विपक्षी एकता एक ‘मृग- मरीचिका’

Summary :

स्वतन्त्र भारत की राजनीति में विपक्षी एकता शुरू से ही एेसी मृग- मरीचिका रही है, जो दूर से बहुत सुहावनी लगती है, मगर पास पहुंचते ही सूखे रेगिस्तान की तरह अपनी ही गर्द से धूल- धूसरित होने लगती है। आजादी के अभी तक के 78 वर्षों में केवल एक बार ही विपक्ष को सामूहिक रूप से एक छत के नीचे आ जाने पर 1977 के चुनावों में सफलता मिली, जब विभिन्न विपक्षी दल एकल जनता पार्टी में तब्दील हो गये और उन्होंने 1975 में लगी इमरजैंसी के काल के दौरान की गई ज्यादतियों के खिलाफ अपना संयुक्त प्रचार अभियान छेड़ा।…

स्वतन्त्र भारत की राजनीति में विपक्षी एकता शुरू से ही एेसी मृग- मरीचिका रही है, जो दूर से बहुत सुहावनी लगती है, मगर पास पहुंचते ही सूखे रेगिस्तान की तरह अपनी ही गर्द से धूल- धूसरित होने लगती है। आजादी के अभी तक के 78 वर्षों में केवल एक बार ही विपक्ष को सामूहिक रूप से एक छत के नीचे आ जाने पर 1977 के चुनावों में सफलता मिली, जब विभिन्न विपक्षी दल एकल जनता पार्टी में तब्दील हो गये और उन्होंने 1975 में लगी इमरजैंसी के काल के दौरान की गई ज्यादतियों के खिलाफ अपना संयुक्त प्रचार अभियान छेड़ा। इस जनता पार्टी का गठन तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के खिलाफ हुआ था और इसमें जनसंघ (भाजपा) से लेकर सभी मध्य मार्गी समाजवादी व गांधीवादी पार्टियां शामिल थीं जिनमें चौधरी चरण सिंह के लोकदल से लेकर स्व. डा. राम मनोहर लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी भी शामिल थी, परन्तु लोकदल में 1974 वर्ष के अन्त में ही धुर दक्षिणपंथी आर्थिक विचारों की प्रवाहक चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की स्वतन्त्र पार्टी के साथ ही आेडिशा के महारथी बीजू पटनायक की कांग्रेस पार्टी का भी विलय हो गया था और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का भी।
स्व. चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रान्ति दल स्वयं में गाधीवादी रास्ते की पार्टी थी और उसका महात्मा गांधी के बताये राष्ट्रवादी आर्थिक समाजवाद पर विश्वास था। इस प्रकार केवल कांग्रेस व कम्युनिस्टों को छोड़कर जनता पार्टी में अन्य वैकल्पिक विचारधाराओं के दलों का समागम हुआ, मगर 1977 के चुनावों में जनता पार्टी को दक्षिण भारत में सफलता नहीं मिली और इन राज्यों में 1 कांग्रेस पार्टी का परचम फहराया, लेकिन देश की वर्तमान राजनीति में वैचारिक धाराओं का जिस तरह ह्रास हुआ है और क्षेत्रीय स्तर पर जातिवादी दलों का उदय पारिवारिक दुकानों के रूप में हुआ उससे समस्त राजनीति में सत्ता के समीकरणों में आधारभूत बदलाव आया। इसका असर हमें 90 के दशक के बाद राष्ट्रीय राजनीति में भी देखने को भी मिला जब गठबन्धन सरकारों का दौर शुरू हुआ। हमने देखा कि किस प्रकार लगभग सभी क्षेत्रीय दलों की 1996 से लेकर 2014 तक केन्द्र सरकार में भागीदारी रही। आज देश का एक भी एेसा प्रमुख क्षेत्रीय दल नहीं है जो इस दौरान कभी कांग्रेस और कभी भाजपा अथवा दोनों के साथ सत्ता में न रहा हो। इससे राजनीति में सैद्धान्तिक