अयोध्या में ‘धर्म समिति’

Summary :

अयोध्या में श्री राम मन्दिर तीर्थ क्षेत्र में अब नौ ख्यातिलब्ध सन्तों की एक समिति धार्मिक कार्यों का संचालन इस प्रकार करेगी कि सभी प्रकार के पूजा-पाठ कार्यक्रमों का पालन हिन्दू शास्त्रों के अनुरूप नियमतः हो सके और उस पर किसी भी प्रकार का सन्देह न किया जा सके। इस आशय का फैसला कल तीर्थ क्षेत्र के न्यास (ट्रस्ट) ने लिया तो स्पष्ट था कि उसके सामने इस महत्वपूर्ण श्री राम मन्दिर की प्रतिष्ठा पर पिछले महीने उठी आशंकाओं के बादल थे। आशंका श्री राम मन्दिर को मिलने वाले चढ़ावे में चोरी किये जाने की खबरें पिछले महीने बाहर आने…

अयोध्या में श्री राम मन्दिर तीर्थ क्षेत्र में अब नौ ख्यातिलब्ध सन्तों की एक समिति धार्मिक कार्यों का संचालन इस प्रकार करेगी कि सभी प्रकार के पूजा-पाठ कार्यक्रमों का पालन हिन्दू शास्त्रों के अनुरूप नियमतः हो सके और उस पर किसी भी प्रकार का सन्देह न किया जा सके। इस आशय का फैसला कल तीर्थ क्षेत्र के न्यास (ट्रस्ट) ने लिया तो स्पष्ट था कि उसके सामने इस महत्वपूर्ण श्री राम मन्दिर की प्रतिष्ठा पर पिछले महीने उठी आशंकाओं के बादल थे। आशंका श्री राम मन्दिर को मिलने वाले चढ़ावे में चोरी किये जाने की खबरें पिछले महीने बाहर आने के बाद इतनी तेज हो गई थीं कि मन्दिर में श्रद्धालु दर्शकों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज हुई बल्कि चढ़ावे में चढ़ने वाली धनराशि भी गुणात्मक रूप से घटने लगी। चढ़ावा चोरी को लेकर धार्मिक सन्तों से लेकर आम व्यक्ति तक ने एेसी घटनाओं को महापाप की संज्ञा दी और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की अपेक्षा की, जिसकी वजह से उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ ने तुरत-फुरत एक जांच दल का गठन किया। चोरी कांड को लेकर राजनीति का बाजार भी खूब गर्म रहा और विपक्षी दलों ने इसे आस्था पर डाका डालने जैसी घटना बताया।
हम जानते हैं कि अयोध्या में श्री राम मन्दिर का निर्माण किन परिस्थितियों के बीच हुआ। 80 के दशक से लेकर 90 के दशक तक में पूरे देश में भाजपा व विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में जनान्दोलन चला जिसने राष्ट्रीय आन्दोलन का रूप ले लिया और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक में पहुंचा। चूंकि अयोध्या में श्री राम जन्म स्थान वही था जहां 16वीं सदी में एक इस्लामी धर्म का ढांचा खड़ा कर दिया गया था और उसे बाबरी मस्जिद कहा जाने लगा था। इस ढांचे को 6 दिसम्बर, 1992 को आन्दोलकारी भीड़ ने तोड़ दिया था अतः सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर ही यह स्थान हिन्दुओं को दिया गया जहां 2020 से मन्दिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। अतः अयोध्या के राम मन्दिर तीर्थ की महत्ता हिन्दुओं के अन्य तीर्थों से अलग मानी जाती है क्योंकि इसके निर्माण में भारत के आमजनों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। अतः इस तीर्थ क्षेत्र के कार्यकलापों में यदि किसी भी प्रकार की विसंगति या त्रुटि पाई जाती है तो उसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है जिसकी वजह से दलगत राजनीति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। चूंकि उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष की प्रथम छमाही में विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए राजनीति का गर्म होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस