चंडीगढ़ : पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने मंगलवार को प्रेस क्लब मेें पत्रकारो को संबोधि करते हुए कहा उन्हें गर्व है कि उनके पिता ने कभी पत्रकारिता का धर्म नहीं बेचा। 16 साल से अधिक सभी सरकारें डेरा प्रमुख के सामने सिर झुकाती रही और डेरा प्रमुख की ताकत बढ़ती गई, मगर हमारी सच्चाई भी मजबूत होती गई। झूठ बेशक कुछ समय के लिए हावी हो जाए लेकिन सच्चाई सामने आकर ही रहती है।
अंशुल छत्रपति ने कहा राजनीतिक लोग अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए डेरा प्रमुख को क्लीन चिट दिलाना चाहते थे। नेताओं के क्लीन चिट दिलाने की होड़ लगी हुई थी। सत्ताधारी पार्टियों का पलड़ा राम रहीम की तरफ झुकता रहा। 2002 में ओपी चौटाला रामचंद्र छत्रपति के घर भी आए और अपराधियों को सजा देने की कही थी, लेकिन पुलिस की कार्रवाई को देखा तो लगा कि राजनीतिक दबाव में ही पुलिस काम कर रही थी।
अंशुल ने कहा इस लडाई मे मैं अकेला नही था बहुत से सच्चाई का साथ देने के लिए मेरे साथ रहे अगर मैं उनका नाम लेना शुरू करूं तो लिस्ट बहुत बडी हो जाएगी। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के अंदर हमारा केस लडा, और भी बहुत लोग हमारे साथ थे बहुत लंबी लिस्ट है अगर मै नाम गिनवाने लगूं तो नही बोल सकूंगा। कुछ लोग ऐसे थे जो हमारे साथ अंग संग रहे। अंशुल छत्रपति ने कहा कि मेरे पिता जी जो काम अधूरा छोड गए उसे पूरा करना है।
अंशुल छत्रपति ने कहा हमारा डेरे के साथ कोई मेल नही था। जो सरकारे थे वह सिर झुकाती रही। इन 16 सालो के अंदर बहुत ही उतार चढाव आए, राजनीतिक लोग अपनी रोटियां सेक रहे थे एक दो लोग नही बहुत सारे लोग थे। 16 साल बाद जब 11 जनवरी को फैसला सुनाया गया तो हम बहुत भावुक हो गए थे कि कितने लोगो ने चालें चली लेकिन छत्रपति की जीत हुई, हमे सुकून है कि हम न्याय की लडाई जीत गए।
पाखंड के जितने भी अड्ढे है अगर मीडिया ने अपनी भूमिका पहले निभाई होती तो छत्रपति हमारे बीच होते लेकिन देर आए दुरूस्त आए। 2017 के बाद डेरा सच्चा सौदा को देश के मीडिया ने एक्सपोस करना शुरू किया उससे लगा कि मीडिया बहुत बडी ताकत है। डेराप्रमुख जिन्हे लगता था कि सब कुछ हमारे हाथ मे है अगर मीडिया अपनी जिम्मेदारी पहले निभाता तो यह इंसाफ हमे बहुत पहला मिल जाता। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अंशुल छत्रपति ने कहा कि हमारे ईमान को डेरे के लोग खरीद नहीं पाए।
मई 2002 में गुमनाम चिट्टी आई, जिसमें डेरे में साध्वियों के साथ जो हो रहा था उसके बारे में लिखा था। इस पत्र को जब अखबार में छापा गया तो इसके बाद धमकियां भी मिली मगर उन्होंने सच्चाई की राह नहीं छोड़ी। 24 अक्टूबर को रामचंद्र छत्रपति को डेरे के गुर्गों ने पांच गोलियां मारीं। 28 दिन हॉस्पिटल में रहने के बाद 21 नवम्बर को उन्होंने दम तोड़ दिया।
(आहूजा)


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