लाखों वर्षों में, करोड़ों पुरुषों में कोई एक वीर सावरकर जन्म लेता है। देवताओं द्वारा पृथ्वी पर बसाया हुआ पहला देश भारतवर्ष, उसमें भी मराठा वीरों का महाराष्ट्र, उसमें भी ज्योतिर्लिंग त्र्यंबकेश्वर, उसमें भी लक्ष्मण द्वारा नासिका छेदन से प्रसिद्ध नासिक, उसमें भी भगूर, और भगूर में भी चितपावन वंश के देवतुल्य विनायक दीक्षित और उनके पुत्र दामोदर का पवित्र घर, उसी घर में सूर्य का तेज लेकर 28 मई 1883 में ईश्वरीय शक्ति संपन्न एक बालक का जन्म हुआ। जिसका नाम दादा और पिता के नाम पर विनायक दामोदर रखा गया। सावरकर उनकी पारिवारिक पहचान थी, इसलिए इस भारत के भविष्य बालक का नाम विनायक दामोदर सावरकर प्रसिद्ध हुआ, जो आगे चलकर हिंदू हृदय सम्राट और राजनीति में हिंदू सूर्य बनकर इतिहास में चमके। वीर सावरकर नाम से ही देशप्रेम जाग उठता है।
इनके पिता दामोदर पंत अध्यापक और माता राधाबाई सनातन संस्कृति की साक्षात प्रतिमूर्ति थीं, जो परिवार की कुलदेवी की पूजा करते समय इस बालक को साथ रखतीं तो वे बचपन में ही पूजा करना सीख गए। इनके बड़े भाई का नाम गणेश सावरकर, छोटी बहन मैना और छोटे भाई नारायण सावरकर थे।
22 जनवरी 1901 में ब्रिटेन की रानी मर गई तो अंग्रेज भक्त भारतीयों ने देशभर में शोक सभा की, तो सावरकर ने कहा कि वह हमारे शत्रु देश की रानी थी। हम शोक क्यों मनाएं? उससे पहले जब महाराष्ट्र में लोग प्लेग और भुखमरी से मर रहे थे, उसी समय 22 जून 1897 में दो अंग्रेज अफसर रानी के राज की हीरक जयंती मना रहे थे। तब पुणे में उन दोनों को देखकर वासुदेव और बालकृष्ण चापेकर ने उनको यमराज के हवाले कर दिया। अंग्रेजी सत्ता ने 1899 में दोनों भाइयों को फांसी दे दी।
जब विनायक सावरकर को दोनों चाफेकर बंधुओं की फांसी का पता लगा, तो सावरकर के दिल में देशभक्ति का ज्वालामुखी जाग उठा और उन्होंने अपनी कुलदेवी के सामने प्रतिज्ञा ती कि मैं अपनी भारत माता को स्वतंत्र करवाऊंगा। उनकी प्रतिज्ञा सफल हुई, अंग्रेजी राज्य समाप्त हुआ। जब विनायक बी.ए. अंतिम वर्ष में पढ़ रहे थे, उन्होंने पुणे में 7.10.1905 में सबसे पहले विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर स्वतंत्रता संघर्ष का शंख बजा दिया।
ब्रिटेन पहुंचकर लंदन की लाइब्रेरी में विनायक ने ब्रिटिश सरकार के गुप्त पत्र पढ़े और मात्र एक वर्ष में 1857 का ‘क्रांति ग्रंथ लिखकर दुनिया को बता दिया कि भारत में 1857 का गदर नहीं, अपितु स्वतंत्रता संघर्ष था। ब्रिटेन में छपने नहीं दिया गया तो विदेशों में छपा। सावरकर का यह प्रथम क्रांति ग्रंथ था, जिस पर स्वतंत्रता संघर्ष की नींव पड़ी। नेता सुभाष ने आजाद हिंद फौज को यही ग्रंथ पढ़वाया। चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह के घर छापे में पुलिस को यही ग्रंथ मिलता था। भगत सिंह ने इसे छपवाकर बांटा था। 1909 में सावरकर को पता चला कि उनका एकमात्र पुत्र प्रभाकर संसार छोड़ गया है। ऐसे में पुत्र वियोग और पत्नी पर वज्रपात की पीड़ा को शिव बनकर विषपान किया और स्वतंत्रता के मार्ग पर बढ़ते रहे-कोई महामना ही विपत्ति में इतना धैर्य रख सकता है।
