मौसम की मार ने कम की चीनी की मिठास

Summary :

भारत में त्यौहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही रसोई का बजट बिगड़ गया है। इस साल चीनी की कीमतों में अचानक आए भारी उछाल ने आम जनता और व्यापारियों की चिंता बढ़ा दी है। त्यौहारी महीनों में जब घरों और बाजारों में मिठाइयों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तब चीनी के महंगे होने से हर तरफ मायूसी छा गई है। इस मुद्दे पर राजनीति शुरू हो चुकी है। औसतन देश में चीनी की खपत 2.6 करोड़ टन से 2.8 करोड़ टन के बीच रहती है और आम तौर पर साल के अंत में 60 से 70 लाख टन…

भारत में त्यौहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही रसोई का बजट बिगड़ गया है। इस साल चीनी की कीमतों में अचानक आए भारी उछाल ने आम जनता और व्यापारियों की चिंता बढ़ा दी है। त्यौहारी महीनों में जब घरों और बाजारों में मिठाइयों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तब चीनी के महंगे होने से हर तरफ मायूसी छा गई है। इस मुद्दे पर राजनीति शुरू हो चुकी है। औसतन देश में चीनी की खपत 2.6 करोड़ टन से 2.8 करोड़ टन के बीच रहती है और आम तौर पर साल के अंत में 60 से 70 लाख टन चीनी एंडिंग स्टॉक यानी बचा हुआ भंडार के रूप में रह जाती है।

चीनी की बढ़ी कीमतों और राजनीति के बीच सवाल ये है कि चीनी इतनी महंगी क्यों हो रही है? क्या इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने का इस्तेमाल इसकी सबसे बड़ी वजह है, या कमजोर मौसम, घटता स्टॉक और त्यौहारी सीजन में बढ़ती मांग भी इसके पीछे जिम्मेदार हैं? और सबसे अहम सवाल ये है कि सरकार के इस फैसले के बाद आम लोगों को चीनी की कीमतों में राहत कब और कितनी मिलेगी? चीनी की कीमतों में बढ़ाैतरी की वजह जमाखोरी और सप्लाई में कमी की चिंता को माना जा रहा है। ऐसा कुछ राज्यों में बाढ़ और कुछ अन्य राज्यों में कम बारिश के कारण गन्ने की फसल खराब होने के चलते हुआ है।

ऐसी घटनाएं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में हुई हैं। भारत में चीनी का उत्पादन वर्ष अक्तूबर से शुरू होकर अगले साल सितंबर में समाप्त होता है। इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईएसएमए) की वेबसाइट के मुताबिक, भारत में हर साल औसतन 55 लाख से 60 लाख हैक्टेयर में गन्ने की खेती होती है। औसतन 45 करोड़ टन गन्ने का उत्पादन होता है और इससे करीब पांच करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है।

चीनी मिलों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था नेशनल फेडरेशन ऑफ को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड का कहना है कि 2025-26 के चीनी वर्ष में देश में चीनी उत्पादन 3.2 करोड़ टन रहने का अनुमान था लेकिन वास्तव में यह क़रीब 3 करोड़ टन ही रहा। सरकार ने उत्पादन में इस कमी की वजह गन्ने में लगने वाली ‘रेड रॉट’ और ‘टॉप बोरर’ बीमारियों के साथ-साथ अधिक बारिश से खेतों में पानी भरने को बताया है। चीनी की महंगाई सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। 2026-27 में वैश्विक चीनी बाजार में करीब 33 लाख टन की कमी का अनुमान है।

इसी वजह से अंतर्राष्ट्रीय चीनी कीमत 30 जून के 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त को 552 डॉलर प्रति टन हो गई। चीनी उत्पादन पर मौसम का असर भी लगातार बढ़ रहा है। ब्राजील के मध्य और दक्षिणी हिस्सों में बारिश में देरी और बढ़ते तापमान ने गन्ने की फसल को प्रभावित किया है। भारत और थाईलैंड जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में भी मौसम को लेकर चिंता बनी हुई है। अल नीनो के चलते कुछ क्षेत्रों में बारिश कम होने की आशंका है जिससे आने वाले समय में उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है।