व वैचारिक पक्ष क्षीण होता गया और शासन के लिए राजनीतिक गठबन्धनों का सृजन होने लगा, परन्तु 2014 में भाजपा के श्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर उभरने के बाद कांग्रेस बहुत कमजोर हुई और विपक्ष की जगह को क्षेत्रवार के हिसाब से क्षेत्रीय दलों ने भरना शुरू किया। यह क्रम चल ही रहा था कि 2024 के चुनाव आये और इनमें अचानक कांग्रेस को विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ आंशिक सफलता मिली। इन चुनावों में दक्षिण के तमिलनाडु में द्रमुक , पूर्व के प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस व उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को शानदार सफलता मिलने के साथ ही कांग्रेस को भी हल्की जीत का मजा मिला और लोकसभा में इसके सदस्यों की संख्या 54 से बढ़कर 99 हो गई और इसके नेता श्री राहुल गांधी को मान्यता प्राप्त विपक्ष के नेता का दर्जा हासिल हो गया, मगर 2024 के बाद जिस राज्य में भी चुनाव हुए उसमें इनमें प्रभावी क्षेत्रीय दलों को करारी शिकस्त का मुंह देखना पड़ा। हाल ही में विगत महीने तमिलनाडु व प. बंगाल समेत पांच राज्यों के चुनावों में सत्ताधारी क्षेत्रीय दलों को अपने – अपने राज्यों से हुकूमत से बेदखल होना पड़ा। प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा सुश्री ममता बनर्जी स्वयं अपनी भी विधानसभा सीट हार गईं और उनकी पार्टी 294 सदस्यों की विधानसभा में 80 सीटों पर ही सिमट गई। एेसी ही हालत तमिलनाडु में द्रमुक पार्टी के शीर्षस्थ नेता एम.के. स्टालिन की हुई और वह भी चुनाव हार गये और उनकी पार्टी भी विपक्ष में पहुंच गई। ममता बनर्जी व एम.के. स्टालिन दोनों ही अपने-अपने राज्यों के मुख्यमन्त्री भी थे। इन दोनों मुख्यमन्त्रियों का चुनाव हार जाना बताता है क्षेत्रवाद की संकीर्ण राजनीति अपने ही उन अन्तर्विरोधों से दब रही है जो इन दलों में परिवारवाद के चलते प्रभावी भूमिका में थे। इस घटनाक्रम में देश की राजनीति को नये कलेवर बख्शने की ताकत कहीं न कहीं छिपी हुई जरूर नजर आती है जो यह बताती है कि राजनीति में सैद्धान्तिक वैचारिकी की जगह बनती जा रही है। इसका एक प्रमुख कारण यह नजर आता है कि श्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा के उत्तर भारत की पार्टी से राष्ट्रीय पार्टी बनने के बाद विपक्ष का वैचारिक खोखलापन सतह पर आ गया है और वे ही पार्टियां आज कांग्रेस के साथ नजर आती हैं जिन्होंने उसकी मुखालिफत करते हुए ही उसके जनाधार को चौपट किया है। इस सन्दर्भ में हमें प. बंगाल की ममता दी की क्षेत्रीय पार्टी तृणमूल कांग्रेस का हश्र देखना होगा कि किस प्रकार चुनाव नतीजों के केवल एक महीने के बाद ही यह पार्टी बिखर गई है और इसके 80 में से 60 विधायक बागी होकर विधानसभा में विपक्ष के नेता का पद भी ले चुके हैं। इसका मूल कारण यही है कि तृणमूल कांग्रेस का कोई सैद्धान्तिक या वैचारिक आधार नहीं था जिसकी वजह से वह हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद की विचारधारा पर खड़ी भाजपा पार्टी से बुरी तरह पिट गई।
