1 जुलाई 2026 से भारत के ग्रामीण विकास ढांचे में एक नए दौर की शुरुआत होने जा रही है। ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी वीबी-जी राम जी लागू होने जा रहा है। यह केवल किसी पुरानी योजना की जगह नई योजना लाने का मामला नहीं है, बल्कि यह देश की विकास प्राथमिकताओं में बड़े बदलाव का संकेत भी है। अब ध्यान केवल अस्थायी रोजगार उपलब्ध कराने पर नहीं रहेगा, बल्कि गांवों की दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता को मजबूत करने पर भी केंद्रित होगा।
करीब दो दशकों तक मनरेगा ने ग्रामीण आजीविका को सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, विशेष रूप से आर्थिक संकट के समय। लाखों परिवारों को रोजगार और आय का सुरक्षा कवच मिला। लेकिन आज ग्रामीण भारत तेजी से बदल रहा है। लोगों की आकांक्षाएं बढ़ी हैं। गांव पहले की तुलना में अधिक जुड़े हुए हैं और विकास को लेकर लोगों की अपेक्षाएं भी बदल चुकी हैं। अब ग्रामीण समुदाय केवल मजदूरी आधारित सहायता नहीं, बल्कि बेहतर बुनियादी ढांचा, मजबूत कृषि व्यवस्था, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर और स्थायी आय के साधन चाहते हैं।
नई व्यवस्था इन्हीं बदलती जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसमें आजीविका सुरक्षा को परिसंपत्ति निर्माण, स्थानीय योजना निर्माण और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास से जोड़ा गया है। कई मायनों में यह ‘विकसित भारत’ के उस बड़े लक्ष्य को दर्शाता है, जिसमें विकास का लाभ हर गांव और हर परिवार तक पहुंचे।
2047 तक विकसित भारत के निर्माण की दिशा
महात्मा गांधी का मानना था कि भारत का भविष्य उसके गांवों की ताकत से तय होगा। उनका ‘ग्राम स्वराज’ का विचार आत्मनिर्भरता, स्थानीय भागीदारी और सशक्त ग्रामीण समुदायों पर आधारित था। आज भी यह विचार उतना ही प्रासंगिक है। 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की यात्रा केवल शहरों की प्रगति से पूरी नहीं होगी, बल्कि ग्रामीण भारत के व्यापक परिवर्तन पर भी निर्भर करेगी। मजबूत गांव, उत्पादक कृषि व्यवस्था और सशक्त पंचायतें इस प्रक्रिया के केंद्र में रहेंगी। नई व्यवस्था में ‘विकसित ग्राम पंचायत योजना’ पर दिया गया विशेष जोर इसी कारण महत्वपूर्ण है। सहकारी संघवाद की भावना के अनुरूप सरकार ने राज्यों की अधिक सक्रिय भागीदारी की भी परिकल्पना की है, ताकि पंचायत स्तर पर परियोजनाओं को अंतिम रूप देने और उन्हें प्रभावी तरीके से लागू करने में राज्यों की भूमिका और मजबूत हो सके।
नई व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं में से एक यह है कि पात्र ग्रामीण परिवारों के लिए वार्षिक रोजगार की गारंटी 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है। यह उन परिवारों के लिए बड़ा सहारा साबित हो सकता है, जो अकुशल श्रम के माध्यम से रोजगार प्राप्त करना चाहते हैं। इस योजना के पीछे सरकार की वित्तीय प्रतिबद्धता भी उल्लेखनीय है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने इस योजना हेतु 95,692 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, जबकि राज्यों के योगदान को जोड़ने पर कुल व्यय 1.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक होने की संभावना है। इतना बड़ा निवेश ग्रामीण बुनियादी ढांचे के निर्माण और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को नई गति दे सकता है।
नई व्यवस्था के तहत सबसे बड़ा बदलाव टिकाऊ ग्रामीण परिसंपत्तियों के निर्माण पर जोर देना है। रोजगार सृजन को अब ऐसे कार्यों से जोड़ा जा रहा है, जो लंबे समय तक गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकें। योजना में जल संरक्षण, सिंचाई सहायता, ग्रामीण संपर्क मार्ग, आजीविका संबंधी बुनियादी ढांचा और जलवायु अनुकूल विकास जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है। यहीं पर यह नई व्यवस्था महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है। जब सार्वजनिक निवेश के माध्यम से ऐसी परिसंपत्तियां तैयार होती हैं, जो निर्माण कार्य पूरा होने के बाद भी स्थानीय आजीविका को लंबे समय तक सहारा देती रहें, तब विकास का वास्तविक लाभ लोगों तक पहुंचता है। इस योजना का एक और महत्वपूर्ण पहलू जलवायु अनुकूल विकास पर दिया गया विशेष जोर है। आज ग्रामीण भारत अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और अत्यधिक मौसमीय घटनाओं जैसी बढ़ती चुनौतियों का सामना कर रहा है। इनका सीधा असर कृषि और ग्रामीण आय पर पड़ता है।
भारत अब जलवायु अनुकूलन को ग्रामीण विकास से अलग करके नहीं देख सकता। जल सुरक्षा, वाटरशेड प्रबंधन और जलवायु के अनुरूप बुनियादी ढांचे का निर्माण गांवों के लिए आर्थिक प्राथमिकता बनता जा रहा है। यह योजना बाढ़ से बचाव के लिए तटबंधों को मजबूत करने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को भी सुनिश्चित करेगी।
योजना के क्रियान्वयन में तकनीक के उपयोग से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ने की उम्मीद है। रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम, जियो-टैगिंग और डिजिटल ट्रैकिंग जैसे उपायों से गड़बड़ियों को कम करने और निगरानी को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही समय पर मजदूरी भुगतान और शिकायत निवारण प्रणाली को भी अधिक मजबूत बनाने पर जोर दिया गया है। पिछले वर्षों में भुगतान में देरी ग्रामीण रोजगार योजनाओं के प्रति लोगों के विश्वास को कमजोर करती रही है। तेज भुगतान व्यवस्था और बेहतर निगरानी प्रणाली से जमीनी स्तर पर योजना के क्रियान्वयन में सुधार आ सकता है।
आने वाले दो दशकों में भारत की विकास गाथा केवल शहरों के विस्तार से तय नहीं होगी, बल्कि गांवों के उत्थान से भी निर्धारित होगी। ग्रामीण उत्पादकता में वृद्धि, मजबूत बुनियादी ढांचा और स्थानीय उद्यमों का विकास भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
वीबी-जी राम-जी की व्यापक सोच इसी दृष्टिकोण में निहित है। यह गांवों को राष्ट्रीय विकास और आर्थिक प्रगति का सक्रिय भागीदार मानती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि विकसित भारत का मार्ग सशक्त गांवों, आत्मनिर्भर समुदायों और समावेशी विकास से होकर गुजरता है। इसलिए विकसित भारत की राह भारत के गांवों, खेतों, पंचायतों और ग्रामीण उद्यमों से होकर ही निकलेगी। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह नई व्यवस्था महात्मा गांधी के गांवों की ताकत पर आधारित विचार और प्रधानमंत्री मोदी के 2047 तक विकसित भारत के संकल्प -दोनों को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
-डा. विक्रमजीत सिंह साहनी
पद्मश्री राज्यसभा सांसद


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