अमेरिका व ईरान के बीच इस्लामाबाद में वार्ता टूटने के बावजूद कूटनीति के दरवाजे बन्द नहीं हुए हैं क्योंकि दोनों देशों के बीच अब केवल तीन ऐसे मुद्दे बचे हैं जिन पर युद्ध को टालने का दारोमदार है। ये तीन मुद्दे हैं – होर्मुज जलडमरूमध्य का यातायात के लिए खुलना, ईरान का परमाणु संवर्धन कार्यक्रम और विभिन्न देशों पर ईरान की लेनदारियों का जारी होना। जाहिर है कि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में और कुछ हुआ हो या न हुआ हो मगर इतना जरूर हुआ है कि ईरान ने अपनी दस मांगों की जगह ये तीन मांगें आगे कर दी हैं जिससे युद्ध की विभीषिका को टाला जा सके।
इसके साथ ही ईरान व अमेरिका दोनों ने यह घोषणा भी की है कि वे दो सप्ताह के युद्ध विराम से बंधे हुए हैं। पूरी स्थिति को यदि गौर से देखें तो एक तथ्य स्पष्ट रूप से उभरता है कि दोनों देशों ने अभी शान्ति की उम्मीद नहीं छोड़ी है। इसका प्रमाण यह भी है कि इस्लामाबाद छोड़ते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने कहा कि बेशक वार्ता असफल हो गई है परन्तु कई ऐसे बिन्दु उभरे हैं जिन्हें पकड़कर आगे चला जा सकता है। हालांकि राष्ट्रपति ट्रम्प वार्ता टूटने के बाद धमकी भरे लहजे में ऊल- जुलूल वक्तव्य लगातार दे रहे हैं लेकिन उनकी वाणी भी युद्ध के विकल्पों को खोजने को लालायित लगती है। इस बीच रूस के राष्ट्रपति श्री व्लादिमीर पुतिन का यह वक्तव्य बहुत महत्वपूर्ण है कि वह मध्यस्थता करने के बारे में सोच सकते हैं।
वास्तव में ईरान–अमेरिका के बीच दुनिया के किसी कद्दावर देश की ही जरूरत है मगर अमेरिका ने पाकिस्तान जैसे देश का चयन करके परिस्थितियों की गंभीरता के साथ समझौता करना बेहतर समझा था। विश्व राजनीति में पाकिस्तान की हैसियत किसी किराये के मुल्क से ज्यादा नहीं आंकी जाती क्योंकि इसके गठन के बाद से अमेरिका व पश्चिम यूरोप के देश इसका इस्तेमाल अपने हितों को साधने में करते रहे हैं। खास कर भारत के सन्दर्भ में वे इसे बराबरी पर रख कर भारत की श्रेष्ठता को कमतर करने की कोशिश करते हैं। अब इस कार्य में चीन भी लगा हुआ है वरना क्या वजह है कि जब पाकिस्तान खुद एक अवैध परमाणु हथियार रखने वाला देश है तो अमेरिका उसी की राजधानी इस्लामाबाद में बैठकर ईरान के वैध परमाणु कार्यक्रम को बन्द करवाना चाहता है।
ईरान ने परमाणु अप्रसार सन्धि पर हस्ताक्षर किये हुए हैं और उसका यूरेनियम संवर्धन करने का कार्यक्रम सीधे अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में रहता है। इसके बावजूद ईरान ने 2015 में अमेरिका से करार किया था कि वह परमाणु ऊर्जा का प्रयोग केवल नागरिक सुविधाओं के लिए ही करेगा और इसी दृष्टि से यूरेनियम संवर्धन का कार्यक्रम इस प्रकार चलायेगा कि 2030 तक वह शान्तिपूर्ण उद्देश्य के लिए अन्तर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मानकों के अनुसार परमाणु परीक्षण कर सके।