1 जुलाई 1909 को लंदन में मदनलाल ढींगरा ने कर्जन वायली को यमपुरी भेज दिया। 3 जुलाई को अंग्रेज-भक्त भारतीयों ने शोक सभा की, उसमें सर आगा खां ने कहा, ‘यह सभा इस हत्या के लिए ढींगरा की सर्वसम्मति से निंदा करती है। तभी भारतीय शेर सावरकर गरज उठे- एक्सेप्ट मी मुझे छोड़कर, क्योंकि मैं निंदा नहीं करता। अंग्रेजों के घर में अंग्रेजों की हत्या का भरी सभा में समर्थन करने वाले महामानव सावरकर एक वीर से बढ़कर महावीर थे।
21 दिसंबर 1909 में 16 वर्षीय कान्हेरे ने नासिक में कलेक्टर जैक्सन को मार डाला। वह पिस्टल लंदन से सावरकर ने भिजवाई थी। लंदन विक्टोरिया रेलवे स्टेशन पर 13 मार्च 1910 में सावरकर को गिरफ्तार करके 19 जून 1910 में मोरिया जहाज में बिठाकर सजा दिलवाने भारत के लिए रवाना कर दिया। 1 जुलाई 1910 में जहाज ब्रिटेन से आगे बढ़ा, 8 जुलाई 1910 को जहाज फ्रांस के बंदरगाह की ओर बढ़ रहा था तब सावरकर एक खिड़की को तोड़कर अथाह समुद्र में कूद गए। संसार में पहली बार किसी देशभक्त ने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए समुद्र में आजादी की जंप मारी। इससे पहले हनुमान जी ने माता सीता को बंधन मुक्त करने के लिए दूसरी बार सावरकर ने भारत माता को मुक्त करवाने हेतु समुद्र में छलांग लगाई।
भारत में लाकर सावरकर पर 15 दिसंबर 1910 में मुकदमा शुरू हुआ, मात्र 9 दिन में आजीवन कारावास की सजा 24.12.1910 में सुना दी गई। जैक्सन हत्याकांड में दूसरा मुकदमा 23 जनवरी 1911 से चला मात्र 7 दिन में 30 जनवरी को फिर आजीवन कैद की सजा सुना दी। कोई साधारण व्यक्ति होता तो दो जन्मों की सजा सुनकर बेहोश हो जाता, शायद फिर होश में न आता। परंतु दो जन्मों की सजा सुनकर भी महामानव वीर सावरकर हंसकर बोले- (इतिहासकार शिवकुमार गोयल पिलखुवा के अनुसार)-‘चलो, ईसाई सत्ता ने हिंदू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को तो मान लिया। इसीलिए सावरकर अति वीर महावीर थे।
4 जुलाई 1911 में सावरकर को कालापानी की कुख्यात काली जेल में प्रवेश करते ही जेलर ने कहा-वेल सावरकर, तुमको 50 वर्षों में हमारी हुकूमत छोड़ देगी। सावरकर ने पूछा-क्या तब तक तुम्हारी हुकूमत रहेगी। जेलर का मुंह उतर गया। क्रांतिवीर सावरकर ने जेल में 10 वर्षों तक बिना थके, बिना झुके, बिना रुके भारत माता की परिक्रमा समझकर कोल्हू चलाया।
सावरकार से अंग्रेस फिर डर गए, उन्हें 3 वर्ष कोलकाता जेल में रखा, फिर 6 जननरी 1924 में रत्नागिरी में नजरबंद कर दिया। वहां उन्होंने हिंदुत्व पर खूब लिखा, धर्मांतरण को रोका, शुद्धि आंदोलन को बढ़ावा दिया। अछूतोद्धार करते हुए उन्होंने उनके साथ बैठकर भोजन किया, उनके बच्चों को समारोह पूर्वक जनेऊ पहनाया, पर इसका श्रेय भी किसी और को दिया गया।
