मैं अभी इजिप्ट की यात्रा पर था और इस बात को लेकर आश्चर्य में था कि वहां कई लोगों ने बांग्लादेश चुनाव को लेकर सवाल किए। लोग यह जानना चाहते थे कि चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा? मैंने बांग्लादेश के मतदाताओं पर पूरा भरोसा जताते हुए कहा कि जम्हूरियत को बचाना है तो बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन पार्टी देश को कट्टरपंथ के रास्ते पर ले जाएंगी। …और मेरा भरोसा सच साबित हुआ। बीएनपी जीत गई।
यानी वहां की अवाम ने जम्हूरियत को बचा लिया। करीब डेढ़ साल पहले जब कट्टरपंथी आंदोलन ने शेख हसीना का तख्तापलट किया तो एक बार ऐसा लगा कि जम्हूरियत को पसंद करने वाला देश कट्टरपंथ के रास्ते पर चल पड़ा है। अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार की खबरें आम हो गईं। इसे रोकने के बजाय अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस ने भारत विरोधी भावना को और बढ़ाया ही।
भोले-भाले चेहरे के पीछे शैतान छिपा बैठा था। वे पाकिस्तान और चीन की गोद में खेलने लगे। चुनाव को उन्होंने बार-बार टालने की कोशिश की ताकि सत्ता उनके पास बनी रहे। जब उन्हें भरोसा हो गया कि बांग्लादेश की नसों में धर्मांधता का जहर पूरी तरह पिरो दिया गया है तब उन्होंने चुनाव की घोषणा की। वैसे चुनाव के लिए उन पर दबाव भी बढ़ने लगा था। वे यह मान कर चल रहे थे कि चुनाव बाद भी सत्ता पर कट्टरपंथी ताकतें ही काबिज होंगी और उनका वजूद बना रहेगा।
जमात-ए-इस्लामी और शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन करने वाली नेशनल सिटिजन पार्टी को लग रहा था कि सत्ता की बंदरबांट में वही मुख्य किरदार रहेंगे। वे यह मान कर चल रहे थे कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के लिए चुनाव आसान नहीं होगा क्योंकि खालिदा जिया हैं नहीं और 17 साल तक देश से बाहर रहने वाले तारिक रहमान इतनी जल्दी देश से कनेक्ट नहीं कर पाएंगे, मगर तारिक ने ऐसा कनेक्ट किया कि बाकी सबकी नाव डुबो दी।
तारिक पिछले साल दिसंबर में ढाका लौटे तो बीएनपी में जैसे नई जान आ गई। उन्होंने जनता से संवाद का बिल्कुल नया तरीका अपनाया। उन्होंने चुनाव प्रचार के 19 दिनों में 64 रैलियां कीं और इन रैलियों में अपनी पत्नी डॉ. जुबैदा रहमान और बेटी जाइमा रहमान को भी साथ रखा। वे खुद को एक पारिवारिक व्यक्ति के रूप में देश के सामने रखना चाहते थे। अपनी रैलियों और सभाओं में उन्होंने आम लोगों को मंच पर आमंत्रित किया, उनसे बात की, सवाल पूछे, समस्याएं जानीं और भरी सभा में समस्याओं के निदान का आश्वासन भी दिया। इन नीतियों ने उन्हें मतदाताओं के काफी करीब ला दिया।
इस दौरान वे देश में शांति, सद्भाव और लोकतंत्र की बात करते रहे। बांग्लादेश की अस्मिता को लेकर उन्होंने नारा दिया- न दिल्ली, न पिंडी! आशय यह था कि वे न तो दिल्ली के दबाव में रहेंगे और न ही रावलपिंडी के दबाव में होंगे। वे तो वही करेंगे जो बांग्लादेश के हित में होगा। इस नारे ने भी मतदाताओं को उनकी ओर आकर्षित किया। उन्हें न पसंद करने वाली शेख हसीना की अवामी लीग के समर्थकों के लिए भी वही उम्मीद की एकमात्र किरण थे। इसलिए आश्चर्य नहीं कि उन्हें अवामी लीग के मतदाताओं ने भी वोट दिया हो।
अवामी लीग का मुख्य मकसद था जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन पार्टी को रोकना और वह मकसद तारिक को मजबूत करके ही पूरा हो सकता था। काफी हद तक इसमें सफलता मिली है। जमात को तो फिर भी विपक्ष में बैठने का मौका मिल गया है लेकिन छात्र आंदोलन से जन्मी नेशनल सिटिजन पार्टी का तो बेड़ा ही गर्क हो गया। तारिक रहमान की जीत के साथ अब कई और सवाल भी हैं? मसलन क्या वे आसानी से बांग्लादेश को आर्थिक रूप से उसी मुकाम पर ले जा पाएंगे जहां शेख हसीना ने पहुंचाया था?
पाकिस्तान या चीन का उन पर कितना प्रभाव होगा और सबसे बड़ा सवाल कि भारत के साथ क्या वे रिश्तों में कड़वाहट कम कर पाएंगे? अभी मैं रिश्तों में मिठास की तो बात ही नहीं कर रहा हूं क्योंकि भीषण कड़वाहट भरी हुई है। सबसे पहले बात आर्थिक मुकाम की जो तारिक के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। मो. यूनुस के कार्यकाल में देश की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल है। इसे पटरी पर लाने के लिए वे निश्चय ही अमेरिका की ओर देखेंगे लेकिन चीन की नजर भी उन पर रहेगी। अमेरिका उनके देश में सैन्य अड्डा बनाना चाहता है! क्या वे इजाजत देंगे?
ऐसे कई सवाल और भी हैं लेकिन बड़ा सवाल भारत के साथ रिश्तों का है। यदि भौगोलिक रूप से देखें तो बांग्लादेश और भारत सबसे करीबी पड़ोसी हैं। बांग्लादेश की 94 प्रतिशत सीमा भारत से लगती है। भारत के साथ बेहतर रिश्तों के बगैर आर्थिक रूप से समृद्ध बांग्लादेश की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारत ने बीएनपी की जीत के काफी पहले बेहतर रिश्तों के लिए पहल कर दी थी। तारिक की मां खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में विदेश मंत्री एस. जयशंकर खुद गए थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शोक संदेश पत्र उन्हें सौंपा था,
हालांकि खालिदा जिया ने जब भी कुर्सी संभाली तो भारत के साथ उनके रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे लेकिन इस कहावत को कौन दरकिनार कर सकता है कि राजनीति और कूटनीति में न कोई दोस्त होता है और न ही कोई दुश्मन। तारिक के पास एक बेहतर अवसर है कि वे भारत के साथ दोस्ती की राह पर आगे बढ़ें। इसी में उनकी भी भलाई है और हमारी भी। बांग्लादेश के बेहतर भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं। जमात जैसी कट्टरपंथी ताकतों से लड़ने के लिए परवरदिगार असीम शक्ति दे। यही कामना!


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