मगर ट्रम्प ने इस समझाैते को 2018 में रद्द कर दिया था लेकिन इस्लामाबाद में ईरान ने 1979 के बाद पहली बार अपने देश के सर्वोच्च नेतृत्व को सीधे अमेरिकी नेतृत्व से भेंट करने के लिए भेजा। जबकि 2013 में जब ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी थे तो वह न्यूयार्क गये थे मगर उनकी तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से फोन पर ही बातचीत हुई थी और तब जाकर दो साल बाद दोनों देशों के बीच परमाणु समझौता हुआ था। इसलिए इस्लामाबाद में वैंस व ईरानी संसद के अध्यक्ष गालिबफ के बीच सीधी बातचीत भी द्विपक्षीय संबंधों के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण पड़ाव है जिससे कूटनीतिज्ञ इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि बातचीत आगे भी जारी रखी जा सकती है।
ईरान के पास फिलहाल 440 किलो संवर्धित यूरेनियम है जिससे किसी परमाणु बम को नहीं बनाया जा सकता, बल्कि केवल बिजली बनाने में ही उसका उपयोग किया जा सकता है। ईरान यह वचन देने को तैयार है कि वह यूरेनियम का संवर्धन परमाणु बम बनाने के स्तर तक नहीं करेगा और एक संप्रभु देश के रूप में परमाणु ऊर्जा का उत्पादन करना उसका अधिकार है। अतः उसे इस जायज हक से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहां तक होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग का सवाल है तो यह विगत 28 फरवरी से युद्ध शुरू होने से पहले खुला हुआ था मगर ईरान पर जब अमेरिका व इजराइल ने महाविनाशक बमबारी की तो उसने इस रास्ते को रोक दिया।
यह रास्ता रुकने के बाद ही ईरान को अपनी उस छिपी हुई ताकत का अन्दाजा हुआ जो बमों व मिसाइलों से भी ज्यादा शक्तिशाली साबित हो सकती थी। अतः ईरान ने जलडमरूमध्य मार्ग को अब अपना अमोध अस्त्र बना लिया है। जहां तक विदेशों से ईरानी लेनदारियों का प्रश्न है तो अमेरिका व पश्चिमी यूरोप द्वारा लगाये गये इसके खिलाफ प्रतिबन्धों की वजह से इसका 27 अरब डालर धन विभिन्न देशों पर बकाया पड़ा हुआ है। ईरान मांग कर रहा है अमेरिका प्रतिबन्ध समाप्त करे जिससे उसे यह धन वापस मिल सके और युद्ध में अपने देश के ध्वस्त ढांचे का पुनर्निर्माण कर सके। जाहिर है कि उसकी इन तीन मांगों का सम्बन्ध कहीं न कहीं मानवीयता से जाकर भी जुड़ता है क्योंकि कुछ देश मिल कर किसी एक देश के खिलाफ ऐसे कदम नहीं उठा सकते जिसकी वजह से उसके लोगों का विकास ही रुक जाये क्योंकि ईरान के खिलाफ दोनों बार ही अमेरिका ने युद्ध शुरू किया है।
पिछले वर्ष जून में भी अमेरिका ने ही ईरान पर हमला किया था और दोनों बार ही अमेरिका उससे शान्ति वार्ता भी कर रहा था। जहां तक भारत का सम्बन्ध है तो उसके आगे अपने राष्ट्रीय हित सर्वोच्च हैं अतः भारत ने युद्ध विराम के चलते इजराइल द्वारा बेरूत पर किये हमले को गलत बताया है। इस हमले में लेबनान के 300 से अधिक नागरिक मारे गये थे। भारत के जहाजों को ईरान जलडमरूमध्य से गुजरने भी दे रहा है जिसकी वजह से भारत में पेट्रोल-डीजल व ईंधन गैस की ज्यादा कमी भी नहीं हो पा रही है। भारत कूटनीतिक माध्यमों में ईरान के साथ बातचीत भी लगातार कर रहा है और अमेरिका व इजराइल के साथ भी अपने सम्बन्ध सामान्य बनाये हुए है।























