते हुए वीर बाल दिवस मनाकर बच्चों को इस गौरवमई इतिहास की जानकारी दी जाने लगी। इस बार प्रधानमंत्री के आदेश पर केन्द्र सरकार सभी राज्यों की सरकारों के साथ प्रदेश से लेकर जिला, मण्डल स्तर तक के भाजपा कार्यकर्ताओं को वीर बाल दिवस मनाने की जिम्मेवारी सौंपी, जिसके चलते अब समूचा देश ही 26 दिसम्बर को साहिबजादों और माता गुजरी की लासानी शहादत को नमन करने जा रहा है। मगर श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार से लेकर सिख समाज का एक वर्ग इसका पूरी तरह से विरोध करता दिख रहा है और नाम बदलने के लिए सरकार से गुहार लगा रहा है, वहीं पंजाब के एक नेता प्रितपाल सिंह बलियावाल ने खुलासा किया है कि बीते समय में शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष और दिल्ली प्रदेश में उनकी पार्टी की कमान संभालने वालों के द्वारा ही इस नाम को रखने की वकालत की गई थी। कुछ लोगों का मानना है कि साहिबजादों को बाल कहकर सम्बोधन नहीं किया जाना चाहिए क्यांेकि उनकी उम्र भले ही कम रही हो पर उन्होंने जिस प्रकार जालिमों की हर पेशकश ठुकरा कर सिखी में पूरे उतरे, जो कार्य किया वह बड़े बुजुर्ग भी न कर पाएं।
न्यूजीलैंड में नगर कीर्तन का विरोध आखिर क्यों हुआ? : बीते दिनों न्यूजीलैंड से एक ऐसी खबर सुनने को मिली जिसके बाद से सिख समुदाय के दिलों को ठेस पहुंची मगर किसी ने भी इसके पीछे के कारणांे पर गौर फरमाने की जहमत नहीं उठाई। न्यूजीलैंड में सिख समाज ने लोगों के दिलों में अलग पहचान बनाई। बख्शी कंवलजीत सिंह कई बार वहां से सांसद चुने गए, मंत्री भी रहे। फिर एकाएक ऐसा क्या हो गया कि वहां के कुछ लोगों ने सड़कों पर आकर सिख समाज के नगर कीर्तन का विरोध कर डाला।
सिख ब्रदर्सहुड इन्टरनैशनल के सैकेट्री जनरल गुणजीत सिंह बख्शी का मानना है कि आज सोशल मीिडया का दौर है और मिन्टों, सैकेंडों में आपके द्वारा की गई काईवाई विदेशों में पहुंच जाती है। सोशल मीिडया पर पंजाब से कुछ वीिडयोे वायरल हो रहे थे जिसमें निहंग सिख के भेष में लोग ईसाई भाईचारे के लोगों के घरों में घुसकर उन्हें उनकी धार्मिक रस्में अदा करने से रोका जा रहा था। जिस प्रकार सिखों के दिलों को ठेस पहुंची उसी प्रकार ईसाई धर्म के लोग भी ऐसी कार्यवाई से आहत हुए होंगे और कट्टरपंथी केवल सिख धर्म में ही नहीं है हर धर्म में कट्टपन्न इस समय पूरी तरह से हावी हो चुका है, इसलिए कुछ भी करने से पूर्व उसके परिणामों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। वहीं कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जिस प्रकार से आए दिन विदेशों में बैठे सिख कट्टरपंथी जो स्वयं को खालिस्तानी समर्थक बताते हैं उनके द्वारा सड़कों पर आकर प्रदर्शन किए जाते हैं जिससे स्थानीय लोगों को भारी परेशानी झेलती पड़ती है। इन लोगों के द्वारा भारत से पढ़ने यां काम की तलाश में पहुंचे युवा वर्ग को अपने चंगुल में फंसाकर उनसे गल्त कार्य करवाए जाते हैं। भारतीय युवकों के गैंगस्टर और अन्य कई तरह के क्राईम में शामिल होने की बढ़ती गतिविधियांे से भी गौरांे के दिलांे मंे पंजािबयांे खासकर सिखों के प्रति नफरत पैदा हो रही है इसलिए हमें पहले स्वयं को सुधारना होगा।
वीर बाल दिवस नाम पर आपत्ति क्यों?
Summary :
आजादी के बाद से आज तक इस देश के बच्चों को केवल बाल दिवस की जानकारी इसलिए थी कि 14 नवम्बर को पंडित जवाहर लाल नेहरु का जन्म हुआ था। गुरु तेग बहादुर जी जिनकी शहादत की बदौलत ही हिन्दू धर्म कायम है, गुरु गोबिन्द सिंह जी जिन्होंने इस देश, धर्म के लिए अपना पूरा सरबंस कुर्बान कर दिया। चार साहिबजादों, माता जी ने शहादत दी मगर अफसोस कि सिख धर्म के लोग इस इतिहास को दूसरों तक पहुंचा ही नहीं पाए। 21 दिसम्बर से लेकर 27 दिसम्बर तक का समय शहादतों का समय है जब गुरु साहिब के परिवार…


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