कब बुझेगी युद्ध की आग

Summary :

मानव इतिहास में सबसे पीड़ादायक अध्याय है युद्ध। यह एक ऐसा भयानक तांडव है जो मानवीय सपनों को पलभर में राख कर देता है। युद्धों ने हमेशा विनाश की नई शृंखला को ही जन्म दिया। विजय की होड़ में मानवता दांव पर लगा दी गई है। हालांकि विजेता भी अंततः खोखली जीत के साथ रह जाता है। शहर तो उजड़ते ही है। महंगाई आसमान को छूती है। गरीबी दोगुणा हो जाती है। पश्चिम एशिया के युद्ध से पूरी दुनिया परेशान है। युद्ध ने हमेशा इस सत्य को उजागर किया है कि अंधकार में शांति के व्यावहारिक उपाय खोजे जाने चाहिए। कूटनीति…

मानव इतिहास में सबसे पीड़ादायक अध्याय है युद्ध। यह एक ऐसा भयानक तांडव है जो मानवीय सपनों को पलभर में राख कर देता है। युद्धों ने हमेशा विनाश की नई शृंखला को ही जन्म दिया। विजय की होड़ में मानवता दांव पर लगा दी गई है। हालांकि विजेता भी अंततः खोखली जीत के साथ रह जाता है। शहर तो उजड़ते ही है। महंगाई आसमान को छूती है। गरीबी दोगुणा हो जाती है। पश्चिम एशिया के युद्ध से पूरी दुनिया परेशान है। युद्ध ने हमेशा इस सत्य को उजागर किया है कि अंधकार में शांति के व्यावहारिक उपाय खोजे जाने चाहिए। कूटनीति को प्राथमिकता देते हुए बातचीत होनी चाहिए ले​किन न अमेरिका मान रहा है, न ईरान और न ही इजराइल। युद्ध विराम और समझौते की बातचीत के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प शांति-समझौते की बात तो करते हैं लेकिन युद्ध जारी रखे हुए हैं। ईरान के आईआरजीसी ने कुवैत और बहरीन के अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों पर हमले कर तबाही मचा दी है क्योंकि इन हवाई अड्डों पर अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं। कुवैत हवाई अड्डे पर हमले में भारत के उज्जैन निवासी श्रमिक की मौत हो गई जबकि कई अन्य घायल हुए। अमेरिका ने ईरान के राडार और मिसाइल ठिकानों पर हमले किए और ईरान के ड्रोन मार गिराने का दावा किया। कुवैत, बहरीन और अन्य खाड़ी देशों में युद्ध के सायरन बज उठते हैं। लड़ाकू विमानों की गर्जना सुनाई देती है। ऐसे में अनुमान लगाना कठिन नहीं कि युद्ध की ज्वाला कभी भी भड़क सकती है।
ईरान और अमेरिका में शांति समझौते में सबसे बड़ी बाधा इजराइल बना हुआ है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू डोनाल्ड ट्रम्प की कुछ सुनने को तैयार नहीं। इजराइल लेबनान में हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर लगातार हमले कर रहा है। इजराइल ने हाल ही के वर्षों में अपने सभी युद्ध विराम समझौतों का लगातार उल्लंघन किया है। युद्ध विराम समझौतों के बावजूद वह गाजा पर बमबारी जारी रखे हुए है। ईरान अपनी अरबों रुपए की सम्पत्तियां रिलीज करने की मांग पर अड़ा हुआ है। जबकि ट्रम्प संवर्धित यूरेनियम हासिल करने की जिद पकड़े हुए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग खुलने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे। अब तो छोटा सा देश ओमान भी अमेरिका को धमकाने में लगा हुआ है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने एक प्रस्ताव पारित​किया है कि ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान रोका जाएं और प्रस्ताव में यह निर्देश भी है कि यदि भविष्य में युद्ध की कार्रवाई अपरिहार्य हो तो