स्वतन्त्र भारत की राजनीति इस देश की सामाजिक संरचना के आन्तरिक मतभेदों का शिकार इस तरह रही है कि कभी अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने वाली जनता धीरे-धीरे अपनी इस संरचना के अन्तर्विरोधों का ग्रास होती चली गई जिसकी वजह से कालान्तर में भारत में जातिवादी राजनीति सिर चढ़ कर बोलने लगी और इसने नये सत्ता समीकरण भी गढ़ने शुरू कर दिये। एेसा नहीं है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़े गये स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान ये विसंगतियां मौजूद नहीं थीं मगर तब राष्ट्रपिता के अपने जनता के प्रति समर्पण भाव ने इन्हें हाशिये पर खड़ा कर दिया था।
महात्मा गांधी भारतीय समाज की इस कमजोरी से पूरी तरह वाकिफ थे इसीलिए उन्होंने राम राज्य के विचार को आगे बढ़ाया था जिससे भारतीय समाज के सभी वर्गों के लोग एक छाते के नीचे आकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष कर सकें। इतना ही नहीं गांधी जी ने 1931 से लेकर 1936 तक पूरे भारत में हिन्दू समाज में दलितों के प्रति किये जा रहे पशुवत दुर्व्यवहार के खिलाफ भी जनान्दोलन छेड़ा था जिसके विरोध में उनके जीवन पर दो बार जानलेवा हमले भी हुए थे। गांधी ने उस समय तथाकथित अछूत कही जाने वाली जातियों के उत्थान के लिए जन जागरण का काम किया और उन्हें हरिजन नाम से पुकारा। गांधी ने अस्पृश्यता निवारण का सघन अभियान चला कर उहें हिन्दू समाज का अभिन्न अंग बताया और 1932 में पुणे में इस समाज के सबसे बड़े नेता डा. भीमराव अम्बेडकर के साथ समझौता किया और कथित अछूतों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की डा. अम्बेडकर की मांग को ठंडे बस्ते में डलवाया। क्योंकि अंग्रेज चाहते थे कि भारत को भीतर से इस तरह विखंडित कर दिया जाये जिससे इसकी सामूहिक शक्ति पूरी तरह नष्ट हो सके क्योंकि 1909 में अंग्रेज मुसलमानों को पृथक निर्वाचन मंडल दे चुके थे और 1919 में यही व्यवस्था उन्होंने सिख समाज पर भी लागू कर दी थी।
अब वे हिन्दू समाज को भी टुकड़ों में बांट देना चाहते थे। परन्तु बाबा साहेब अम्बेडकर ने 1932 में महात्मा गांधी के हिन्दू समाज के एकत्र रखने की तजवीज को समझा और इस बात पर सहमत हो गये कि भारत में विभिन्न चुनी हुई संस्थाओं मे हरिजनों का आरक्षण किया जायेगा। अतः जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो भारतीय संविधान में दलितों व आदिवासियों को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण दिया गया। परन्तु आजाद भारत में तब एक नई मांग समाज के पिछड़े वर्गों को शैक्षणिक रूप से ऊपर उठाने की शुरू हुई और प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने तब 1953 के लगभग प्रख्यात समाज विज्ञानी कका साहेब कालेलकर के नेतृत्व में एक पिछड़ा आयोग गठित कर दिया। इस आयोग ने सामाजिक संरचना में ग्रामीण समाज के बहुसंख्य लोगों के अलावा महिलाओं को भी पिछड़ा घोषित किया।
