जिस प्रकार से ईरान पर हमला करके ट्रंप ने पूर्ण विश्व को समस्या में डाल दिया है, उसका खामियाजा हम सभी को भुगतना पड़ेगा। अभी से तेल के दामों में वृद्धि हो गई है। जो कच्चा तेल, 62 डॉलर प्रति बैरल था, अब 80 डॉलर से भी ऊपर चल गया और यूरोप में भी तेल के दामों में 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
ट्रंप की प्राथमिकताएं मानवता के उसूलों से परे, दूसरों के अधिकारों का हनन है, जैसे उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी टैरिफ को लेकर हड़काने की कोशिश की, मगर उस समय उनका दांव मोदी पर नहीं चला, क्योंकि उन्होंने ब्रिक्स के अंतर्गत पुतिन और शी जिनपिंग का हाथ थाम कर, ट्रंप को ईंट का जवाब पत्थर से दिया था। ट्रंप की अस्थिरता, ऊल जलूल बयान और लाउबाली हरकतों से आए दिन समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। उनका कुछ पता नहीं, वह कब क्या कर जाएं। सच तो यह है कि उनके सीधे हाथ को पता नहीं होता कि उल्टा हाथ क्या कर रहा है! जिस प्रकार से उन्होंने वेनेजुएला के राष्ट्रपति, निकोला मादुरो को एयर लिफ्ट कर उसके तेल पर कब्जा किया है, भारत पर टैरिफ की नकेल कसी है और अब ईरान के धार्मिक नेता आयतुल्लाह खामेनेई की बेदर्दी से हत्या की है, ये सभी विध्वंसक कार्य हैं। विश्व ने देखा कि किस प्रकार से एक देश की गद्दी पर बैठे आयतुल्लाह खामेनेई की उस समय हत्या की गई, कि जब शांति वार्ता चल रही थी। यह बहुत बड़ा धोखा था। इससे पूर्व भी जून 2025 में जब शांति वार्ता चल रही थी तो जिस दिन छठे दौर की बात चलनी थी, उस टेबल पर बजाय शांति वार्ता की फाइलों के, बी-2 बॉम्बर्स ने ईरान को दहला दिया। एक मार्च को जब ईरान ने आयतुल्लाह खामेनेई की जघन्य हत्या का समाचार दिया था, जब से अब तक हमारी सरकार ने, इस विश्व स्तर के नेता की श्रद्धांजलि के संबंध में एक शब्द का भी ट्वीट, अब तक नहीं किया है, जबकि ईरान ने संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान की कश्मीर पर कब्जे की गुहार पर उसके विरुद्ध और भारत के हक में वोट दिया था। उनकी श्रद्धांजलि पर एक शब्द भी व्यक्त न करने से ईरान, भारतीय और विश्व के शिया संप्रदाय के दिलों को ठेस लगी है। भारत भले ही इजराइल से अपने रिश्ते प्रगाढ़ बनाए रखे, मगर ऐसी बातों से परहेज करे कि इजराइल, ईरान युद्ध से पूर्व उसके साथ खड़े रहने की बात करे, मगर फलस्तीन में मारे गए 73,000 बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं की निर्मम हत्या पर नैसेट में एक शब्द भी न बोले। यह ठीक है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की कुछ मजबूरियां होती हैं, मगर इसका यह अर्थ नहीं कि इन्सानियत के तकाजों को ताक पर रख आयतुल्लाह खामेनेई की दर्दनाक मृत्यु पर खामोशी इख्तियार कर ली जाए। मानवता राजनीति के सभी बंधनों से सर्वोपरि है। भारत वसुधैव कुटुंबकम् और सर्वे भवन्तु सुखिना के उसूलों पर पाबंद रहा है, अतः अमेरिका व इजराइल के दबाव में आकर उसे उसी सद्भावना और समृिद्ध के रास्ते पर चलते रहना चाहिए, जिसका अनुसरण महात्मा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। अयातुल्लाह आयतुल्लाह खामेनेई की मृत्यु न केवल ईरान के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव है, बल्कि यह मध्य पूर्व में भू-राजनैतिक तनाव को और भी तेज कर सकता है।
