डा. मनमोहन सिंह को क्लीन चिट मिलना !

Summary :

स्वतन्त्र भारत में अभी तक जितने भी प्रधानमन्त्री हुए हैं उनमें स्व. डा. मनमोहन सिंह एेसी प्रतिभा के धनी थे जो विश्व के माने हुए अर्थशास्त्री होने के साथ ही निजी तौर पर सादगी और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति समझे जाते थे। इसके बावजूद उनकी सरकार के दूसरे पांच साल के शासन के अन्तिम तीन वर्ष 2011 से लेकर 2014 तक भारी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे रहे। इन्हीं में से एक कथित घोटाला कोयला घोटाला था जिसमें तत्कालीन लेखा महानियन्त्रक ने एक लाख 86 हजार करोड़ रु. का नुकसान बताया था। हालांकि बाद में लेखा महानियन्त्रक पलट गये और उन्होंने…

स्वतन्त्र भारत में अभी तक जितने भी प्रधानमन्त्री हुए हैं उनमें स्व. डा. मनमोहन सिंह एेसी प्रतिभा के धनी थे जो विश्व के माने हुए अर्थशास्त्री होने के साथ ही निजी तौर पर सादगी और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति समझे जाते थे। इसके बावजूद उनकी सरकार के दूसरे पांच साल के शासन के अन्तिम तीन वर्ष 2011 से लेकर 2014 तक भारी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे रहे। इन्हीं में से एक कथित घोटाला कोयला घोटाला था जिसमें तत्कालीन लेखा महानियन्त्रक ने एक लाख 86 हजार करोड़ रु. का नुकसान बताया था। हालांकि बाद में लेखा महानियन्त्रक पलट गये और उन्होंने कहा कि यह राजस्व घाटा सांकेतिक था। मगर इससे डा. मनमोहन सिंह की साख को बट्टा लग चुका था क्योंकि इससे पहले 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले की गूंज संसद से लेकर सड़क तक हो चुकी थी जिसमें सरकारी राजस्व का एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए का नुकसान बताया जा रहा था।
इस कांड की जांच सीबीआई ने भी की और संसद की संयुक्त जांच समिति ने भी। मगर नतीजा कुछ नहीं निकला हालांकि इस कांड की वजह से संसद के कई सत्र शोर-शराबे में डूबते रहे और एक पूरा सत्र तो चला ही नहीं। इस मामले में तत्कालीन संचार व सूचना प्रोद्योगिकी मन्त्री ए. राजा के साथ द्रमुक पार्टी की सांसद श्रीमती कन्नी मोझी को जेल तक की हवा भी खानी पड़ी। मगर बाद में अदालत में यह मुकदमा ढेर हो गया और किसी के भी खिलाफ कोई आरोप सिद्ध नहीं हो सका। इस मामले में ए. राजा ने सिद्धान्त बनाया था कि मोबाइल फोन सर्विस उपलब्ध कराने वाली कम्पनियों को सरकार लाइसेंस पहले आओ पहले पाओ के आधार पर देगी।
राजा ने इस प्रणाली को राशन के चावल कहा जिससे भारत के लोगों को मोबाइल सेवाएं सस्ते से सस्ते भाव पर मिल सकें। वास्तव में एेसा हुआ भी था क्योंकि 2-जी सेपैक्ट्रम आवंटन के बाद मोबाइल फोन की काल दरें बहुत सस्ती हो गई थीं। अब कोयला घोटाला में जो हुआ वह राजनैतिक रूप से कम रोमांचकारी नहीं था क्योंकि देश के विभिन्न खनिज सम्पन्न प्रदेशों में कोयला खदानों का आवंटन डा. सिंह के मन्त्रिमंडल के सदस्य रहे मन्त्रियों के रिश्तेदारों व सांसदों ने भी कराया था। जब ये कोयला खदाने बांटी गई तो कोयला मन्त्रालय डा. सिंह के ही नियन्त्रण में था।
