भारत ने अपनी परमाणु ऊर्जा रणनीति में एक ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है जिसने इसे दुनिया के सबसे उन्नत परमाणु राष्ट्रों की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्वदेशी रूप से विकसित 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने सफलतापूर्वक ‘क्रिटिकैलिटी’ (सतत् नाभिकीय शृंखला अभिक्रिया) प्राप्त कर ली है। इस गौरवशाली क्षण के साथ ही भारत आधिकारिक तौर पर अपने ‘तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम’ के दूसरे चरण में प्रवेश कर गया है। भारत अब रूस के बाद दुनिया का केवल दूसरा ऐसा देश बन गया है जो वाणिज्यिक स्तर पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का संचालन करेगा। भारत के परमाणु कार्यक्रम के वास्तुकार डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने दशकों पहले एक ऐसे भविष्य की कल्पना की थी, जहां भारत अपने विशाल थोरियम भंडारों का उपयोग करके ऊर्जा के क्षेत्र में पूर्ण आत्मनिर्भर बन सके। पीएफबीआर की सफलता उसी दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। यह रिएक्टर जितना ईंधन इस्तेमाल करता है उससे अधिक उत्पन्न करने की क्षमता रखता है। यह तकनीक भविष्य में थोरियम से यूरेनियम-233 बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगी, जो भारत के तीसरे चरण (असीमित ऊर्जा) का मुख्य आधार है। रणनीतिक बढ़त और वैश्विक दबदबा यह उपलब्धि सिर्फ वैज्ञानिक नहीं बल्कि रणनीतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहां दुनिया के अधिकांश देश यूरेनियम आपूर्ति के लिए दूसरों पर निर्भर हैं, भारत ने अपनी सीमित यूरेनियम भंडार की चुनौती को अपनी स्वदेशी तकनीक से अवसर में बदल दिया है। भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (भाविनी) द्वारा निर्मित यह रिएक्टर ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सबसे बड़ा उदाहरण है। परंपरागत परमाणु रिएक्टरों के विपरीत, फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों (एफबीआर) का एक अनूठा लाभ है – वे जितना ईंधन खपत करते हैं उससे अधिक ईंधन का उत्पादन कर सकते हैं। आयातित यूरेनियम पर निर्भरता कम करें दीर्घकालिक ऊर्जा स्थिरता में सुधार करें इससे एफबीआर तकनीक भारत जैसे उन देशों के लिए बेहद मूल्यवान बन जाती है जिनके पास यूरेनियम के सीमित भंडार हैं लेकिन थोरियम के प्रचुर भंडार हैं। भारत की परमाणु ऊर्जा रणनीति तीन चरणों वाले मॉडल पर आधारित है:चरण 1: यूरेनियम आधारित रिएक्टरचरण 2: तीव्र प्रजनक रिएक्टर (जैसे कल्पक्कम पीएफबीआर)चरण 3: थोरियम-आधारित ऊर्जा प्रणालियां कल्पक्कम रिएक्टर चरण 2 और चरण 3 के बीच सेतु का काम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जिससे भविष्य में बड़े पैमाने पर थोरियम के उपयोग का मार्ग प्रशस्त होता है। आज का विश्व केवल आर्थिक या राजनीतिक संघर्षों का नहीं, बल्कि ऊर्जा की सुरक्षा और संसाधनों पर नियंत्रण का भी युग है। पश्चिम एशिया में उभरे तनाव, विशेषकर ईरान से जुड़े संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यूरेनियम अब केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का आधार बन चुका है। यह युद्ध विश्व को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की आवश्यकता का संदेश देता है। तीन चरणों वाली इस यात्रा को आसान बनाना नामुमकिन था। पहला परीक्षण फास्ट ब्रीडर रिएक्टर 2000 के दशक की शुरुआत में ही बन पाया था। इस सफर के दौरान कई बार ऐसा लगा कि भारत अपना लक्ष्य भटक गया है। उम्मीद है कि कल्पक्कम में क्रिटिकैलिटी हासिल करने से यह बदलाव एक बार फिर से गति पकड़ लेगा। कल्पक्कम से मिली खबरों से संकेत मिलता है कि भारत आखिरकार अपने परमाणु क्षेत्र के तेजी से विस्तार के लिए गंभीर प्रयास कर रहा है। परमाणु ऊर्जा मिशन की स्थापना, शांति अधिनियम का लागू होना, एसएमआर के विकास को बढ़ावा देना और निजी भागीदारी के लिए परमाणु क्षेत्र को खोलना, ये सभी इस दिशा में उठाए गए महत्वपूर्ण कदम हैं। देश 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को बढ़ाकर कम से कम 100 गीगावाट (जीडब्ल्यू) करने की योजना बना रहा है। यह लक्ष्य भारत की स्वतंत्रता के 100 साल पूरे होने के अवसर से भी जुड़ा हुआ है। वर्तमान में भारत में 24 परमाणु रिएक्टर संचालित हैं, जिनकी कुल क्षमता 8,780 मेगावाट इलेक्ट्रिक (एमडब्ल्यूई) है। इसके अलावा, 6,028 एमडब्ल्यूई क्षमता वाले 8 और रिएक्टर निर्माणाधीन हैं।
सरकारी अनुमान के अनुसार, 2030 के शुरुआती वर्षों तक यह क्षमता करीब 22 गीगावाट तक पहुंच सकती है, जिसके बाद इसे तेजी से बढ़ाकर 100 गीगावाट के लक्ष्य तक ले जाया जाएगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्यारह गुना से अधिक की इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है, जिसमें बड़े परमाणु रिएक्टर जैसे स्वदेशी 700 एमडब्ल्यूई प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर) और ग्रीनफील्ड साइट्स पर आयातित बड़े प्लांट शामिल हैं। साथ ही स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर जैसे 200 एमडब्ल्यूई भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (बीएसएमआर) और 55 मेगावाट इलेक्ट्रिक एसएमआर-55 यूनिट्स पर भी काम किया जा रहा है। 2047 तक भारत की ऊर्जा मांग लगभग तीन गुना होने का अनुमान है। सौर और पवन ऊर्जा वर्तमान जरूरतें पूरी कर रही हैं परंतु उनकी अनियमितता के कारण स्थिर ऊर्जा के रूप में परमाणु ऊर्जा आवश्यक बनी रहेगी।























