Pollution and Sports: दिल्ली और आसपास के इलाकों में खेलना अब सिर्फ फिटनेस और मेहनत की बात नहीं रह गई है, बल्कि सेहत बचाने की जंग बन गया है। हाल ही में इंडिया ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट के दौरान कई विदेशी खिलाड़ियों ने दिल्ली के Pollution पर सवाल उठाए। कुछ खिलाड़ियों ने तो सीधे अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति तक शिकायत पहुंचाई। उनका कहना था कि इतनी खराब हवा में खेलना सेहत के लिए खतरनाक है।
Pollution and Sports: जब ट्रेनिंग ग्राउंड ही खिलाड़ियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाए

लेकिन विदेशी खिलाड़ी चाहें तो टूर्नामेंट छोड़ सकते हैं या भविष्य में भारत न आने का फैसला कर सकते हैं। भारतीय खिलाड़ियों के पास यह विकल्प नहीं है। उन्हें रोज इसी हवा में सांस लेनी है, इसी गर्मी में पसीना बहाना है।
हॉकी कोच और द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता प्रीतम सिवाच बताती हैं कि सोनीपत के साई सेंटर में खिलाड़ी बार-बार बीमार पड़ रहे हैं। खांसी, एलर्जी और सांस की दिक्कत आम हो गई है। डॉक्टर साफ कहते हैं कि हवा और पानी दोनों ठीक नहीं हैं। खिलाड़ी ठीक होते हैं और फिर बीमार हो जाते हैं, यह सिलसिला खत्म नहीं होता।
एथलीट तेजस्विन शंकर, जो खुद दिल्ली से हैं, सर्दियों में दिल्ली छोड़कर भुवनेश्वर, फिर विदेश जाकर ट्रेनिंग करते हैं। उनका कहना है कि अब दिल्ली में सर्दी की ट्रेनिंग हिम्मत की नहीं, बल्कि प्रदूषण झेलने की परीक्षा बन गई है। गर्मी में भी हालात बेहतर नहीं होते।
Pollution and Sports: ट्रेनिंग प्लान बिगड़ रहा है, सपना भी खतरे में

पटियाला के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स में भी खिलाड़ी गर्मी से परेशान हैं। ओलंपिक चैंपियन Neeraj Chopra पहले ही कह चुके हैं कि इतनी गर्मी में बाहर खड़ा रहना भी मुश्किल हो जाता है, ट्रेनिंग तो बहुत दूर की बात है।
डॉक्टरों की चेतावनी भी साफ है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि प्रदूषित हवा में एक्सरसाइज करने से फेफड़ों पर ज्यादा दबाव पड़ता है, स्टैमिना घटता है और दिल-दिमाग पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में खिलाड़ियों को सुरक्षित जगहों पर ट्रेनिंग बेस बनाने की जरूरत है, लेकिन दिक्कत यह है कि देश के ज्यादातर बड़े खेल केंद्र इसी प्रदूषित इलाके में हैं।
दिल्ली, सोनीपत, रोहतक, चंडीगढ़, लखनऊ और पटियाला जैसे शहरों में भारत के टॉप ट्रेनिंग सेंटर हैं। पिछले दो ओलंपिक में भारत के ज्यादातर मेडल जीतने वाले खिलाड़ी यहीं से निकले हैं। यानी समस्या सिर्फ भविष्य की नहीं, बल्कि मौजूदा सिस्टम की जड़ में है।
कोच प्रीतम सिवाच कहती हैं कि अब साल में सिर्फ दो-तीन महीने ही ऐसे होते हैं जब बिना मौसम की चिंता किए ट्रेनिंग हो पाती है। वो भी लगातार नहीं। बारिश के काले बादल देखकर खुशी होती है, क्योंकि तब हवा थोड़ी साफ हो जाती है।

पैरालंपिक पदक विजेता सिमरन शर्मा के कोच बताते हैं कि प्रदूषण का असर सीधा शरीर पर पड़ता है। तेज दौड़ की ट्रेनिंग के बाद उल्टी होना और लंबे समय तक खांसी रहना आम बात हो गई है। अब ट्रेनिंग प्लान एयर क्वालिटी देखकर बनाना पड़ता है।
भारत 2036 ओलंपिक की मेजबानी का सपना देख रहा है। बड़े बजट, नई योजनाएं और गोल्ड मेडल का लक्ष्य तय किया जा रहा है। लेकिन अगर हवा और मौसम पर ध्यान नहीं दिया गया, तो खिलाड़ियों की मेहनत धीरे-धीरे टूटती रहेगी। यह नुकसान अचानक नहीं दिखेगा, लेकिन हर दिन थोड़ा-थोड़ा करके सपनों को कमजोर करता रहेगा।
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