मौसम विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के कम से कम 35 जिलों में बारिश की कमी रही, जिनमें गन्ना उत्पादन करने वाले कई प्रमुख जिले भी शामिल हैं। उत्तर प्रदेश गन्ने का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। महाराष्ट्र के कई प्रमुख गन्ना उत्पादक जिलों में 21 अगस्त तक बारिश की कमी रही है। यह राज्य भारत में गन्ने का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। गन्ने का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक राज्य, कर्नाटक में इस साल सामान्य से 22 प्रतिशत कम बारिश हुई है।

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने पैट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए चीनी को इथेनॉल बनाने की तरफ मोड़ने को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि, आंकड़ों से पता चलता है कि कुल चीनी उत्पादन में उतार-चढ़ाव के बावजूद, इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी का आवंटन काफी हद तक स्थिर रहा है। सरकार ने 21 अगस्त को कहा कि 2025-26 में देश में उत्पादित कुल चीनी का लगभग 9 प्रतिशत इथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया गया है। साथ ही, सरकार ने यह भी बताया कि देश में उत्पादित एथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्के से आता है।

निस्संदेह, यह परिदृश्य सरकार के लिये उसकी महत्वाकांक्षी इथेनॉल नीति की असलियत को समझने का एक अवसर भी है। पूरे देश में इथेनॉल मिश्रित ई-20 पैट्रोल की बिक्री व्यवस्था लागू करने का जश्न मनाने के दो साल से भी कम समय में सरकार अब दो परस्पर विरोधी जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। वहीं दूसरी ओर सरकार की इस अभिनव पहल से जहां एक ओर चीनी मिलों को सहारा मिला है,वहीं गन्ना किसानों के लिए कमाई का एक अतिरिक्त जरिया भी बना है। निश्चित रूप से उस देश के लिये यह एक उपलब्धि ही कही जा सकती है जो अपनी जरूरतों के लिये 85 फीसदी कच्चे तेल का आयात करता रहा है।

वह भी अपने देश में उपलब्ध वैकल्पिक संसाधनों के जरिये। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि गन्ना भारत में सबसे ज्यादा पानी की खपत करने वाली फसलों में से एक है। वहीं दूसरी ओर इथेनॉल के उत्पादन के लिये गन्ने का इस्तेमाल ऐसे समय में शुरू हुआ है जब देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में शुमार महाराष्ट्र और कर्नाटक में पैदावार खराब मौसम और गन्ने की फसल पर लगी बीमारियों के चलते कमजोर रही है। यह भी एक वजह है कि गन्ना आपूर्ति में आई कमी के चलते भी हाल के दिनों में चीनी की कीमतों में तेजी देखी गई है।

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 के चीनी वर्ष में 30 लाख टन चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने के लिए किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक यह देश में चीनी के कुल उत्पादन का करीब 10 फीसदी है। ऐसे में मौजूदा तेजी को सिर्फ एथेनॉल से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे इथेनॉल के लिए गन्ने का डायवर्जन, मौसम की मार से उत्पादन पर चिंता, शुरुआती स्टॉक में कमी और त्यौहारी सीजन में बढ़ने वाली मांग की आशंका,इन सभी का मिलाजुला असर है। यह आरोप लगाना आसान है कि सरकार ने इथेनॉल के उत्पादन के लिए चीनी को डायवर्ट होने से नहीं रोका।

लेकिन यहां यह याद रखना ज़रूरी है कि चीनी उत्पादन के शुरुआती अनुमान काफी ज़्यादा थे। समस्या यह है कि गन्ने और चीनी के उत्पादन का सटीक अनुमान लगाने के लिए हमारे पास कोई सटीक तरीका या तकनीक उपलब्ध नहीं है।

Team Desk