बिहार के नए सम्राट

अतीत हो या वर्तमान बिहार स्वयं देशवासियों के लिए एक बहुत बड़ा ब्रांड है। बिहार सिर्फ भारत का एक राज्यभर नहीं है बल्कि एक संस्कृति है। धार्मिक समागमों और सामंजस्य की धरोहर भी है। बिहार चाणक्य की धरती है। गौरवशाली मौर्य साम्राज्य की स्थापना में चाणक्य की भूमिका को कौन भूला सकता है। यह भगवान महावीर और बुद्ध की जन्म भूमि और कर्म भूमि है। यह सिखों के दशम गुरु गोविन्द सिंह जी की मातृ भूमि है। राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की राष्ट्रवादी कविताएं इसी धरा से उपजी हैं। आर्य भट्ट जैसे विद्वान ने बिहार से ही गणित और खगोलीय अध्ययन में दुनिया को आधारभूत ज्ञान दिया था। वैशाली का प्राचीनतम गणतंत्र ​बिहार की ही देन है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश की राजनीति में आए निर्णायक मोड़ का श्रेय बिहार को ही जाता है। जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान भी इसी धरती से किया था। बुधवार को सम्राट चौधरी के साथ ही राज्य में सम्राट युग का आगाज हो गया है। 9 वर्ष पहले जब वे भाजपा में शामिल हुए थे तब उन्होंने शायद इसकी कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन वो बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे। यद्यपि राजनीति की क, ख, ग उन्होंने अपने पिता शकुनि चौधरी से ही सीखा। नीतीश शासन समाप्त होने के साथ ही अब बिहार में राजनीतिक दशा और दिशा के पूरी तरह से बदलने के संकेत मिलने लगे हैं।
बिहार के इतिहास में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार की सियासत ऐतिहासिक मोड़ पर आ खड़ी हुई है। पिछले 20 वर्षों से पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सत्ता का केन्द्र बने हुए थे और पूरी सियासत उनके इर्द-गिर्द ही सिमटी हुई थी। बीजेपी बैक डोर पर थी लेकिन अब सत्ता की गाड़ी का स्टेयरिंग पूरी तरह से भाजपा के हाथ में आ चुका है। स्पष्ट है कि राज्य में राजनीतिक समीकरण बदलेंगे। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अब राजनीतिक मुकाबला त्रिकोणीय नहीं, बल्कि सीधे तौर पर भाजपा आैर तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली राजद के साथ होगा आैर आने वाले दिनों में नीतीश कुमार की जनता दल (यू) बैकफुट पर आ जाएगी। नीतीश के दिल्ली में राज्यसभा के सदस्य बनने से जनता दल (यू) का जनाधार खिसक सकता है। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते भाजपा खुलकर हिन्दुत्व का दांव नहीं खेल पाती थी, क्योंकि नीतीश का वोट बैंक कुर्मी-कोइरी और अति पिछड़ा वर्ग रहा। नीतीश ने हमेशा सामाजिक न्याय के एजैंडे का समर्थन किया। राज्य की राजनीति क्या करवट लेती है। यह भविष्य के गर्भ में है। फिलहाल सम्राट चौधरी के सिर पर मुख्यमंत्री का ताज उनके लिए बहुत बड़ी अग्नि परीक्षा होगी। उनके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। सम्राट चौधरी के सीएम बनने के बाद उनसे लोगों की अपेक्षाएं भी कम नहीं हैं। लोगों ने 2 दशक तक नीतीश कुमार का राज देखा है। बिहार को जंगल राज से बाहर निकाल कर नीतीश ने सुशासन कायम किया तो विकास की गंगा भी बहाई। सड़क, पुल, बिजली और पानी जैसी ढांचागत सुविधाओं से बिहार लैस हुआ है तो इसके पीछे नीतीश कुमार की सुविचारित योजनाएं रही हैं। बाद के दिनों में नीतीश भले कमजोर पड़े, लेकिन पहले टर्म में उन्होंने अपराध नियंत्रण की दिशा में जो काम किए उसे उस दौर की पीढ़ी कभी नहीं भूलेगी। अब बिहार की बागडोर सम्राट चौधरी के हाथ में है। भाजपा को बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने का सौभाग्य 75 साल बाद मिला है। इस ऐतिहासिक दौर की जिम्मेदारी सम्राट को मिलना सामान्य बात नहीं है। अब सम्राट के सामने अपनी काबिलियत साबित करने की बारी है। उन्हें 5 ऐसी बड़ी चुनौतियां विरासत में मिली हैं जिन पर कायदे से उन्होंने काम कर लिया तो उनकी गिनती यूपी में अपराधियों पर नकेल कसने वाले योगी आदित्यनाथ की कतार में होने लगेगी। