आसपास हताशा के कितने काले सियाह बादल उमड़ने लगे हैं। ‘नीट’ की परीक्षाओं में घोटाला ‘पंजाब बिजिलेंस के मुख्यालय पर सीबीआई का छापा, सर्वोच्च न्यायालय में चंडीगढ़-प्रशासन की सार्वजनिक खिंचाई, पंजाब के मंत्री की गिरफ्तारी, कहीं भी तो उम्मीद की कोई किरण नहीं फूट रही।’ ‘आत्महत्या’ की ओर बढ़ने वालों में युवा भी हैं, विद्यार्थी भी, किसान भी, महिलाएं भी और उच्च पदस्थ अधिकारी भी। इनमें सबसे बड़ा कारण है संवाद का अभाव। कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं। सबने संवाद की खिड़कियां बंद कर रखी हैं। यदि आप कविता-माध्यम से इस बात का मर्म समझ सकते हैं तो राही मासूम रज़ा साहब की नज़्म पढ़ लें-
‘ये दुनिया तन्हा लोगों की।
इक महिफल है।
कृष्ण अकेला, मधुबन तन्हा।
गाय अकेली, माखन तन्हा।
हाथ अकेले, दामन तन्हा।
नींद अकेली-आंगन तन्हा।
कोई किसी का दर्द न जाने।
कोई किसी की बात न माने।
हरियाणा की गणना इन दिनों देश के सर्वाधिक विकासशील राज्यों में हो रही है। लेकिन एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में हरियाणा में 3360 लोगों ने जि़ंदगी की विषमताओं से हताश होकर आत्महत्या कर ली। ज़ाहिर है कि औसतन 9 हरियाणवी लोग प्रतिदिन मौत को गले लगाते हैं और गत वर्ष 2025 व 2026 के प्रथम चार महीनों में यह आंकड़ा और भी ज्यादा बढ़ चुका है। पिछले दिनों तो सचिवालय की ऊपरी मंजिलों से छलांग लगाकर आत्महत्या करने की खबरें भी चर्चा में रहीं। यह तथ्य भी कम चौंकाने वाला नहीं है कि हेल्पलाइन 14416 पर हर रोज़ औसतन एक कॉल आत्महत्या करने वालों की भी आती है मगर जब तक पुलिस पहुंच पाती है, घटना घट चुकी होती है। यह हेल्पलाइन स्वास्थ्य विभाग द्वारा मानसिक रोगों की रोकथाम एवं परामर्श के लिए आरंभ की गई थी।
आत्महत्या पर उतारू मानसिकता को समझने के लिए साहित्यकार साहिर लुधियानवी की एक नज़्म की चार पंक्तियां भी दिमाग में कौंधती हैं। इस नज़्म को विस्तार से ‘इंटरनेट’ पर भी पढ़ा जा सकता है। शुरुआत इस तरह से है -शीर्षक है ‘खुदकुशी से पहले’
उफ ये नौखेज़ सियाही, ये हवा के नौहे।
किसको मालूम है,
इस शब की सहर हो के न हो।
डराने वाले तथ्य सिर्फ हरियाणा से ही नहीं जुड़े, पड़ौसी पंजाब में स्थिति इससे भी बुरी है। वहां अधिकांश घरों में ‘चिट्टे’ की शोक कथाएं ‘सोग’ (शोक) का माहौल बन रही है। यह महान गुरुओं, संतों व पीरों की धरती है, मगर हर व्यक्ति दूसरे से डरा हुआ है। कीचड़ इतना कि इसे बुहारने में भी सब डरते हैं कि छींटे अपने ही दामन पर न पड़ जाएं। अधिकांश प्रशासनिक अधिकारी जांच-पड़तालों के घेरे में हैं। नेतागण सहमे हुए हैं, कब कोई पिटारा खुल जाए। ऐसा भी नहीं कि पूरा परिवेश बेईमान है। मगर भय इतना गहरा गया है कि अधिकारी लोग न्यायोचित बातों या कागज पत्रों पर हस्ताक्षर करते हुए डरते हैं। पिछले दिनों एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी मिले। उन्हें कुछ समय पूर्व महत्वपूर्ण नियुक्तियों से दूर कर दिया गया। मगर उक्त अधिकारी संतुष्ट है। उसे उपेक्षा पसंद है। उसका तर्क है कि मुख्यधारा में बने रहेंगे तो न जाने क्या-क्या झेलना पड़े।
