खाड़ी युद्ध व घरेलू राजनीति

खाड़ी युद्ध

पश्चिम एशिया में ईरान-इजराइल व अमेरिका युद्ध के चलते पूरी दुनिया में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर जो संकट गहराता जा रहा है उससे अब भारत भी अछूता नहीं रहा है और देश ने ईंधन गैस के मोर्चे पर सतर्कता दिखानी शुरू कर दी है। इस सन्दर्भ में केन्द्र की मोदी सरकार ने आवश्यक उपभोक्ता सामग्री अधिनियम लागू कर दिया है जिसके चलते किसी भी जरूरी सामान की जमाखोरी या जखीरेबाजी नहीं की जा सकती। ऐसा करना इस कानून के तहत दंडनीय अपराध होता है। सरकार ने दो दिन पहले ही गैस ईंधन की किल्लत को देखते हुए इसकी कीमत में थोड़ा इजाफा भी किया था।

इससे समझा जा सकता है कि दुनिया के किसी भी कोने में छिड़े युद्ध के क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं। इसकी मूल वजह यह है कि विश्व के तमाम देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक- दूसरे से जुड़ने के बाद परस्पर निर्भरता के दौर में पहुंच चुकी हैं। यह परिवर्तन 1990 में विश्व व्यापार संगठन के मूर्त रूप में होने के बाद आया है। दुनिया के अधिसंख्य देश इस संगठन के सदस्य बन चुके हैं परन्तु अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के पुनः राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उनकी नीतियों से यह संगठन लगातार अप्रासंगिक होता नजर आ रहा है क्योंकि ट्रम्प ने द्विपक्षीय आधार पर विभिन्न देशों के साथ आपसी कारोबारी समझौते की झड़ी लगा रखी है जिसकी वजह से हर देश को अपने कारोबारी राष्ट्रीय हितों को साधने की फिक्र हो गई है।

मगर ट्रम्प ने अमेरिका को पुनः महान बनाने का जो राजनीतिक नारा दे रखा है उसकी वजह से पूरी दुनिया में स्थापित वह व्यवस्था लड़खड़ा रही है जिसका गठन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना के साथ हुआ था। इसके अनुसार दुनिया का हर छोटा- बड़ा देश एक-दूसरे की भौगोलिक संप्रभुता का सम्मान करेगा और अपनी ताकत के बूते पर किसी भी कमजोर देश की राष्ट्रीय अखंडता का उल्लंघन नहीं करेगा लेकिन हमने देखा है कि 1945 के बाद से भी दुनिया के विभिन्न देशों में युद्ध हुए हैं और संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा निर्धारित मानकों का हनन हुआ है।

हैरत करने वाली बात यह है कि कमोबेश रूप से इन सभी युद्धों में अमेरिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही है परन्तु 1990 से पहले सोवियत संघ के विघटन से पूर्व विश्व में दो महाशक्तियों सोवियत संघ व अमेरिका के बीच शक्ति सन्तुलन इस प्रकार रहता था कि दोनों ही दुनिया में अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार विश्व के विभिन्न देशों को अपने खेमों में लाने के प्रयास करते रहते थे। 1990 के बाद पूरा विश्व एक पक्षीय या एकल ध्रुवीय होता चला गया। अतः आज पूरे विश्व में जो शक्ति सन्तुलन है वह स्वाभाविक रूप से अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ नजर आता है।

ऐसे माहौल में ईरान के साथ पश्चिम एशिया में जो इजराइल व अमेरिका मिलकर युद्ध लड़ रहे हैं उससे पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता संकट में पड़ती नजर आ रही है जिसकी चपेट में अधिसंख्य खाड़ी व अरब देश आ चुके हैं क्योंकि लगभग इन सभी देशों में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति बहुत प्रभावी मानी जाती है। इसका कारण इन देशों की अपनी घरेलू राजनीतिक व शासकीय मजबूरियां मानी जाती हैं। इन सभी देशों की अर्थव्यवस्था पैट्रोलियम तेल के उत्पादन पर टिकी हुई है अतः ईरान-इजराइल युद्ध की चपेट में इन देशों के आ जाने के बाद सबसे बुरा असर पैट्रोलियम तेल की सप्लाई पर ही होना था।

भारत चुंकि अपनी तेल व गैस ऊर्जा की आवश्यकताओं की खपत 85 प्रतिशत आयात से ही करता है अतः इस मोर्चे पर इसे सतर्कता बरतनी ही थी। इस वातावरण में हमें देश की राजनीति की परख करनी होगी समझना होगा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र भारत को संसद से लेकर सड़क तक किस प्रकार के विमर्श के भीतर अपने राष्ट्रीय हितों को साधना चाहिए। फिलहाल संसद का सत्र चल रहा है और देश की विपक्षी पार्टियां चाहती हैं कि संसद के दोनों सदनों में पश्चिम एशियाई युद्ध को लेकर व्यापक बहस व चर्चा कराई जाये।

लोकतन्त्र में ऐसी मांग को खारिज भी नहीं किया जा सकता है परन्तु असली सवाल यह है कि ऐसे माहौल में देश के सभी राजनीतिक दलों का कर्त्तव्य क्या बनता है। यह कर्त्तव्य सर्वप्रथम राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने का होता है। हम मानते हैं कि भारत में जितने भी राजनैतिक दल हैं वे सभी राष्ट्र के विकास के लिए समर्पित हैं, बेशक इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उनके रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु सभी भारतीय संविधान के प्रति पूर्ण निष्ठावान रहते हुए सामाजिक व राष्ट्रीय उत्थान के पक्षधर होते हैं।

अतः संसद के भीतर इन सभी दलों में इस बात पर मतैक्य कायम क्यों नहीं हो सकता कि ईरान-इजराइल युद्ध के परिप्रेक्ष्य में भारत का एकाग्र नजरिया क्या हो जिससे भारतीय हित पूरी तरह संरक्षित रह सकें। हम देख रहे हैं कि इस युद्ध के चलते अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भावों में किस तरह का भूचाल आया हुआ है। विगत दिन ही कच्चे तेल के भाव 116 डॉलर प्रति बैरल तक जाने के बाद आज 88 डॉलर प्रति बैरल पर टिके परन्तु इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि भाव इसी स्तर पर स्थिर हो जायेंगे।

इसलिए यह बहुत जरूरी है कि ईरान-इजराइल युद्ध बहुत लम्बा न खिंचे और इसका अन्त जल्दी से जल्दी हो। इस सन्दर्भ में विदेश मन्त्री श्री एस. जयशंकर का कल संसद में दिया गया यह बयान महत्वपूर्ण है कि भारत हर मसले का हल शान्तिपूर्ण ढंग से वार्ता के माध्यम से चाहता है। यह स्वतन्त्रता के बाद से भारत की घोषित नीति है और वह मानता है कि किसी भी देश में किस प्रकार की सरकार हो इसका अधिकार केवल उस देश के लोगों का ही होता है। अतः पश्चिम एशिया के युद्ध में किसी एक पक्ष के खेमे में भारत के खड़े होने का सवाल ही पैदा नहीं होता लेकिन हालात के व्यावहारिक पक्ष का भी भारत को ख्याल रखना होगा और इस प्रकार अपनी रणनीति तय करनी होगी जिससे उसके राष्ट्रीय हितों पर किसी भी प्रकार से चोट न आये। इस मामले में सत्ता व विपक्ष को मिलकर ही काम करना होगा और अपने-अपने फौरी राजनीतिक हितों को ताक पर रखना होगा।

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