ममता दी की राजनीति कभी भी स्पष्ट विचारधारा की पार्टी नहीं थी और वह राज्य में उस जगह को भर रही थी जो 1977 में वामपंथियों के सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस की शिथिलता की वजह से खाली थी। अतः देखते- देखते ही कांग्रेस पार्टी के लगभग सभी क्षेत्रीय दिग्गज उनकी पार्टी में शामिल होते चले गए, लेकिन इसके साथ ही ममता दी ने सत्ता को अपना अधिकार समझते हुए अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अपना उत्तराधिकारी उसी प्रकार बनाने का प्रयास किया जिस प्रकार उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के स्व. मुलायम सिंह ने अपने बेटे अखिलेश यादव को और बिहार में श्री लालू प्रसाद यादव ने तेजस्वी प्रसाद यादव को। लोकतन्त्र में विकसित इस राजतन्त्रीय पद्धति में जनता का मन मोहने की प्रवृत्ति स्थायी नहीं होती। पारिवारिक नेतृत्व जनता के उन लोकतान्त्रिक अधिकारों को सीमित करता है, जो गांधी बाबा हमें संसदीय लोकतन्त्र के माध्यम से देकर गये हैं। भाजपा के लगातार मजबूत होने के पीछे यह भी एक कारण है हालांकि भाजपा ने भी कई राज्यों में एेसे पारिवारिक दलों से सत्ता हेतु गठबन्धन किये हैं जिसकी वजह लोकतन्त्र में संख्या का गणित भी होता है, लेकिन ममता दी के नेतृत्व से जिस तरह तृणमूल कांग्रेस के सांसदों तक का अब मोहभंग हो रहा है वह बताता है कि उत्तर प्रदेश बिहार के क्षेत्रीय व जातिवादी दलों पर अब संकट के बादल मंडराने वाले हैं क्योंकि इनके सबसे बड़े हथियार सामाजिक न्याय के विमर्श को बड़ी ही चतुराई से कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने हथिया लिया है। अतः यह बेवजह नहीं है कि अब ये ही दल आगे बढ़कर केन्द्र में बने विपक्षी गठबन्धन इंडिया की बैठक बुलाने की मांग करने लगे हैं और यह बैठक 8 जून को नई दिल्ली में हो भी रही है परन्तु इसमें तमिलनाडु के द्रमुक के नेता एम.के. स्टालिन ने भाग लेने से मना कर दिया है और कहा है कि कांग्रेस ने उनके साथ राज्य में धोखा किया और चुनावों में उसके हारने के बाद विजयी नई पार्टी तमिलिगा वेट्टी कषगम (टीवीके) के नेता जोसेफ विजय से हाथ मिला लिया और उसके साथ राज्य में सत्ता में शामिल हो गई। वास्तव में देखा जाये तो इंडिया गठबन्धन विभिन्न दलों का संसद में बना एक मंच ही है जिसमें ये सभी दल भाजपा सरकार का विरोध करने के लिए दैनन्दिन आधार पर अपनी रणनीति तय करते हैं, मगर जमीन पर एक- दूसरे के खिलाफ ही लड़ते हैं, एेसे वातावरण में केवल सत्ता और विपक्ष के खेमों में केवल दो दल भाजपा व कांग्रेस ही बचते हैं अतः हम धीरे-धीरे राजनीति को भी इसी वैचारिक युद्ध की दिशा में जाते देख सकते हैं।
इस युद्ध में परिवार वादी राजनीतिक दलों का समाप्त होना एेसी राजनीतिक प्रक्रिया है जिसमें लोकतन्त्र में एक वोट की असीम ताकत का राज छिपा हुआ है मगर शर्त यह है कि श्री राहुल गांधी उस राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दें जिममें राजनीतिक सैद्धांतिक नीतिगत विमर्श निहित रहता है। इसमें उन्हें वह नकारात्मकता छोड़नी होगी जो उनके राजनीतिक विमर्श में लगातार घर बनाए हुए हैं।

Shera Rajput