अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव से अशांति का नया दौर शुरू हो सकता है। अशांति का यह दौर ईरान के धार्मिक शासन के सामने गहरी आर्थिक कमजोरियों और राजनीतिक जोखिमों के बीच शरू होगा। अमेरिका बल प्रयोग करने के लिए पूरी तरह तैयार है। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी युद्ध पोत और नौसैनिक बल ईरान की घेराबंदी कर चुके हैं। अमेरिका के लड़ाकू विमान जार्डन के एयरफोर्स बेस पर पहुंच चुके हैं। इसके अलावा जार्डन, कतर और हिन्द महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया के सैन्य ठिकानों तक पहुंचने वाले विमानों की संख्या भी बढ़ रही है। तनाव बढ़ने पर अमेरिका किसी भी क्षण ईरान पर हमला कर सकता है। 2 महीने पहले ही ईरान ने इजराइल के साथ 12 दिनों के भीषण युद्ध से खुद को बचाया था।
नव वर्ष की शुरूआत होते ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को धमकी दी थी कि यदि ईरान में प्रदर्शनकारियों की हत्या की गई तो अमेरिका बल प्रयोग करने के लिए पूरी तरह तैयार है। डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान और इजराइल के बीच पिछले वर्ष जून के युद्ध के दौरान ईरानी परमाणु सुविधाओं पर हमले का आदेश दिया था। इसके बाद दोनों देशों में टकराव बढ़ता ही जा रहा है। यूरोपिय यूनियन ने ईरान की सेना आईआरजीसी को आतंकी संगठन घोषित कर दिया है। इसके बाद ईरानी संसद से ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने सभी को हैरान कर दिया है। इस तस्वीर में ईरान के सभी सांसद अपनी सेना की वर्दी पहने नजर आए।
यह तस्वीर सीधे तौर पर ट्रम्प को एक चुनौती है। ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई ने ट्रम्प को चेतावनी दी है कि कोई भी नया युद्ध क्षेत्रीय संघर्ष में बदल जाएगा। ईरान अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार है। खामेनेई की चेतावनी के बाद ट्रम्प उम्मीद लगाए बैठे हैं कि दबाव के चलते ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के लिए तैयार होगा। ट्रम्प ने यह भी कहा है कि अमेरिका कूटनीति को प्राथमिकता दे रहा है और सभी विकल्प खुले रखे गए हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि उनकी सरकार बातचीत पर ध्यान दे रही है और उनका लक्ष्य ऐसा समझौता करना है जिससे ईरान के पास परमाणु हथियार न हों। उन्होंने यह भी कहा कि अगर समझौता नहीं होता तो आगे की स्थिति साफ हो जाएगी। ट्रम्प ने उम्मीद जताई कि बातचीत के जरिए कोई स्वीकार्य समाधान निकल सकता है।
उनके मुताबिक, ऐसा समझौता संभव है जो परमाणु हथियारों के बिना हो और सभी पक्षों के लिए संतोषजनक हो। दोनों देशों के बीच बातचीत को लेकर भी मिले-जुले संकेत मिल रहे हैं। हालांकि ईरान का कहना है कि वह निष्पक्ष बातचीत करने के लिए तैयार है लेकिन वह अपनी रक्षा क्षमताओं पर किसी तरह की पाबंदी स्वीकार नहीं करेगा। खामेेनेई लगातार यह आरोप लगाते आ रहे हैं कि ईरान में हुए विरोध-प्रदर्शनों के पीछे अमेरिका और इजराइल की तख्तापलट की साजिश है और वे अमेरिकी सैन्य धमकियों के आगे झुकने वाले नहीं। ईरान का परमाणु कार्यक्रम हमेशा से ही निशाने पर रहा है।
