Who Was Ali Khamenei?: अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ एक सैन्य अभियान शुरू किया है। ईरान की राजधानी तेहरान में कई धमाके सुने गए हैं और इस हमले का सीधा मकसद ईरान के शीर्ष नेतृत्व को ख़त्म करना है। इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। 86 वर्ष की उम्र में खामेनेई की मौत के साथ ही मिडिल-ईस्ट के एक सबसे शक्तिशाली अध्याय का अंत हो गया। वह पिछले 37 सालों से ईरान की सत्ता पर काबिज थे। वो न केवल ईरान के सबसे बड़े नेता, बल्कि वह पूरी दुनिया में शिया राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक माने जाते थे।
4 साल की उम्र में खामेनेई ने ‘कुरआन’ पढ़ना सीखा
अली खामेनेई का जन्म 1939 में ईरान के उत्तर-पूर्वी मशहद में हुआ था, जो शिया मुसलमानों ने बेहद पवित्र माना जाता है। उनके पिता एक प्रतिष्ठित धार्मिक विद्वान थे और घर का माहौल भी साधारण था, लेकिन शिक्षा और धर्म को लेकर बेहद गंभीर था। उनकी मां खादिजे मिर्दामादी को कुरान और साहित्य से बहुत लगाव था। खामेनेई कहते थे कि उनका कविता और किताबों के प्रति प्रेम अपनी मां से ही आया। यही कारण था कि धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ साहित्य भी उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा बना।
महज चार साल की उम्र में खामेनेई में उन्हें ‘मकतब’ यानी मदरसे भेज दिया गया, जहां उन्होंने ‘कुरआन’ पढ़ना सीखा। उन्होंने औपचारिक स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं की। जब वह थोड़े बड़े हुए, तो उन्होंने धर्मशास्त्र की पढ़ाई शुरू कर दी। मशहद के धार्मिक संस्थानों से शिक्षा लेने के बाद वे उच्च अध्ययन के लिए इराक के पवित्र शहर नजफ पहुंचे, जहां उन्होंने कई प्रसिद्ध आयतुल्लाओं से शिक्षा ली। बाद में वे ईरान के धार्मिक केंद्र कुम लौट आए। यहां उनकी मुलाकात रूहोल्लाह खुमैनी से हुई, जो उस समय शाह के खिलाफ खुलकर आवाज उठा रहे थे। यही मुलाकात खामेनेई के जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई और यहीं से उनके राजनीतिक और वैचारिक सफर की असल शुरुआत हुई।
खामेनेई का उदय: ईरान क्रांति से सत्ता और सैन्य ताकत तक

ईरान में 1950-60 के दशक में पहलवी राजशाही का शासन था। 1953 में प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को हटाने के लिए विदेशी ताकतों की मदद से तख्तापलट किया गया। इस घटना ने युवा अली खामेनेई की सोच पर गहरा असर डाला। इसके बाद वे शाह की नीतियों के आलोचक बन गए। कई बार उन्हें गुप्त पुलिस ने गिरफ्तार किया। शाह शासन के खिलाफ पप्रदर्शन में सक्रीय रहने के कारण उन्हें ईरान के दूरदराज इलाकों में निर्वासित भी कर दिया गया। आखिरकार 1979 में राजशाही नष्ट हुआ और इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई, जिसके सर्वोच्च नेता रूहोल्लाह खुमैनी बने।
इस्लामी क्रांति के बाद खामेनेई तेजी से सत्ता में आ गए। 1989 में उन्होंने ईरान की कमान संभाली, जो खुमैनी की मौत के बाद हुआ। खुमैनी ने 1979 की क्रांति का नेतृत्व किया था और पहलवी राजशाही को खत्म किया था।
खुमैनी को क्रांति का विचारक माना जाता है, लेकिन ईरान की सेना और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने का काम खामेनेई ने किया। उन्होंने सेना और अर्धसैनिक बलों को इस तरह तैयार किया कि ईरान न केवल अपने दुश्मनों से बच सके, बल्कि बाहरी क्षेत्रों में भी अपनी ताकत बढ़ा सके।
ईरान के सुप्रीम लीडर कैसे बने?
जून 1989 में अयातुल्लाह रूहोल्लाह खोमेनी की मृत्यु के बाद, असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने अली खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर चुना। इसमें खास बात ये थी कि उस समय तक खामेनेई शिया धर्मगुरुओं में उस जरूरी ऊंचे धार्मिक पद तक नहीं पहुंचे थे, जिसे सुप्रीम लीडर बनने के लिए संविधान में अनिवार्य बताया गया था। वहां कोई “मरजा-ए-तकलीद” (सबसे बड़े धार्मिक मार्गदर्शक) या ग्रैंड अयातुल्लाह ही सुप्रीम लीडर बन सकता था।
शुरुआत में लोग अली खामेनेई को कमजोर समझते थे और उन्हें यह विश्वास नहीं था कि वे इस्लामी गणराज्य के संस्थापक अयातुल्लाह खोमेनी के सही उत्तराधिकारी हैं। खामेनेई के लिए धार्मिक अधिकार से सत्ता चलाना मुश्किल था, क्योंकि उस समय ईरान की व्यवस्था उसी पर आधारित थी। वे लंबे समय तक अपने गुरु खोमेनी की छाया से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करते रहे, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी वफादार सुरक्षा व्यवस्था बनाई और उसी के सहारे ईरान पर अपनी पकड़ मजबूत की।
अमेरिका पर भरोसा नहीं करते थे खामेनेई
खामेनेई कभी भी पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका पर भरोसा नहीं करते थे। वह लंबे समय से अमेरिका पर आरोप लगाते रहे हैं कि वह उन्हें सत्ता से हटाना चाहता है। यहां तक की जनवरी के प्रदर्शनों के बाद एक भाषण में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अशांति के लिए जिम्मेदार ठहराया और कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति ईरानी जनता को हुए नुकसान और मौतों के लिए अपराधी हैं।
कैसे बढ़ी खामेनेई की ताकत?

