शिक्षकों के स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव डालती है कार्यस्थल की संस्कृति: आईआईटी गुवाहाटी

नई दिल्ली, 1 मई (आईएएनएस)। एक अनूठी रिसर्च में पता लगा है कि कार्यस्थल के तौर-तरीके व नेतृत्व स्कूली शिक्षकों के भावनात्मक स्वास्थ्य व कार्य संतुष्टि पर असर डालते हैं। नए शोध ने यह अहम सच सामने रखा है कि स्कूल की कार्य संस्कृति सीधे शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य और संतुष्टि को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है। यह रिसर्च आईआईटी गुवाहाटी के स्कूल ऑफ बिजनेस में हुई है।

अध्ययन से पता चलता है कि जब शिक्षक स्कूल में खुलकर अपनी वास्तविक छवि नहीं बना पाते, तो वे तनावग्रस्त और असंतुष्ट महसूस करते हैं। रिसर्च के दौरान आईआईटी के शोधकर्ता सहायक प्रोफेसर डॉ. अब्राहम सिरिल इसाक व शोधार्थी एम.ए. जयशंकर शोध ने पाया कि स्कूली शिक्षक छात्रों के साथ बातचीत करते समय सहज महसूस करते हैं। वहीं संस्थागत दबाव या वरिष्ठ सहकर्मियों की उपस्थिति में वे अपनी वास्तविक पहचान को दबा जाते हैं। यही असंतुलन कार्य संतुष्टि में कमी और भावनात्मक तनाव में वृद्धि का कारण बनता है।

शोध में एक दिलचस्प बात सामने आई। शिक्षक कक्षा में खुलकर पढ़ाते हैं, लेकिन स्टाफ रूम या प्रशासन के सामने वे खुद को दबाव में ले लेते हैं। यही दबाव तनाव और असंतोष को जन्म देता है। यह शोध ‘कार्यस्थल प्रमाणिकता’ पर आधारित है। मतलब, शिक्षक अपने असली स्वभाव में कितना सहज हैं। भारतीय स्कूलों में पदानुक्रम का असर इस पर साफ दिखता है।

शोधकर्ताओं ने 30 अलग अलग-अलग शिक्षकों से बातचीत की। सवाल पूछ। जवाबों का गहराई से विश्लेषण हुआ। इसी आधार पर एक नया मॉडल तैयार हुआ यानी शिक्षक कार्यस्थल प्रमाणिकता प्रभाव मॉडल। इस मॉडल ने कई कमियां उजागर की हैं। खासकर सपोर्ट सिस्टम में। इसके मुताबिक स्कूल में नए शिक्षकों को ज्यादा दबाव झेलना पड़ता है। जिन शिक्षकों में आत्म-प्रमाणिकता ज्यादा थी, वे ज्यादा संतुष्ट थे। वे आलोचना और काम के दबाव को बेहतर तरीके से संभालते हैं। उनका संस्थान से जुड़ाव भी मजबूत होता है। इसके उलट, दबाव वाली संस्कृति उन्हें कमजोर बनाती है।

डॉ. इसाक का कहना है कि कक्षा में प्रामाणिकता शिक्षण को जीवंत बनाती है, लेकिन बाहर इसकी कमी शिक्षकों को दबाव में ला देती है। शिक्षा में सबसे बड़ा सुधार ढांचे से नहीं, संस्कृति से आता है। शिक्षक को खुद जैसा बनने दें। परिणाम खुद बेहतर होंगे। शोध में कई समाधान भी सुझाए गए हैं।

शोध के मुताबिक बेहतर नेतृत्व जरूरी है। सहयोगी माहौल बनाना होगा। काम का संतुलन रखना होगा। उत्पीड़न के खिलाफ सख्त नीतियां चाहिए। ऐसे कदम शिक्षकों के साथ-साथ छात्रों के अनुभव को भी बेहतर बनाएंगे। अगले चरण में अब शोध दल इस मॉडल को और मजबूत करेगा। अलग-अलग परिस्थितियों में इसे परखा जाएगा। इससे भविष्य की शिक्षा नीतियों को नई दिशा मिल सकती है।

–आईएएनएस

जीसीबी/वीसी

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