पहले ‘मीडिया-हाइप’ के लिए अधिकारीगण, नेतागण और बुद्धिजीवी दीवाने हो जाते थे। अब अधिकांश लोग इन खबरों से दूरी बनाए रखने के लिए प्रयासशील रहते हैं। यदि कोई नेता पत्रकारों से सामीप्य बनाए रखता है तो वह भी अपने प्रचार के लिए नहीं बल्कि अपने विपक्ष के खिलाफ ‘कवरेज’ के लिए प्रयासशील रहता है।
यह स्थिति पंजाब के पड़ौसी राज्य राजस्थान में भी है। एक ओर महाराणा प्रताप जयंती के विज्ञापन छपे हैं तो उसी पृष्ठ पर या सामने वाले पृष्ठ पर ‘नीट-परीक्षाओं’ में धांधलियों की खबरें चस्पा हैं। नज़र महानायकों की शौर्य गाथाओं पर कम और धांधलियों वाली खबरों पर ज्यादा टिकती हैं। स्थितियां तब और भी निराश करती हैं जब ‘मां, मानुष और माटी’ के झण्डे बुलंद करने वाली ममता दीदी अपने ही बुने जंजालों में फंस जाती है। उनकी रबर की चप्पल, सूती धोती व ‘पेंटिंग्स’ और कविताओं की पुस्तकें, सब हाशिए पर सरकने लगते हैं। यानी बकौल दुष्यंत, ‘आप बच कर चल सकें,ऐसी कोई सूरत नहीं’।
उधर बंगाल में एक बार फिर सड़कों पर नमाज पढ़ने की मांग को लेकर दंगे भड़काने का प्रयास हो रहा है। ऐसे माहौल में प्रार्थना करें संवाद और स्नेह की बयार बहे ताकि यह उबलता हुआ परिवेश शांत हो जाए। युवाओं में तनाव मुक्ति के लिए हरियाणा लोक प्रशासन संस्थान (हिपा) की ओर से कॉलेजों के लिए विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार किया गया। इसमें शिक्षकों और प्रशासन को छात्र मानसिक तनाव पहचानने और संकट प्रबंधन की ट्रेनिंग दी जा रही है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य नीति लागू किया गया है। सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में एंटी-रैगिंग समितियां और स्क्वायड अनिवार्य किए गए रैकिंग विद्यार्थी के आत्महत्या का एक प्रमुख कारण माना जाता है। 24×7 एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन (1800-180-5522) और शिकायत पोर्टल को सभी संस्थानों में लागू किया गया। शिक्षकों और प्राचार्यों के लिए संवेदनशीलता प्रशिक्षण शुरू किया गया ताकि वे विद्यार्थियों के व्यवहार, तनाव और भावनात्मक बदलाव को पहचान सकें। सरकारी व निजी स्कूलों में अनिवार्य रूप से मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
साथ ही विद्यार्थियों के व्यवहार को पहचानने के लिए शिक्षकों को संवेदनशीलता प्रशिक्षण दिया जा रहा है। स्कूलों में एंटी-रैगिंग समितियां सक्रिय की गई हैं। इसी तरह अभिभावकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए स्कूल प्रबंधन समितियों में माता-पिता को शामिल किया जा रहा है। स्कूल परिसरों में नियमित सुरक्षा निरीक्षण और निगरानी व्यवस्था लागू की गई है।
यह हो क्या रहा है आसपास ?
Summary :
आसपास हताशा के कितने काले सियाह बादल उमड़ने लगे हैं। ‘नीट’ की परीक्षाओं में घोटाला ‘पंजाब बिजिलेंस के मुख्यालय पर सीबीआई का छापा, सर्वोच्च न्यायालय में चंडीगढ़-प्रशासन की सार्वजनिक खिंचाई, पंजाब के मंत्री की गिरफ्तारी, कहीं भी तो उम्मीद की कोई किरण नहीं फूट रही।’ ‘आत्महत्या’ की ओर बढ़ने वालों में युवा भी हैं, विद्यार्थी भी, किसान भी, महिलाएं भी और उच्च पदस्थ अधिकारी भी। इनमें सबसे बड़ा कारण है संवाद का अभाव। कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं। सबने संवाद की खिड़कियां बंद कर रखी हैं। यदि आप कविता-माध्यम से इस बात का मर्म समझ सकते हैं तो…


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