पहले कांग्रेस (संसद) की मंजूरी ली जाए। प्रस्ताव के पक्ष में 215 और उसके खिलाफ 208 वोट आए। राष्ट्रपति ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के 4 सांसदों ने भी क्रॉस वोटिंग की और डेमोक्रेट्स का समर्थन किया। इससे पहले सीनेट में भी ट्रम्प-समर्थक सांसदों ने उनके खिलाफ वोट दिए थे। संसद में पारित प्रस्ताव के जरिए राष्ट्रपति की निरंकुश युद्ध-शक्तियों को भी सीमित किया गया है। यह घटनाक्रम और परिदृश्य राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए राजनीतिक और संसदीय आघात से कम नहीं है। फिर भी राष्ट्रपति ट्रम्प पारित प्रस्ताव को ‘असंवैधानिक’ करार देते हुए ‘वीटो’ कर सकते हैं, लेकिन वह राष्ट्रपति और संसद के बीच टकराव की नौबत से बचना चाहेंगे। यदि अमरीकी संसद राष्ट्रपति की ‘वीटो’ को बेअसर करना चाहेगी तो 290 सांसदों को प्रस्ताव के पक्ष में वोट करना होगा। वह ‘महाभियोग’ सरीखी स्थिति ही होगी, लिहाजा हमें असंभव लगती है।
एक नई रिपोर्ट ने सबको चौंका कर रख दिया है कि इजराइल अमेरिका की जासूसी कर रहा है। ईरान से शांति वार्ता में जुटे अमेरिकी अधिकारियों पर पैनी निगाह रखे हुए हैं ताकि वह समझौते के किसी भी प्रयास को विफल बना सकें। वैसे तो युद्ध से पूरा विश्व प्रभावित है ले​किन भारत भी इससे अछूता नहीं है। खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं। उनके जीवन की रक्षा भी भारत के लिए चिंता का विषय है। होर्मुज स्ट्रेट में अभी भी बड़ी संख्या में जहाज फंसे हुए हैं। उनके क्रू मैम्बर्स भी अधिकतर भारतीय हैं।
देश में ऊर्जा संकट गम्भीर हो रहा है। तेल भंडार पर्याप्त रखने के लिए भारत विकल्प तलाश रहा है। एलपीजी और सीएनजी गैस की कीमतों में लगातार बढ़ौतरी हो रही है। महंगाई की मार आम जनता को झेलनी पड़ रही है। रुपए की कीमत गिर रही है जिससे आयात बिल बढ़ रहा है। ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा भंडार और घरेलू भंडार सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। अन्तर्राष्ट्रीय निवेशक शेयर बाजार से अपना धन निकाल रहे हैं। किसानों के लिए फर्टिलाइजर की कमी दिखाई देने लगी है। यद्यपि भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार तमाम चुनौतियों के बावजूद बहुत अच्छी बनी हुई है लेकिन आरबीआई ने अपनी तिमाही मौद्रिक नीति में विकास दर का अनुमान घटा दिया है और महंगाई बढ़ने का अनुमान जताया है। अन्तर्राष्ट्रीय रेटिंग एजैंसी सूडीस ने भविष्यवाणी की है कि अगर कुछ दिनों में युद्ध न रोका गया तो अमेरिका में भी आर्थिक मंदी फैल सकती है। अमेरिका में मुद्रास्फीति की दर 4.2 फीसदी तक बढ़ चुकी है, जो अमेरिका में अप्रत्याशित है। दुनियाभर के देशों की अर्थव्यवस्था दबाव में है। अगर आर्थिक मंदी का दौर शुुरू हुआ तो परिणाम भयंकर होंगे। बेहतर यही होगा कि ट्रम्प शर्तों पर न अड़कर कुछ ऐसा मार्ग निकालें जिससे ईरान भी सहमत हो और होर्मुज मार्ग भी खुल जाए। युद्ध विराम बहुत नाजुक स्थिति में है, इसलिए ट्रम्प को इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की लगाम भी कसनी होगी, ताकि प्रस्तावित समझौते पर आगे बढ़ सकें। अगर शांति नहीं हुई तो तेल और ऊर्जा संकट विकराल रूप धारण कर लेगा।

Aditya Chopra

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