ट्रम्प के बयानों से ऐसा आभास मिलता है कि वह ईरान से सीधे युद्ध में उलझना नहीं चाहते। इसलिए वे फिलहाल सैन्य कार्रवाई से बचना चाहते हैं। उन्हें इस बात का अनुमान है कि अगर सीधे युद्ध हुआ तो उसके परिणाम काफी भयंकर हो सकते हैं। दूसरी तरफ पूूरे घटनाक्रम पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका को सैन्य कार्रवाई का कुछ अगल रूप देखने को मिल सकता है। ईरान-अमेरिका युद्ध की स्थिति में पूरी दुनिया एक बार फिर बंट जाएगी। रूस और चीन का क्या रुख रहेगा? ओआईसी के 57 मुस्लिम देश किसके साथ जाएंगे? जी-7 देशों की रणनीति क्या होगी? बहुत सारे सवाल सामने हैं।
ऐसा भी हो सकता है अमेरिकी हवाई और नौसेना बल ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) और बसीज यूनिट मिलिट्री बेस (आईआरजीसी के कंट्रोल में एक पैरामिलिट्री फोर्स), बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च करने के ठिकानों और इनके स्टोरेज साइट्स पर हमला करे। इसके साथ ही वो ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को निशाना बनाकर सटीक हमले कर दे। अगर इन हमलों के बाद पहले से ही कमजोर हो चुकी सरकार गिर जाती है और आखिरकार ईरान में एक असली लोकतंत्र आता है और ईरान बाकी दुनिया के साथ फिर से जुड़ सकता है।
अब सवाल यह है कि अमेरिकी एक्शन के बाद क्या ईरान में राजनीतिक स्थिरता आ पाएगी? अमेरिका ने ईराक और लीबिया में भी सैन्य हस्ताक्षेप कर तख्तापलट किया था। करूर तानाशाही तो खत्म हो गई लेकिन इसके बाद कई वर्षों तक अराजकता और खून-खराबा होता रहा। ईरान अमेरिकी नौसैना और वायुसेना की ताकत का मुकाबला नहीं कर सकता लेकिन वह अपनी बैलस्टिक मिसाइलों और ड्रोन के जखीरे से हमला कर सकता है। इन हथियारों को उसने कई गुफाओं और पहाड़ों के नीचे छुपाकर रखा हुआ है। वर्ष 2019 में सऊदी अरामको के पैट्रो कैमिकल ठिकानों पर विनाशकारी मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए थे जिसका आरोप ईरान समर्थित मिलेशिया पर लगा था।
ईरान खाड़ी के अरब सागर की तरफ अमेरिकी बेस खासकर बहरीन और कतर में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना सकता है। खाड़ी के मौजूद ईरान के अरब पड़ोसी देश जो अमेरिका के सहयोगी हैं इस समय बहुत डरे हैं कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का खामियाजा उन्हें भारी पड़ सकता है। इस समय स्थिति बहुत संवेदनशील है। एक चिंगारी सब कुछ राख कर सकती है। अमेरिका और ईरान में युद्ध हुआ तो उसका असर भारत पर भी पड़ेगा। तनाव की स्थिति में भारत ने फिलहाल चाबहार बंदरगाह से हाथ खींच लिए हैं। पाबंदियों के चलते ईरान से तेल की खरीद भी भारत ने बंद कर दी है। ईरान इस समय चौराहे पर है। वह आर्थिक संकट का सामना कर रहा है।
रियाल का मूल्य बहुत गिर चुका है। तेल निर्यात औसत से भी 10 प्रतिशत कम हो गया है। ईरान की धार्मिक सत्ता के बढ़ते दमन चक्र से जनता में आम ईरानियों की पीड़ा काफी गहरी हो चुकी है। राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन ने जनता के गुस्से को एक ऐसा भंडार बना दिया है जो कभी भी फूट सकता है। आर्थिक संकट के सामने धर्म और राष्ट्रवाद पर्याप्त नहीं रह सकते। बेहतर होगा कि ईरान अमेरिका में बातचीत शुरू हो और ईरान दुनिया के साथ फिर से जुड़े। यही शांति का मार्ग है। अन्यथा भविष्य में बहुत नुक्सान हो सकता है।























