आज से संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू हो रहा है और देश घरेलू स्तर से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक विभिन्न राजनीतिक झंझावतों से घिरा हुआ लग रहा है। अतः बहुत स्वाभाविक है कि संसद सत्र की बैठकों में विपक्ष व सत्तारूढ़ दलों के बीच जमकर खींचातानी हो। लोकसभा में जहां इसके अध्यक्ष श्री ओम बिरला को पद से हटाने के प्रस्ताव पर आज सदन में लम्बी बहस होने के बाद मतदान हो, वहीं दूसरी तरफ राज्यसभा में विपक्ष पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान-इजराइल युद्ध से उपजे भारत को प्रभावित करने वाले सवालों को केन्द्र में लाए और सरकार को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास करे। इस सन्दर्भ में सबसे बड़ा सवाल भारत के प्रति अमेरिकी रुख को लेकर उठाया जा सकता है क्योंकि इस युद्ध में अमेरिका खुलकर इजराइल का साथ दे रहा है और जंग में बराबर का सहभागी है।
पिछले कुछ दिनों से पूरे देश में भारतीय संप्रभुता को लेकर खासी बहस इसलिए छिड़ी हुई है क्योंकि अमेरिका की तरफ से अाधिकारिक बयान जारी कर कहा गया है कि उसने भारत को रूस से कच्चा पैट्रोलियम तेल खरीदने के लिए 30 दिन की मोहलत दे दी है। यह मोहलत उसने पिछले दिनों भारत के साथ हुए व्यापार समझौते के मोटे मसौदे की शर्तों के अनुरूप दी है परन्तु इसके साथ यह भी हकीकत है कि भारत-अमेरिका के बीच अभी तक तफसील में कारोबार की शर्तों का चयन नहीं हुआ है और इस मोर्चे पर दोनों देशों के बीच बातचीत अभी होनी है। विपक्ष इसे भारत सरकार की कूटनीतिक व व्यापारिक असफलता बता रहा है और कह रहा है कि स्वतन्त्र भारत के इतिहास की यह अभूतपूर्व घटना है क्योंकि भारतीय हितों की नाप-जोख कोई दूसरा देश अमेरिका कर रहा है। दरअसल कूटनीतिक मोर्चे पर भारत बहुत सावधानी के साथ चलते हुए यह सिद्ध करना चाहता है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों का स्वयं संरक्षक है और अमेरिका को इस बारे में फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं है। इस सन्दर्भ में मोदी सरकार के मौन को विपक्ष कम करके आंकने की गलती कर रहा है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक कूटनीति को देखते हुए भारत शान्त रहते हुए अपने किये जा रहे कार्यों से उसका जवाब देना चाहता है इसीलिए सरकारी सूत्र बता रहे हैं कि भारत द्वारा रूस से लगातार कच्चा तेल खरीदा जा रहा है।
विगत 2 फरवरी को भारत व अमेरिका के बीच व्यापार समझौता होने की घोषणा वाशिंगटन से की गई थी जिसमें कहा गया था कि अब से भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा और यदि वह खरीदारी करता है तो अमेरिका उसके आयातित माल पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने के लिए स्वतन्त्र होगा। इसमें यह भी कहा गया था कि अमेरिका अपने विभिन्न मन्त्रालयों की एक निगरानी समिति बनाकर देखेगा कि भारत कहीं रूस से तेल तो नहीं खरीद रहा। अमेरिका के इस दावे की तस्दीक हमें इसके बाद भारत सरकार द्वारा किये गये फैसलों से करनी होगी क्योंकि कूटनीति में जरूरी नहीं होता कि ईंट का जवाब पत्थर से ही दिया जाये, बल्कि यह तय करना होता है कि अपने हितों को किस रास्ते से साधा जाये। यह रास्ता बिना आवाज निकाले अपने कामों का भी हो सकता है। अतः मोदी सरकार ने अमेरिका से बिना उलझे रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखा जिसे इकतरफा की गई अमेरिकी घोषणा के जवाब में देखा जाना चाहिए। इसके साथ दूसरा मसला हिन्द महासागर में ईरानी युद्ध पोत को अमेरिकी नौसैनिक पनडुब्बी द्वारा डुबोये जाने का है। यह युद्ध पोत भारत के निमन्त्रण पर विशाखापत्तनम में आयोजित विभिन्न देशों के संयुक्त नौसैनिक युद्धाभ्यास में भाग लेने आया था जो यह कार्यक्रम पूरा होने के बाद वापस अपने देश ईरान जा रहा था। अमेरिका ने ईरान के विरुद्ध चल रहे युद्ध के दौरान इसे नष्ट किया। यह युद्ध पोत श्रीलंका के पास हिन्द महासागर के अन्तर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र में था। बेशक अमेरिका का यह कार्य निश्चित रूप से निन्दनीय था क्योंकि ईरान-इजराइल युद्ध से हिन्द महासागर क्षेत्र अभी तक अछूता है। विपक्ष इस मुद्दे पर भी मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहा है परन्तु भारत ने ईरान के ही एक अन्य युद्धपोत को ही केरल के कोच्चि बन्दरगाह में लंगर डालने की इजाजत देकर अमेरिकी हिमाकत का अपने तरीके से जवाब दे दिया है। इस युद्धपोत में कुछ तकनीकी खराबी आ गई थी जिसकी वजह से ईरान ने भारत से विनय की थी कि वह उसे भारत में ठहरने की इजाजत दे जिससे युद्धपोत की खराबी दूर की जा सके। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के दौरान भारत के इस कदम का भी कमतर आंकलन नहीं किया जाना चाहिए।
दरअसल कूटनीति में यह भी नियम होता है कि अपने हितों को बिना आवाज किये भी साधो। भारत यदि यह रास्ता अपना रहा है तो इस पर क्यों हो-हल्ला किया जाये। हम जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के विश्व के सबसे शक्तिशाली देश होने की वजह से जिस तरह की नीतियां अपना रहे हैं उससे संयुक्त राष्ट्रसंघ से लेकर विश्व की अन्य बहुदेशीय पंचायतें अप्रासंगिक बन चुकी हैं अतः भारत को अपना रास्ता इन्हीं चट्टानी दरारों से होकर बनाना पड़ेगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार अमेरिका की नीतियों की वजह से पूरी दुनिया में भारी उथल- पुथल हो रही है और एेसा लग रहा है कि इसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पूरी विश्व व्यवस्था के क्रम को ही बदल कर रख देंगे। इसलिए भारत की संसद में जब बहस हो तो इस नई उभरती तस्वीर को भी सामने रखा जाये। क्योंकि पूरी दुनिया जानती है कि ईरान पर यह युद्ध तब थोपा गया है जबकि वह इस बात पर राजी हो गया था कि परमाणु बम बनाने की गरज से वह यूरेनियम का परिशोधन नहीं करेगा।


















