शांति समझौते का भविष्य

Summary :

अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते का भविष्य 48 घंटों के भीतर ही खतरे में पड़ता दिखाई दिया। इजराइल के लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर लगातार हमलों से क्रुद्ध ईरान ने स्विट्जरलैंड में होने वाली पहले ही दौर की शांति वार्ता में भाग लेने से इंकार कर दिया और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से बंद कर दिया। होर्मुज बंद होने के बाद इस तरह की खबरें आ रही हैं कि इजराइल और लेबनान में युद्ध विराम लागू हो गया है लेकिन इजराइल ने रातभर लेबनान पर हमले जारी रखे। अमेरिका और ईरान में समझौता शांति और स्थिरता…

अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते का भविष्य 48 घंटों के भीतर ही खतरे में पड़ता दिखाई दिया। इजराइल के लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर लगातार हमलों से क्रुद्ध ईरान ने स्विट्जरलैंड में होने वाली पहले ही दौर की शांति वार्ता में भाग लेने से इंकार कर दिया और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से बंद कर दिया। होर्मुज बंद होने के बाद इस तरह की खबरें आ रही हैं कि इजराइल और लेबनान में युद्ध विराम लागू हो गया है लेकिन इजराइल ने रातभर लेबनान पर हमले जारी रखे। अमेरिका और ईरान में समझौता शांति और स्थिरता की कठिन राह पर पहला कदम है लेकिन इजराइल इस समझौते को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। इसका बड़ा कारण यह है कि सभी पक्षों में भरोसे की कमी है। क्या अमेरिका ने इजराइल को विश्वास में नहीं लिया था? डोनाल्ड ट्रम्प ने​ निर्धारित कार्यक्रम से एक दिन पहले ही हस्ताक्षर कर युद्ध से पीछा छुड़ा लिया है।
पश्चिम एशिया में अगर शांति की बजाय विध्वंस फिर से शुरू हुआ तो न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया के ​िलए बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। अमेरिका और इजराइल न ईरान में सत्ता परिवर्तन करा सके और न ही उसकी परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को पूरी तरह नष्ट कर पाए। अमेरिका ने जिन लक्ष्यों को लेकर युद्ध शुरू किया था, 108 दिन बाद उसकी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। अब शांति समझौते का लक्ष्य होर्मुज को खुलवाना और अपनी नाकेबंदी हटाना तथा ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत करना रहा। परायी जंग में खाड़ी देश भी अपने हाथ जलाने को तैयार नहीं हैं। अमेरिका को स्वयं खरबों का नुक्सान हो चुका है। इजराइल की आपत्ति के बावजूद ट्रम्प ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाया लेकिन नेतन्याहू समझौते को पलीता लगाने में तुले हुए हैं।
ईरान ने होर्मुज जलमार्ग खोलने पर सहमति जता दी थी और तेल टैंकर निकलने भी शुरू हो गए थे लेकिन इजराइली हमलों ने फिर तनाव पैदा कर दिया। ईरान के इस मार्ग की निगरानी का प्रभार सम्भाल रहे प्राधिकरण ने नए दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं, जिसमें सभी जहाज संचालकों को अपना पंजीकरण कराने को कहा गया है। इससे यह आशंका बढ़ गई है कि ईरान जहाजों से टोल वसूली की व्यवस्था शुरू कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो तेल आैर गैस परिवहन की लागत बढ़ जाएगी। अब ट्रम्प नेतन्याहू पर दबाव बना रहे हैं और उनका दबाव काम कर रहा है। दावा तो यही किया जा रहा है कि इजराइल अब लेबनान पर हमले नहीं करने को लेकर मान गया है। ट्रम्प नेतन्याहू को इस बात का अहसास दिला रहे हैं कि अमेरिकी समर्थन के ​बिना इजराइल कुछ भी नहीं। यह बात काफी हद तक सही भी है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शांति समझौते की आलोचना कर रहे हैं। इजराइली कैबिनेट मंत्रियों को फटकार भी लगाई है। वेंस ने तो यहां तक कह डाला कि​ इजराइल को दिए गए हथियारों में से दो-तिहाई अमेरिकी टैक्स पेयर्स के पैसों से बनाए और फंड किए गए हैं।
अमेरिका की गलती यही थी ​िक उन्होंने (इज़राइल की तरह) यह मान लिया था कि ईरानी परमाणु मुद्दे का सैन्य समाधान संभव है। वाशिंगटन ने ईरान के संकल्प, रणनीतिक गहराई और भौगोलिक लाभों को कम करके आंका। जैसा कि हेनरी किसिंजर ने कहा था, “गुरिल्ला तभी जीतता है जब वह हारता नहीं है”। ईरान ने यह युद्ध न हारकर जीता, जबकि सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रहने के कारण हार गया। परमाणु वार्ता फिर से शुरू होने वाली है, ऐसे में श्री ट्रम्प आज उस स्थिति से कमजोर हैं जो बराक ओबामा की 2013-15 में ईरान के साथ वार्ता के दौरान थी। फिर भी, वार्ता के माध्यम से समाधान की संभावना अभी भी बनी हुई है क्योंकि ईरान को दीर्घकालिक आर्थिक राहत की तत्काल आवश्यकता है। हालांकि, एक संभावित बाधक इज़राइल हो सकता है, जिसने कहा है कि वह कब्जे वाले दक्षिणी लेबनान से पीछे नहीं हटेगा। ईरान और अमेरिका को अपने-अपने सहयोगी हिजबुल्लाह और इज़राइल पर लगाम लगानी चाहिए। तेहरान को इस प्रकिया में विश्वास जगाने के लिए भी कदम उठाने चाहिए।
इजराइल को यह बात समझनी होगी कि सिर्फ लोगाें को मार कर ही वह अपनी सुरक्षा नहीं कर सकता। अमेरिका में भी समीकरण बदल रहे हैं। अमेरिका और दुनियाभर में उसके कई दोस्तों के बीच उसके प्रति नाराजगी और अस्वीकृति बढ़ी है। इजराइल ने गाजा में जो नरसंहार किया है उसको लेकर भी काफी आक्रोश है। शांति समझौता सभी पक्षों के लिए एक दुर्लभ मौका है​ कि वे शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए हार और जीत की तलाश बंद करें और अगले 60 दिनों में लगातार वार्ता कर उसे अंजाम तक पहुंचाएं। इसके लिए जरूरी है कि अमेरिका नेतन्याहू पर नकेल डाले। अगर इजराइल शांति समझौते का सम्मान नहीं करता तो भविष्य की राह आसान नहीं होगी और दुनिया को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

Aditya Chopra

Aditya Chopra is well known for his phenomenal viral articles.