अतः पिछड़ों की परिभाषा बहुत व्यापक हो गई और कालेलकर रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तथा सरकार की तरफ से संविधान में उल्लिखित समाज के शैक्षणिक क्षेत्र में पिछड़े वर्ग के लोगों को बढ़ावा देने के लिए किये गये प्रावधानों के अनुसार कार्य होने लगा। मगर धीरे-धीरे राजनीति में पिछड़ी जातियों के बड़े वोट बैंक को तैयार करने के उपाय भी होने लगे और सामाजिक न्याय के नाम पर इस कार्य की शुरूआत बहुत विनम्रता के साथ समाजवादी नेता डा. राम मनोहर लोहिया ने की और इन जातियों का तत्कालीन शसानारूढ़ पार्टी कांग्रेस से मोहभंग करना शुरू किया। परन्तु इसके बावजूद राजनीति में कांग्रेस का दबदबा बना रहा और गांवों की जनता कमोबेश तरीके से इसी पार्टी पार्टी के साथ रही और समस्त दलित समाज भी इसके साथ रहा और अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज भी इसे वोट डालता रहा। लेकिन 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी का जलवा बिखर गया और नौ राज्यों में इसे पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ।
उत्तर भारत के राज्यों में भारतीय जनसंघ व संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी तथा देश के कुछ अन्य भागों में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की स्वतन्त्र पार्टी व कम्युिनस्ट पार्टियों ने अपनी पैठ बनाई। लेकिन उत्तर प्रदेश में एेसा घटनाक्रम हुआ कि इससे पूरी कांग्रेस पार्टी में भीतर तक बिजली कौंध गई क्योंकि तब पश्चिम उत्तर प्रदेश की छपरौली विधानसभा से चुन कर आये वरिष्ठ विधायक व मन्त्री रहे चौधरी चरण सिंह सत्ता प्रमुख के पद पर अपनी दावेदारी मान रहे थे और कांग्रेसी मुख्यमन्त्री रहे स्व. चन्द्रभानु गुप्ता के खिलाफ बगावत का झंडा बुलन्द कर रहे थे। उन्हें मनाने के लिए दिल्ली से कांग्रेस आलाकमान ने अपने दूत भेजे मगर अन्ततः वह माने नहीं और 14 कांग्रेसी विधायकों के साथ उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ने का एेलान कर दिया और तब सभी विपक्षी दलों ने उन्हें अपना नेता घोषित कर मुख्यमन्त्री पद पर कब्जा किया।
चरण सिंह के विद्रोह को कांग्रेस पार्टी के भीतर पिछड़ी जातियों द्वारा अपना वाजिब हिस्सा मांगने वाली मुहिम के तौर पर देखा गया और तब अन्य राज्यों में भी उनकी देखा देखी कांग्रेस विधायकों ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया। हालांकि चौधरी साहब निजी तौर पर जातिवाद के कट्टर विरोधी थे और आर्य समाजी थे। चौधरी साहब ने तब ग्रामीण जातियों के एकीकरण की शुरूआत इस प्रकार की कि उनसे अल्पसंख्यक समाज के लोग भी जुड़े रहे और सभी ग्रामीण व दस्तकार-शिल्पकार व कारीगर जातियां भी उनकी ओर आकर्षित हों। उन्होंने ग्रामीण विकास के लक्ष्य से यह शुरूआत की और कहा कि केवल शहरों की चकाचौंध से भारत कभी तरक्की नहीं कर सकता। लेकिन इसके बाद भारत की राजनीति में एेसा परिवर्तन हुआ जिसने एकबारगी पूरे देश की दिशा बदल कर रख दी।
1971 के लोकसभा चुनावों में देश की जनता ने 1969 में कांग्रेस का विभाजन करने वाली प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को प्रचंड बहुमत दिया और समूचे विपक्ष के एक छाते चौगुटा के नीचे आने के बावजूद इसे बुरी तरह परास्त कर दिया। यहां तक कि चौधरी चरण सिंह भी उत्तर प्रदेश की मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट से अपना चुनाव एक कम्युनिस्ट उम्मीदवार विजयपाल सिंह से हार गये। इसके बाद का इतिहास जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन व इमरजेंसी लगने व विपक्षी दलों की संयुक्त जनता पार्टी बनने व इसके बिखरने व पुनः 1980 में इन्दिरा गांधी के पुनः सत्ता में आने व उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी के सत्तारूढ़ होने व बोफोर्स