उनकी मृत्यु से ईरानी नेतृत्व में संक्रमण प्रक्रिया और क्षेत्रीय राजनीति दोनों पर गहरा असर होने की संभावना है। उन्होंने अपने 37 वर्षीय राज में ईरान को बावजूद, हर प्रकार की पाबंदियों के, एक बड़ी शक्ति में परिवर्तित किया है। अमेरिका और इजराइल ने जिस धोखे और कायरता से उन्हें कत्ल किया है ऐसा उदाहरण विश्व के किसी भी युद्ध में नहीं मिलता! इसके साथ ही अमेरिका-इजराइल गुटबंदी ने भीषण धोखाधड़ी और जुल्म का इतिहास भी कायम किया है! ईरान के ऊपर जो शर्तें उन्होंने रखी हैं, उनमें इन्सानियत से परे, केवल और केवल उनकी दादागीरी चौधराहट, फासीवाद और हिटलरवाद अधिक दिखाई देते हैं। ईरान, जो कि सदा से ही एक शांतिप्रिय देश है, और जिसके ऊपर पिछले लगभग पांच दस दशकों से अमेरिका और पश्चिमी देशों ने दम घोंटने वाली पाबंदियां लगा रखी हैं। अमेरिका ने ईरान से कहा है कि उसके एटम बम कार्यक्रम से उसे, इजराइल और पूर्ण विश्व को खतरा है, उसके बैलिस्टिक मिसाइलों को समाप्त करने को कहा और हिजबुल्ला, अल-अंसार और हमास जैसे जिहादी गुटों की सहायता से मना किया है। ईरान ने पहले ही कह रखा था कि इस्लाम धर्म एटम बम के विरुद्ध है, अतः उसके बनाने का कोई प्रश्न नहीं। रही बात बैलिस्टिक मिसाइलों की, तो ईरान का मानना है कि उनके अमेरिका को थमाते ही इजराइल उसे समाप्त कर देगा। हिजबुल्ला जैसे प्रोक्सी संगठनों को वह इसलिए हथियार देता है कि इजराइल सदा लेबनान और अन्य अरब देशों पर हमला करता रहता है, तो इस लिए इन्हें हथियार दिए जाते हैं। अमेरिका को यह बिल्कुल हज्म नहीं, मगर यह मंजूर है कि इजरायल के पास एटम बम रहे, पाकिस्तान के पास रहे। क्या अमेरिका के प्रोक्सी नहीं हैं जिन्हें वह फंड करता है! अमेरिका ने ईरान पर 37 वर्ष से राज कर रहे धर्म गुरु, आयतुल्लाह खामेनेई को आतंकवादी बता कर जिस प्रकार से उनका वध किया है, उससे पूर्ण विश्व स्तब्ध और आतंकित है! वे ईरानियों के ही नहीं, पूर्ण विश्व के मुस्लिमों के दिल पर राज करते थे। अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश के वे सदा से ही विरुद्ध थे। हालांकि वे शिया होते हुए भी सदा यही कहा करते थे कि शिया-सुन्नी अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं।
ईरान के ऊपर बड़े घातक हमले इसलिए किए जा रहे हैं, क्योंकि, ट्रंप अपनी दादागिरी और यूनीपोलर विश्व पर राज करने के सपने देख रहे हैं, जिसके अंतर्गत वह वहां सत्ता परिवर्तन करना चाहते हैं, जो एक भयंकर विषय है। अफगानिस्तान, इराक, लीबिया आदि में सत्ता परिवर्तन के बाद इन देशों में हाहाकार मचा हुआ है। भारत को अमेरिका से, “न काहू से बैर, न काहू से दोस्ती वाली मानसिकता अपनानी चाहिए।
ईरान सदियों से भारत का भरोसेमंद साथी रहा है और कम दामों पर उसे तेल देता रहा है, अतः दुविधा के इस समय उसे इस प्रकार से चटियल मैदान में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।




