जब सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और पूरे भारत में यात्रा की, तो हिंदुओं में सोया हुआ हिंदुत्व जाग उठा। विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भारत में आते थे, तो वे बैरिस्टर सावरकर से अवश्य मिलते थे। उन्हें लगता था कि आजाद भारत में प्रजातंत्र सरकार वोट से ही बनेगी। भारत में हिंदुओं का बहुमत है हिंदुओं के सर्वमान्य नेता वीर सावरकर ही प्रधानमंत्री बनेंगे, इसलिए वे सावरकर से मिलते थे। बंटवारे से पहले के हिंदी के अखबार देख लें।
जब से भारत पर विदेशी आक्रांताओं ने हमले शुरू किए थे तभी से हिंदू अपने देश और धर्म को बचाने के लिए आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरु तेग बहादुर ने मुस्लिम आक्रांताओं से देश और धर्म को बचाने के लिए जो लड़ाइयां लड़ीं, वह भी आजादी की लड़ाई थी। देश माने हिमालय से समुद्र पर्यंत भारत माता का शरीर और धर्म माने आत्मा। जो हमले शुरू हुए थे, अंग्रेजों के जाते ही फिर शुरू हो गए। 1947 में भारत भूमि पर दो मुस्लिम देश बने, वह हिंदुओं के देश और धर्म पर आक्रमण ही था। विभाजन के बाद भी हिंदुओं पर हमले रुके नहीं हैं। कश्मीर के हिंदुओं पर पाकिस्तानी आतंक, संसद पर हमला, मुंबई पर हमला, काशी में हनुमान मंदिर पर, जयपुर में अनेक मंदिरों पर, गुजरात में कारसेवकों को जिंदा जलाना, उदयपुर में कन्हैया दर्जी की हत्या, होली पर दिल्ली में एक हिंदू की हत्या, लाल किले पर विस्फोट में निर्दोषों की हत्याएं, ये सब खुलकर बता रही हैं कि 712 ईस्वी से हिंदुओं के देश और धर्म पर जो मुस्लिम आक्रमण शुरू हुए थे, वे अभी भी जारी हैं।
वीर सावरकर का हिंदी-हिंदू-हिंदुस्थान की रक्षा के लिए त्याग तपस्या अभूतपूर्व है। तीनों सावरकर बंधु जेलों में रहे। तीनों की धर्मपत्नियां यशोदा, यमुना और शान्ता भी दृढ़ता से डटी रहीं। वीर सावरकर के बड़े भाई गणेश सावरकर का मार्च 1945 में सांगली में देहांत हो गया। वीर सावरकर की धर्मपत्नी यमुनाबाई का 76 वर्ष की आयु में 8.11.1963 को स्वर्गारोहण हुआ। 31 जनवरी 1948 को सावरकर ने गांधी भक्तों के हमले को विफल करते हुए सिद्ध कर दिया कि वे नाम और काम दोनों से वीर हैं। वीर सावरकर ने नेहरू द्वारा लियाकत को दिल्ली बुलाने का विरोध किया, तब नेहरू सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया और लियाकत के जाने के बाद उन्हें छोड़ा गया। फिर किसी अन्य मामले में उन्हें झूठे आरोप लगाकर एक वर्ष तक लालकिले में बंद रखा गया। सावरकर के बचपन में, जवानी में और बुढ़ापे में आई पीड़ाओं में भी अपने विचारों में हिमालय जितनी ऊंचाई और समुद्र जितनी गहराई एक महामानव की तरह बनाए रखी। 26 फरवरी 1966 में भारतवर्ष को अखंड हिंदू राष्ट्र बनाने का दायित्व नई पीढ़ी को सौंपकर 11:10 बजे, 83 वर्ष की आयु में भारत माता के चरणों में आत्मार्पण कर दिया।
श्रीनिवास शर्मा शास्त्री
वीर सावरकर विचार मंच रेवाड़ी, हरियाणा


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