नई दिल्ली, 24 जुलाई (आईएएनएस)। राज्यसभा सदस्य डॉ. जॉन ब्रिटास ने आरोप लगाया है कि भारतीय पासपोर्ट और नागरिकता के मुद्दे पर केंद्र सरकार का रुख परस्पर विरोधाभासी है। उन्होंने कहा कि संसद में दिए गए सरकार के जवाब से स्पष्ट होता है कि पासपोर्ट की कानूनी प्रकृति में कोई बदलाव नहीं हुआ, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप केवल शब्दावली बदली गई है।
डॉ. ब्रिटास ने राज्यसभा में “भारतीय पासपोर्ट द्वारा नागरिकता की मान्यता” से जुड़े प्रश्न के उत्तर का हवाला देते हुए कहा कि सरकार ने इस बात से इनकार नहीं किया कि पुराने भारतीय पासपोर्ट पर स्पष्ट रूप से “सिटीजन ऑफ इंडिया” (भारत का नागरिक) लिखा होता था। सरकार ने अपने जवाब में कहा कि आईसीएओ के मशीन-पठनीय पासपोर्ट मानकों को अपनाने के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रारूप के अनुरूप “नेशनलिटी’ शब्द का उपयोग शुरू किया गया।
ब्रिटास ने कहा कि सरकार का यह जवाब स्वयं स्वीकार करता है कि बदलाव केवल अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप शब्दों का था, न कि पासपोर्ट की कानूनी हैसियत का। ऐसे में यह कहना कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है। सरकार के अपने ही स्पष्टीकरण से मेल नहीं खाता।
उन्होंने कहा कि जब भी नागरिकता से जुड़े विवाद सामने आते हैं, सरकार यह तर्क देती है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, जबकि संसद में दिए गए उत्तर से स्पष्ट है कि सिटीजन ऑफ इंडिया की जगह केवल “नेशनलिटी’ शब्द का इस्तेमाल किया गया और इससे पासपोर्ट की कानूनी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
डॉ. ब्रिटास ने कहा कि उन्होंने सरकार से यह भी पूछा था कि क्या मतदाता सूची से नाम हटाए जाने या किसी अन्य प्रशासनिक कार्रवाई के आधार पर किसी मौजूदा पासपोर्ट धारक की नागरिकता पर सवाल उठाया जा सकता है या उसका पासपोर्ट नवीनीकरण रोका जा सकता है। इस पर सरकार ने जवाब दिया कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार ही पासपोर्ट जारी और नवीनीकृत किए जाते हैं।
उनका कहना है कि इसका स्पष्ट कानूनी अर्थ है कि पासपोर्ट जारी करने और नवीनीकरण की प्रक्रिया केवल पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के प्रावधानों से संचालित होती है, न कि मतदाता सूची संशोधन या किसी अन्य कानून के तहत की गई प्रशासनिक कार्रवाई से।
डॉ. ब्रिटास ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आधार पर वरिष्ठ पत्रकार और ‘द टेलीग्राफ’ के पूर्व संपादक राजगोपाल रामदास का पासपोर्ट नवीनीकरण प्रारंभिक तौर पर रोक दिया गया था। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई सरकार के संसद में दिए गए जवाब के विपरीत है।
उन्होंने मांग की कि केंद्र सरकार स्पष्ट करे कि मतदाता सूची से जुड़े एक प्रशासनिक अभ्यास को पासपोर्ट अधिनियम से ऊपर कैसे माना गया, किस अधिकार के तहत ऐसा निर्णय लिया गया और यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में किसी भी नागरिक को इस प्रकार पासपोर्ट सेवाओं से वंचित न किया जाए।
डॉ. ब्रिटास ने कहा कि संसद में सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि पासपोर्ट प्रशासन पासपोर्ट अधिनियम के तहत संचालित होता है, न कि एसआईआर जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के आधार पर। इसलिए इस सिद्धांत का पालन केवल संसद में दिए गए जवाब तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि देश के सभी पासपोर्ट कार्यालयों में भी समान रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
–आईएएनएस
एएमटी/वीसी
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