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए उन्हें नरेंद्र मोदी के अंदाज में काम करना होगा। बिहार में भाजपा को और आगे ले जाने की सियासी चुनौती भी उनके सामने है।
उनके सामने शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार, औद्योगिक कमी, बुनियादी ढांचे का अभाव और गरीबी मुंह बाये खड़ी है। बिहार आज भी देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार है। बिहार में मल्टी डाइमैंशनल गरी​बी दर 33.76 प्रतिशत है, जो देश में सबसे ऊंची है। 2015-16 में यह 51.91 फीसदी थी। सुधार तो हुआ लेकिन अभी भी 3.77 करोड़ लोग गरीबी में हैं। ​िबहार के 3 करोड़ से ज्यादा लोग यानि करीब एक-चौथाई युवा बाहर काम करते हैं। दो में से तीन घरों में कम से कम एक सदस्य दूसरे राज्य में है। पिछले वर्ष भी यही ट्रैंड जारी रहा। लालू-राबड़ी और नीतीश के शासन में भी बिहार के लाखों युवा दिल्ली, सूरत, मुम्बई, बेंगलुरु, पंजाब में चले गए क्यों​िक उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं मिल रहा। ​बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण से पता चलता है कि बिहार में प्रति व्यक्ति आय 76,490 रुपए है। यानि राष्ट्रीय औसत का ​िसर्फ 32.37 फीसदी है। राज्य की अर्थव्यवस्था 49.6 प्रतिशत कृषि पर निर्भर है। मैन्यूफैक्चरिंग पर निर्भरता सिर्फ 5.7 प्रतिशत है। ​बिहार में जनसंख्या दर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। आैद्योगिक विकास धीमा है। फैक्ट्रियां कम हैं आैर मैन्यूफैक्चरिंग सैक्टर बहुत छोटा है। हर साल बाढ़ राज्य का बहुत नुक्सान कर देती है। बिहार में नीतीश कुमार ने 24 नवंबर 2005 को सत्ता संभालने के बाद जो लकीर खींची, वो इतनी बड़ी है जिसका कोई ओर-छोर नहीं है। नीतीश कुमार के विरोधी भी इस बात को मानते हैं। वहीं नीतीश कुमार ने अपने ऊपर पूरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार का एक दाग तक नहीं लगने दिया। सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है। क्राइम कंट्रोल से लेकर पुलिस की छवि आम जनता के बीच सही रहे, कार्रवाई निष्पक्ष हो तभी सम्राट चौधरी बतौर सीएम बिहार के लोगों का विश्वास जीत पाएंगे। ये इतनी बड़ी चुनौती है कि इसमें हुई एक भी गलती भारी पड़ सकती है। ऐसे में सीएम सम्राट चौधरी के लिए नीतीश की खींची लकीर के बराबर लाइन बनाना भी एक बड़ी चुनौती ही है। नीतीश कुमार पर कभी जाति-पाति के आरोप नहीं लगे। सम्राट चौधरी को भी इन सब चुनौतियों से जूझना होगा और जनता की इच्छाओं पर खरा उतरना होगा। भाजपा विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और ​िहन्दुत्व के एजैंडे पर आक्रामक रुख अपनाएगी और इसके जवाब में राजद सामाजिक न्याय के एजैंडे को धार देंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Make Punjab Kesari Your Trusted News Source

पंजाब केसरी एक हिंदी भाषा का समाचार पत्र है जो भारत में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के कई केंद्रों से प्रकाशित होता है।