पृष्ठभूमि में तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक ने जो भी निर्णय लिये हैं वे आम श्रद्धालुओं के विश्वास अर्जन के लिए ही हैं। ट्रस्ट ने नौ सन्तों की समिति गठित करने के अलावा चढ़ावे में प्राप्त धन की गिनती करके उसे रोजाना बैंक में जमा करने का जो अनुबन्ध भारतीय स्टेट बैंक के साथ किया था उसकी समीक्षा किये जाने का भी निर्णय लिया। इससे स्पष्ट है कि ट्रस्ट अब चढ़ावे की धनराशि में किसी भी प्रकार की विसंगति को न पनपने देने की नीति पर चलना चाहता है।
तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने पिछले दिनों ही विज्ञापन दिया था कि उसे मन्दिर में एक मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) की आवश्यकता है। इस पद के लिए ट्रस्ट को 552 आवेदन प्राप्त हुए। जिनमें अधिसंख्य रिटायर नौकरशाह व लम्बा अनुभव रखने वाले अभ्यर्थी हैं। इस पद पर नियुक्ति करने के लिए ट्रस्ट ने अपनी पिछली बैठक में एक तीन सदस्यीय समिति गठित की थी। इस समिति का कहना है कि सभी 552 अभ्यर्थियों की परख करके उनमें से किसी एक व्यक्ति के चयन में उसे थोड़ा समय लगेगा, अतः अभी नियुक्ति की घोषणा नहीं की गई है। ट्रस्ट के सामने अब मुख्य प्रश्न यही है कि चढ़ावा चोरी घटना के बाद किस प्रकार श्री राम मन्दिर तीर्थ की शुचिता व पवित्रता को बेदाग बनाया जाये क्योंकि इस घपले को लेकर खुद ट्रस्ट की विश्वसनीयता पर ही संकट आ गया था और इसके महासचिव चंपक लाल व एक अन्य सदस्य अनिल मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया था। इससे मन्दिर की प्रबन्ध व्यवस्था व प्रणाली दोनों में ही नकारात्मक चर्चा होने लगी थी। अतः सबसे पहला काम ट्रस्ट ने यह किया है कि मन्दिर की नौ सदस्यीय धार्मिक समिति में स्थानीय सन्तों व जगदगुरु शंकराचार्यों को स्थान दिया है। इस समिति का नेतृत्व ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविन्द देव गिरी करेंगे। नौ सन्तों में महन्त कमलनयन दास, स्वामी रामानन्द दास, महन्त राम कुमार दास, स्वामी मिथिलेश नन्दिनी शरण, महन्त धीरेन्द्र दास (निर्मोही अखाड़ा) के अलावा जगदगुरु वासुदेवानन्द सरस्वती, जगदगुरु स्वामी विश्वप्रसन्न तीर्थ महाराज और स्वामी परमानन्द महाराज शामिल हैं। इनमें से पांच धर्मगुरु अय़ोध्या के ही अन्य मठों व मन्दिरों के प्रमुख हैं। अतः ट्रस्ट का प्रयास है कि मन्दिर के कार्यों में स्थानीय लोगों के धर्म प्रतिनिधियों को समुचित स्थान दिया जाये।
यह समिति ही अब मन्दिर के धार्मिक प्रबन्धन पर निगरानी रखेगी और अपने फैसले लेने के लिए स्वतन्त्र होगी जिनका अनुपालन ट्रस्ट के सदस्यों को भी करना होगा। यह समिति देखेगी कि मन्दिर में पूजा-पाठ आदि का कार्य वैदिक रामानन्दी परंपराओं के अनुसार हो। इसके साथ ही ट्रस्ट को यह अधिकार रहेगा कि वह मन्दिर में चढ़ने वाली सोने- चांदी की वस्तुओं का परीक्षण भारत सरकार की टकसाल के माध्यम से स्वतन्त्र रूप से करा सके। ये घटनाएं तब घट रही हैं जब उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चढ़ावा चोरी प्रकरण की जांच करने वाले विशेष दल ने अपनी अंतिम रिपोर्ट अभी तक नहीं सौंपी है। जांच रिपोर्ट के आने से पहले ही ट्रस्ट जिस प्रकार मशक्कत करके श्री राम मन्दिर की प्रतिष्ठा को पुनःस्थापित करने के प्रयास कर रहा है उसे प्रशंसनीय कदम कहा जा सकता है मगर जांच रिपोर्ट से ही सच उजागर होगा।

Aditya Chopra

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