Best Poetry Book : संवेदनाओं, अनुभवों और जीवन-दर्शन की गहराइयों को शब्दों में पिरोती ‘सांझे लमहों की महक’ महज एक कविता-संकलन नहीं, बल्कि आत्ममंथन की एक सजीव यात्रा बनकर सामने आती है।
1996 बैच के एजीएमयूटी कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी एवं वर्तमान में गोवा के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) आलोक कुमार की यह कृति उनके संवेदनशील और चिंतनशील व्यक्तित्व का विस्तार है, जिसमें जीवन के अनेक रंग विचार, प्रकृति और प्रेम एक साथ सांस लेते दिखाई देते हैं।
76 कविताओं का संकलन
बिहार के बेगूसराय जिले में जन्मे और दिल्ली विश्वविद्यालय से विधि शिक्षा प्राप्त आलोक कुमार ने अपनी व्यस्त प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच, कभी भोर की शांति में, कभी शाम की उदासी में तो कभी यात्राओं के एकांत में इन कविताओं को आकार दिया है।
76 कविताओं में विभाजित यह संकलन तीन खंडों के माध्यम से जीवन के विविध आयामों को छूता है, जहां सजग और अवचेतन मन के द्वंद्व, रिश्तों की सूक्ष्म जटिलताएं और मानवीय भावनाओं की गहराई सहज भाषा में उभरती है।
‘पगडंडी’ जैसी कविताएं स्नेह और वर्जना के बीच की महीन रेखाओं को प्रतीकात्मक ढंग से सामने लाती हैं, तो अन्य रचनाएं पाठक को भीतर झांकने और स्वयं से संवाद करने के लिए प्रेरित करती हैं। यह कृति अंततः उस अनुभूति तक ले जाती है, जहां शब्दों के पार भी बहुत कुछ महसूस किया जा सकता है।
मानसिक स्थिति का आईना कविता

उनकी कविता ‘कभी देखी है जंगल में हिरण’, चौकन्नी, देखती सभीत आँखों से, हर आहट में छुपे डर के इन्तज़ार में यूँ उम्र गुजार देती है हिरणी, ऐसे ही हज़ारों डर के साये में हम छोड़ देते हैं जीना बस गिनते रहते हैं उम्र।
यह कविता बताती है कि कैसे डर इंसान को धीरे-धीरे जकड़ लेता है और वह जीना भूलकर सिर्फ समय बिताने लगता है। यह सिर्फ एक दृश्य नहीं, बल्कि आज के समाज की मानसिक स्थिति का आईना बन जाती है। इसी तरह “कस्तूरी मृग” कविता जीवन की उस तलाश को सामने लाती है, जो हर इंसान के भीतर चलती रहती है।
सुकून और संतोष को लेकर कविता
साझे लमहों की महक, रिसती है प्राणों में धीरे-धीरे, और मैं कस्तूरी मृग-सा भटकता रहता हूँ, उस महक की तलाश में, विचलित, व्यथित, वंचित, क्यूँ नहीं सौंप पाता अपनी वेदना विश्व वेदना को कि लो अब अन्दर सब शून्य है और स्नेह, वेदना, उल्लास, सब हो जायें निर्वैयक्तिक।
यह कविता संकेत देती है कि जिस सुकून और संतोष की तलाश हम बाहर करते हैं, वह दरअसल हमारे भीतर ही मौजूद होता है। वहीं “नए जूते” कविता एक साधारण घटना से गहरी बात कह जाती है। वह दौड़ रहा था नये जूते में, जिनकी अकड़ साफ़ सुनाई दे रही थी, हर बार धरती पर गिरते बेरहम क़दमों में, धरती की सिसकियों से अनजान, पैर और जूते बदलते रहते हैं, पर धरती पर गिरने की अकड़ बनी रहती है।
यह कविता इंसान के अहंकार और संवेदनहीनता को उजागर करती है, जहां बाहरी बदलाव तो होते रहते हैं, लेकिन भीतर की कठोरता जस की तस बनी रहती है। कुल मिलाकर ‘साझे लमहों की महक’ एक ऐसी किताब है, जो पाठक को रुककर सोचने, महसूस करने और खुद से जुड़ने का मौका देती है। यह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों की एक संवेदनशील यात्रा है, जो हर पाठक को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है।
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