अतः खदानों का आवंटन स्वयं प्रधानमन्त्री की कलम से हुआ था। तकनीकी तौर पर डा. सिंह को इसमें फंसाने की भरपूर कोशिश की गई। इसी कोशिश में 2015 में निचली अदालत ने डा. मनमोहन सिंह को तलब कर लिया था। जबकि 2014 में ही इस कांड की जांच कर रही सीबीआई ने अपनी कोई भी साक्ष्य न होने की वजह से मामले को बन्द करने की सिफारिश की थी। अदालत ने सीबीआई की सिफारिश को बरतरफ करते हुए पूर्व प्रधानमन्त्री को तलब किया था और टिप्पणी की थी। इसके लगभग दस वर्ष बाद विगत बुधवार को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को खारिज करते हुए डा. मनमोहन सिंह को क्लीन चिट दी है और सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को सही माना है।
यह फैसला सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने दिया है जिसके अगुआ मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकान्त हैं। इस पीठ ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) के पास सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करने का कोई अधिकार नहीं था। हालांकि डा. मनमोहन सिंह की मृत्यु दिसम्बर 2024 में हो चुकी है जिससे उनके खिलाफ चलाया जा रहा मुकदमा खुद ही अपनी मौत मर गया था, इसके बावजूद सर्वोच्च न्यायालय ने अन्तिम न्याय सुना कर उनकी विरासत को दोषपूर्ण होने से बचाया है। डा. मनमोहन सिंह का पक्ष रखने वाले देश के नामी वकील श्री कपिल सिब्बल व अभिषेक मनु सिंघवी ने साफ कहा कि मान्य सर्वोच्च अदालत को ट्रायल कोर्ट की डा. मनमोहन सिंह के खिलाफ की गई टिप्पणियों को भी रिकार्ड से हटा देना चाहिए।
न्याय मूर्तियों ने एेसा किया भी। कोयला घोटाले की गूंज संसद में हालांकि डा. मनमोहन सिंह के प्रथम कार्यकाल 2004 से 2009 के बीच भी संसद में हुई थी मगर इसने जोर दूसरे कार्यकाल में ही पकड़ा। इस कथित घोटाले में कोयला खदानों का आवंटन तो हो गया परन्तु उनसे कोयला बाहर नहीं निकाला गया था। जिससे जो भी कोयला था वह धरती के गर्भ में ही रहा। इसी वजह से बाद में लेखा महानियन्त्रक ने इसे सांकेतिक घाटा कहा। हालांकि यह मामला गूंज रहा था तो कांग्रेसी नेताओं व मन्त्रियों ने कहा था कि जब कोयला धरती के गर्भ में ही पड़ा रहा तो नुकसान कैसे हो गया ? मगर तब इस तर्क को स्वीकार नहीं किया गया था। मगर सीबीआई ने इस मामले में अपनी क्लोजर रिपोर्ट अक्तूबर 2014 में ही लगा दी थी। मगर तब ट्रायल कोर्ट के जज ने इस रिपोर्ट को बरतरफ करते हुए मार्च 2015 में डा. सिंह को अदालत में तलब कर लिया था। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने तब अप्रैल महीने में कोर्ट के सम्मन पर स्थगनादेश दे दिया था। डा. मनमोहन सिंह जो बहुत ही शरीफ, मृदु व अल्पभाषी थे, अक्सर कहा करते थे कि उनकी भूमिका का आकलन आने वाला इतिहास करेगा। उनके कार्यकाल में हुए जितने भी घोटालों का जिक्र हुआ उनमें से प्रायः कोई भी एक न्याय की कसौटी पर दोषपूर्ण साबित नहीं हो सका, इससे उनकी ईमानदारी का अन्दाजा तो लग ही जाता है। वैसे भी उनके प्रधानमन्त्री रहते हुए भी उनके आलोचक कहते थे कि वह खुद तो ईमानदार हैं मगर उनकी सरकार भ्रष्ट है।
डा. मनमोहन सिंह के ऊपर भरी संसद में भी गंभीर आरोप लगाये जाते थे और वह सभी आरोपों का जवाब बहुत शालीनता से देते थे। व गालिब के शेरों के दीवाने थे। एक बार तो उन्होंने शेर में ही कह दिया था कि सैकड़ों जवाबों से मेरी खामोशी बेहतर है। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि उनकी मृत्यु के बाद देश का सर्वोच्च न्यायालय उन्हें क्लीन चिट दे रहा है। इससे वर्तमान समय के राजनीतिज्ञों को सबक लेना चाहिए और अपने विरोधियों के खिलाफ अर्नगल आरोप लगने से बचना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि सत्ता में बैठे लोगों पर आरोप लगाना कितना सरल होता है।

Team Desk