Mohan Bhagwat on Iran War : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने आज 20 मार्च को नागपुर में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वैश्विक शांति को लेकर महत्वपूर्ण विचार रखे। वे विश्व हिंदू परिषद के कार्यालय की आधारशिला रखने के बाद सभा को संबोधित कर रहे थे। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि युद्ध स्वार्थ का परिणाम है और आज दुनिया को संघर्ष की नहीं बल्कि समन्वय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा से मानवता के धर्म का पालन करता आया है, जबकि अन्य लोग केवल शक्तिशाली के जीवित रहने के सिद्धांत में विश्वास करते हैं।
संघर्षों की जड़ में स्वार्थ और श्रेष्ठता की सोच
भागवत ने कहा कि पिछले दो हजार वर्षों में दुनिया ने संघर्षों को खत्म करने के लिए कई विचारधाराओं और प्रयोगों को अपनाया, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। उन्होंने बताया कि आज भी धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्म परिवर्तन और श्रेष्ठता-हीनता की मानसिकता जैसी समस्याएं बनी हुई हैं, जो टकराव को बढ़ावा देती हैं। उनके अनुसार, जब तक इन मूल कारणों को खत्म नहीं किया जाएगा, तब तक स्थायी शांति संभव नहीं है।
भारतीय परंपरा दिखा सकती है रास्ता
संघ प्रमुख ने कहा भारत मानवता में विश्वास रखता है। जबकि दूसरे अस्तित्व के संघर्ष और योग्यताम की उत्तरजीविता में विश्वास रखते हैं। उन्होंने कहा “दुनिया को सद्भाव की जरूरत है, संघर्ष की नहीं। दुनिया विनाश के कगार पर है। युद्ध के बीच बार बार, भारत की इसके समाप्त कर सकता है। क्योंकि भारत की प्रवृति का ज्ञान विश्व को है।”
धर्म सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं होना चाहिए
भागवत ने स्पष्ट किया कि धर्म का असली अर्थ केवल शास्त्रों में पढ़ना नहीं, बल्कि उसे व्यवहार में उतारना है। उन्होंने कहा कि अगर धर्म जीवन में दिखाई नहीं देता, तो उसका कोई वास्तविक महत्व नहीं रह जाता। अनुशासन, नैतिकता और मूल्यों का पालन निरंतर अभ्यास से ही संभव है, भले ही इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर कठिनाइयों का सामना करना पड़े।
उन्होंने अपने सम्बोधन में कहा, विश्व अभी लड़खड़ा रहा है सारी परिस्थितियां हमारे सामने हैं। युद्ध होने के पीछे असली वजह स्वार्थ है। वर्चस्व की कलह है, मूल में स्वार्थ प्रवर्ती है।’
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