तेल के बाद अब फर्टिलाइजर टेंशन! भारत में खेती-किसानी पर पड़ सकता है बड़ा असर

Fertilizer Import Crisis in India ( image AI ganrated)

Fertilizer Import Crisis in India: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर सिर्फ कच्चे तेल और गैस तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इसका खतरा खाद यानी फर्टिलाइजर सप्लाई पर भी मंडराने लगा है। भारत जैसे बड़े कृषि प्रधान देश के लिए यह स्थिति चिंता की बात है, क्योंकि यहां खेती के लिए बड़ी मात्रा में उर्वरक की जरूरत होती है और इसका एक बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। ऐसे में अगर पश्चिम एशिया में हालात और बिगड़ते हैं, तो भारत में खाद की उपलब्धता, कीमत और सरकारी सब्सिडी तीनों पर दबाव बढ़ सकता है।

Fertilizer Import Crisis in India: भारत की क्यों बढ़ी टेंशन?

भारत दुनिया के सबसे बड़े फर्टिलाइजर उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में हर साल खेती के लिए यूरिया, डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों की भारी मांग रहती है। हालांकि भारत ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने की दिशा में काम किया है, लेकिन अभी भी कई जरूरी उर्वरकों के लिए विदेशी बाजारों पर निर्भरता बनी हुई है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय सप्लाई में थोड़ी भी रुकावट भारत के लिए बड़ी समस्या बन सकती है।

आयात पर बढ़ती निर्भरता

पिछले कुछ समय में भारत का फर्टिलाइजर आयात तेजी से बढ़ा है। फरवरी 2026 तक भारत करीब 9। 8 मिलियन टन तैयार उर्वरक आयात कर चुका था। इससे पहले पिछले वित्त वर्ष में देश ने लगभग 10। 23 अरब डॉलर, यानी करीब 94 हजार करोड़ रुपये, का खाद आयात किया था। यह आंकड़ा बताता है कि देश को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर विदेशों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि 2025-26 के दौरान भारत का फर्टिलाइजर आयात रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। अनुमान है कि यह 18 अरब डॉलर के करीब जा सकता है। वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में ही खाद आयात में तेज उछाल देखने को मिला है, जो बताता है कि मांग लगातार बढ़ रही है जबकि घरेलू उत्पादन अभी पर्याप्त नहीं है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों है अहम?

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है। यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। खाड़ी देशों से निकलने वाला बहुत सा तेल, गैस और अन्य जरूरी सामान इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचता है। अगर यह मार्ग बंद रहता है या वहां तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो फर्टिलाइजर सप्लाई भी बाधित हो सकती है।

भारत यूरिया और अन्य उर्वरकों के लिए ओमान, सऊदी अरब, कतर और यूएई जैसे देशों पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में होर्मुज पर संकट आने का मतलब है कि इन देशों से भारत तक खाद पहुंचाने में देरी हो सकती है, शिपिंग महंगी हो सकती है और सप्लाई चेन पर सीधा असर पड़ सकता है।

खाद की कीमतों पर कैसे पड़ेगा असर?

अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबा खिंचता है, तो इसका सबसे पहला असर ट्रांसपोर्ट और शिपिंग लागत पर पड़ेगा। जहाजों के लिए वैकल्पिक रास्ते अपनाने पड़ सकते हैं, बीमा खर्च बढ़ सकता है और डिलीवरी में देरी हो सकती है। इन सभी वजहों से फर्टिलाइजर की कुल लागत बढ़ेगी।

जब आयात महंगा होगा, तो देश में यूरिया, डीएपी और अन्य रासायनिक उर्वरकों की कीमतों पर दबाव बढ़ना तय है। भले ही सरकार सब्सिडी देकर किसानों को राहत देने की कोशिश करे, लेकिन लंबे समय तक यह बोझ संभालना आसान नहीं होगा। इससे सरकारी खजाने पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

सब्सिडी बिल भी बढ़ने का खतरा

भारत में खाद की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार भारी सब्सिडी देती है। 2025-26 में फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल करीब 1। 86 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। यह केंद्र सरकार के कुल सब्सिडी खर्च का बहुत बड़ा हिस्सा है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं और सप्लाई महंगी होती है, तो यह बिल और बढ़ सकता है। सरकार के लिए यह दोहरी चुनौती होगी। एक तरफ किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध करानी होगी, दूसरी तरफ बढ़ते आयात और सब्सिडी खर्च को संभालना होगा।

कौन-कौन से उर्वरक हो सकते हैं सबसे ज्यादा प्रभावित ?

भारत में यूरिया का घरेलू उत्पादन बढ़ा जरूर है, लेकिन डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों के मामले में अभी भी आयात पर निर्भरता बनी हुई है। यही कारण है कि संकट की स्थिति में सबसे ज्यादा असर इन्हीं उर्वरकों पर पड़ सकता है। अप्रैल से दिसंबर के बीच यूरिया आयात में करीब 85 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि डीएपी आयात भी लगभग 46 प्रतिशत बढ़ा। यह दिखाता है कि मांग लगातार बढ़ रही है।

भारत क्या कर रहा है तैयारी?

संभावित संकट को देखते हुए भारत अब वैकल्पिक सप्लाई स्रोत तलाशने में जुटा है। सरकार और संबंधित एजेंसियां इंडोनेशिया, बेलारूस, मोरक्को और रूस जैसे देशों से आयात बढ़ाने पर विचार कर रही हैं। इसके अलावा सऊदी अरब, रूस और मोरक्को के साथ समझौते कर करीब 86 लाख मीट्रिक टन खाद की सप्लाई सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है। इसका मकसद यही है कि अगर मिडिल ईस्ट से सप्लाई प्रभावित होती है, तो दूसरे देशों के जरिए कमी को पूरा किया जा सके। हालांकि यह आसान नहीं होगा, क्योंकि वैश्विक बाजार में भी मांग और कीमतें तेजी से बदल रही हैं।

आगे क्या हो सकता है?

भारत के लिए आने वाले महीने काफी अहम होंगे। खरीफ सीजन की बुआई शुरू होने वाली है और ऐसे समय में खाद की मांग तेजी से बढ़ती है। अगर मिडिल ईस्ट संकट गहराता है, तो भारत को खाद की उपलब्धता और कीमत दोनों मोर्चों पर चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, तेल और गैस के बाद अब खाद भी मिडिल ईस्ट तनाव की चपेट में आ सकती है। भारत के लिए यह केवल व्यापार या आयात का मुद्दा नहीं, बल्कि खेती, किसानों और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा मामला है। यही वजह है कि सरकार अब नए विकल्पों की तलाश के साथ-साथ सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने पर भी जोर दे रही है।

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