36 साल के अपने कार्यकाल में जब भी खामेनेई पर दबाव बढ़ा, उन्होंने अक्सर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी कॉर्प्स गार्ड (IRGC) और बसीज जैसे अर्धसैनिक बलों की मदद ली। ये बल ईरान के भीतर विरोध को दबाने में उनका साथ देते रहे हैं। 2009 में चुनाव में गड़बड़ी के आरोपों के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों को भी इन्हीं बलों ने कुचल दिया था। 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हुए प्रदर्शनों में भी खामेनेई ने इन बलों का ही सहारा लिया। जनवरी 2023 में हुए ताजा प्रदर्शनों को भी इन बलों ने दबाया।
खामेनेई की ताकत का एक और बड़ा कारण उनका “सेताद” नाम का एक विशाल आर्थिक नेटवर्क है, जो सीधे उनके नियंत्रण में है। इसकी कीमत अरबों डॉलर में है और इससे सुरक्षा बलों में भारी निवेश किया गया है। खास बात यह है कि खामेनेई ने 1989 में सुप्रीम लीडर बनने के बाद से ईरान नहीं छोड़ा। वे अपनी आखिरी विदेश यात्रा उत्तर कोरिया में राष्ट्रपति रहते हुए कर चुके थे।
Iran Israel War: अमेरिका और इजरायल से क्यों बढ़ा ईरान का तनाव?

“एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” यानी प्रतिरोध की धुरी खामेनेई की प्रमुख रणनीति थी। उनका मानना था कि ईरान को सिर्फ अपनी सीमाओं के भीतर नहीं, बल्कि बाहर भी मजबूत रहना होगा, ताकि अमेरिका और इजरायल जैसे विरोधियों को रोका जा सके। इसी सोच के तहत ईरान ने कई क्षेत्रीय समूहों को समर्थन, हथियार और प्रशिक्षण दिया। इस रणनीति के मुख्य योजनाकार कासिम सुलेमानी थे, जो ईरान की कुद्स फोर्स के प्रमुख भी थे। साल 2020 में अमेरिका के हमले में सुलेमानी की मौत हो गई, जो खामेनेई के लिए बड़ा झटका साबित हुई ।
7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा दक्षिणी इजरायल पर हमले के बाद हालात तेजी से बदल गए। इजरायल ने गाजा में एक बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत की, जिसमें भारी तबाही मची और हमास के कई शीर्ष नेता मारे गए। इसके बाद, इजरायल ने लेबनान में हिज्बुल्लाह को भी निशाना बनाया और उसके कई वरिष्ठ नेताओं को मार गिराया, जिनमें प्रमुख नेता हसन नसरल्लाह भी शामिल थे।
दिसंबर 2024 में सीरिया में बशर अल-असद की सरकार गिरने से वह मार्ग भी बंद हो गया, जिसके जरिए ईरान हिज्बुल्लाह तक हथियार और सहायता पहुंचाता था। इसके परिणामस्वरूप, ईरान के कई सहयोगी कमजोर पड़ गए।
इन हालात में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जो लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमला करने की वकालत करते रहे थे, को एक सुनहरा मौका मिला। 13 जून 2025 को इजरायल ने अमेरिका की जानकारी में ईरान पर हमला किया। इस हमले में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और परमाणु वैज्ञानिक मारे गए और परमाणु ठिकानों को नुकसान हुआ। ईरान ने जवाब में तेल अवीव पर मिसाइलें दागीं। यह संघर्ष लगभग दो हफ्ते तक चलता रहा और अंत में अमेरिका ने ईरान की तीन प्रमुख परमाणु सुविधाओं पर बड़े बम गिराए।
इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खामेनेई शासन और ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लगा दिए, जिसके बाद ईरान में बड़े आर्थिक प्रदर्शन हुए। ये प्रदर्शन धीरे-धीरे जनवरी 2026 में एक व्यापक आंदोलन में बदल गए, और इस दौरान हजारों प्रदर्शनकारियों की मौत की खबरें सामने आईं।
Ali Khamenei Death: हमले में खामेनेई की मौत

डोनाल्ड ट्रंप को खामेनेई को खुली चेतावनियां दीं और परमाणु समझौता करने का दबाव बनाया। खामेनेई शासन बातचीत की प्रक्रिया में था, तभी 28 फरवरी, शनिवार को इजरायल और अमेरिका ने संयुक्त ऑपरेशन किया, जिसमें खामेनेई समेत कई ईरानी नेताओं को निशाना बनाया गया। इस हमले में खामेनेई की मौत हो गई और इसके साथ ही एक लंबे दौर का अंत हो गया।
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