एआई : चुनौतियां भी कम नहीं

नई दिल्ली में दुनियाभर के दिग्गज एआई के ढांचे को सुरक्षित बनाने के लिए विचार मंथन कर रहे हैं तो दूसरी तरफ एआई के दुरुपयोग को लेकर चिंताएं भी गहरी हो रही हैं। आज के दौर में डीपफेक के खतरे सामने आ रहे हैं। एआई से फर्जी तस्वीरें, फर्जी वीडियो दिखाई दे रहे हैं। अब तो वकील भी एआई से तैयार याचिकाएं दायर कर रहे हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि याचिकाएं ऐसे तैयार नहीं होती। दायर की गई याचिकाओं में कुछ ऐसे संदर्भ थे जो कभी हुए ही नहीं। हाल ही में एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि आिर्टफिशियल मॉडल जैसे की चैट जीपीटी की मदद से नकली आधार आैर पैन कार्ड भी बनाये जा सकते हैं। तकनीक के दोहरे दौर से राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरा उभर रहा है। कुछ घटनाएं सामने आई हैं जो ऐसी प्रवृत्ति को उजागर करती हैं जहां दुश्मन देश और आपराधिक आतंकवादी संगठन दोेनों ही एआई के दोहरे उपयोग की क्षमताओं को फायदा उठाते हैं। सबसे बड़ा सवाल उभर कर सामने आ रहा है कि क्या एआई के दौर में हर चीज अपनी मौलिकता को खो देगी। चारों ओर नकली ​चीजों को बोलबाला तो नहीं हो जाएगा। चाहे वे दस्तावेज हो, कला हो, साहित्य हो। एआई से तो व्यक्तियों की भी प्रभावी नकल की जा सकती है। शिक्षा के क्षेत्र में देेखे अगर कक्षाओं में एआई की उपस्थिति है तो फिर परीक्षा केन्द्रों का क्या होगा। क्या भविष्य में छात्रों को परीक्षा केन्द्र में कैलकुलेटर या अन्य एआई उपकरण ले जाने की अनुमति दी जाएगी। सच तो यह है कि बच्चों के बुद्धि कौशल का क्या होगा, उनके मानसिक विकास को क्या होगा। क्या उनकी बाैद्धिक क्षमता मंद तो नहीं हो जाएगी। बहुत सारे सवाल समाज के सामने हैं।
आधुनिक तकनीक के रूप में मोबाइल या स्मार्टफोन जितना उपयोगी साबित हुआ है, उसके समांतर अब उसके ऐसे खमियाजे भी सामने आ रहे हैं जो कई बार व्यक्ति को बहुस्तरीय मानसिक परेशानियों के संजाल में फंसा लेते हैं, तो कभी वह उस चक्र में फंस कर अपनी जान भी गंवा बैठता है। स्मार्टफोन में कोई गेम खेलते हुए बच्चों के आत्महत्या कर लेने की खबरें अक्सर सामने आती रही हैं।
हाल के दिनों में जब से एआई के बढ़ते दायरे और इसके असर की बात होने लगी है, तब से इसे भविष्य में नौकरियों का सृजन करने का औजार भी बताया गया है। दूसरी ओर, एआई के फैलते पांव के समांतर रोजगार पर इसके व्यापक प्रभाव और खतरों को लेकर आशंकाएं भी जताई गई हैं। दिल्ली के सम्मेलन में एक उद्देश्य एआई से रोजगार, आम लोगों की जिंदगी पर पड़ने वाले असर और उसके खतरों को कम करने के लिए ठोस उपायों तथा प्रयासों पर भी चर्चा करना रहा। रक्षा और कारोबार के विभिन्न क्षेत्र में नए स्तर पर इसका प्रयोग हो रहा है। जाहिर है, विकास के नए मानक रचने और आधुनिक दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए एआई के मामले में हर वक्त अद्यतन रहने की जरूरत होगी। मगर रोजगार के अवसरों के सिकुड़ने से लेकर कई स्तर पर लोगों की जिंदगी से जुड़े बहुस्तरीय जोखिम के जैसे मामले तेजी से सामने आने लगे हैं, उसका हल निकालना सबसे बड़ी चुनौती होगी। यह जगजाहिर है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दायरा कितने बड़े क्षेत्र में फैल चुका है। हाथ में मौजूद स्मार्टफोन अब केवल तस्वीरें संपादित करके सोशल मीडिया के मंचों पर सुर्खियां हासिल करने का जरिया भर नहीं है। चिकित्सा जगत में एआई का उपयोग बीमारी की पहचान से लेकर इलाज में भी होने लगा है। अपराध पर लगाम लगाने के मामले में एआई की उपयोगिता साबित हो चुकी है।
शिक्षा जगत से लेकर तकनीक के मामले में जितनी तेज रफ्तार से नवाचार का प्रयोग हुआ है, सभी जरूरी क्षेत्रों में एआई का दायरा फैला है, उसमें इस पर चर्चा जरूरी हो जाती है कि इसकी संभावनाओं और उम्मीदों के साथ-साथ इससे जुड़ी आशंकाओं पर भी विचार हो। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि विकास के किसी स्वरूप से अंतिम तौर पर आम लोग प्रभावित होते हैं और कोई भी तकनीक इसी कसौटी पर देखी जाएगी कि उससे मनुष्य का कितना समग्र हित सुनिश्चित हो सका और दुनिया की ज्यादातर आबादी के लिए वह कितनी उपयोगी साबित हुई।
मगर इसके अलावा आजकल सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों पर संक्षिप्त वीडियो या रील बना कर प्रसारित करने की प्रवृत्ति जिस तेजी से बढ़ती देखी जा रही है उसने एक नई चिंता पैदा की है। हालत यह है कि सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात या किसी मनोरंजक गतिविधि को पहुंचाने के लिए लोग अजीबोगरीब तरीके भी अपनाने लगे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) द्वारा निर्मित छवियों को अब प्रमुखता से लेबल किया जाना अनिवार्य है। अक्तूबर में मसौदा नियमों के जारी होने के बाद से इस आदेश में कुछ सुधार हुए हैं: अब इस तरह के खुलासे के लिए कोई निश्चित आकार निर्धारित नहीं किया गया है और न ही यह किसी भी एआई-जनित छवि पर लागू होता है जो वास्तविक होने का दावा नहीं करती है। एआई-जनित छवियों ने उपयोगकर्ताओं के फीड को भर दिया है और उन्हें यह जानने का अधिकार है कि ये छवियां वास्तविक नहीं हैं। उपयोगकर्ताओं द्वारा कृत्रिम रूप से निर्मित सामग्री को घोषित करने की आवश्यकता स्वागत योग्य है। कृत्रिम छवियों को बनाने की तकनीक तेजी से विकसित हो रही है, इसलिए सरकार को नियमों के उन हिस्सों पर फिर से विचार करना होगा जो प्लेटफार्मों द्वारा कृत्रिम सामग्री का सक्रिय रूप से पता लगाने को अनिवार्य बनाते हैं। आखिरकार, हालांकि तकनीकी प्लेटफार्म आमतौर पर कृत्रिम मीडिया का स्वचालित रूप से पता लगाने में सक्षम होते हैं लेकिन इन पहचान तंत्रों में मौजूद खामियों को दूर करने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया जा रहा है जिससे यह क्षमता लगातार चुनौती का सामना कर रही है। तेजी से बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में दुनियाभर में अभी सबसे ज्यादा जोर आधुनिक तकनीकों के विकास और इस क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा नवाचार के प्रयोग पर दिया जा रहा है।

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