कांड के बाद उनकी पार्टी के कभी भी पूर्ण बहुमत न पाने और केन्द्र में सांझा मोर्चा सरकारों के गठन किये जाने का इतिहास है। मगर इसी दौरान 1990 में केवल 11 महीने चली स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने भारतीय जनता पार्टी की हिन्दुत्व की राष्ट्रवादी लहर को थामने के लिए जिस तरह मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू किया उससे भाजपा के छाते के नीचे श्रीराम मन्दिर आन्दोलन के चलते समस्त हिन्दू समाज के आने का मार्ग अवरुद्ध हो गया।
इसकी वजह यह थी कि मंडल आयोग की रिपोर्ट ने हिन्दू समाज की ग्रामीण जातियों को आपस में बांट दिया था जिसकी वजह से भारत विशेषकर उत्तर भारत में जाति आधारित पार्टियों की बाढ़ आ गई थी और एेसा लगने लगा था कि भारत की राजनीति कबायली दौर में प्रवेश कर गई है। हर प्रमुख जाति का अपना दल बाद में तैयार होने लगा और लोकतन्त्र पर जातितन्त्र प्रभावी होने लगा। परन्तु भारत में इसी दौरान एक अत्यन्त महत्वपूर्ण घटना और हुई कि 1991 में इसकी अर्थव्यवस्था को बाजार मूलक बनाने की शुरुआत हो गई जिसकी वजह से राजनीती धीरे-धीरे धनतन्त्र की चेरी होती चली गई क्योंकि आर्थिक नीतियों के विविधीकरण को इसने लगभग समाप्त कर दिया जिसकी वजह से दबंग जातियों के नेताओं की खर पतवार शुरू हुई और भाजपा के सांस्कृतिक आधार पर हिन्दू एकीकरण की मुिहम में अवरोध पैदा हुआ मगर जातिमूलक राजनैतिक दल लगातार वैचारिक स्तर पर विचार विहीन होते चले गये और सत्ता के लिए किसी भी पाले में बैठने को तैयार होते चले गये जिसकी परिणिती वही होने थी जो राजनीति में होनी चाहिए थी।
आज इन दलों का बुरी तरह क्षरण हो रहा है और ये टूटृ-टूट कर बिखर रहे हैं। एक मायने मे देखा जाये तो यह भारत के लिए शुभ संकेत भी है क्योंकि समाज अब राष्ट्रीय विकास के मुद्दों पर ध्यान देगा जिनका सम्बन्ध उनकी प्रगति व विकास से सीधा होता है। यह दौर जातिवादी आधार पर निजी विकास का नहीं बल्कि सामूहिक तौर पर समग्र विकास का है जिससे शिक्षा से लेकर आर्थिक स्तर तक देश बाजार मूलक अर्थव्यवस्था में अपना विकास कर सके और वैश्विक मानकों के साथ जुड़ सके। इस दिशा में इतना ही संकेत ही काफी है कि आज विश्वभर में भारत के कम्प्यूटर इंजीनियरों से लेकर डाक्टरों तक का डंका बजता है और इस देश के अन्य व्यावसायिक लोगों की अच्छी मांग है और यह कार्य कोई जातिवादी दल नहीं कर सकता। अतः चाहे लालू प्रसाद यादव हों या बहिन मायावती अथवा अखिलेश यादव उन्हें अब किसी न किसी राष्ट्रीय दल की शरण में जाना ही होगा।
जातिवादी राजनीति के लदते दिन
Summary :
स्वतन्त्र भारत की राजनीति इस देश की सामाजिक संरचना के आन्तरिक मतभेदों का शिकार इस तरह रही है कि कभी अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने वाली जनता धीरे-धीरे अपनी इस संरचना के अन्तर्विरोधों का ग्रास होती चली गई जिसकी वजह से कालान्तर में भारत में जातिवादी राजनीति सिर चढ़ कर बोलने लगी और इसने नये सत्ता समीकरण भी गढ़ने शुरू कर दिये। एेसा नहीं है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़े गये स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान ये विसंगतियां मौजूद नहीं थीं मगर तब राष्ट्रपिता के अपने जनता के प्रति समर्पण भाव ने इन्हें हाशिये पर खड़ा कर दिया…


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