राजस्थान अपनी संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां के रहन-सहन से लेकर यहां का खाना वर्ल्ड फेमस है। इस इलाके का इतिहास भी सदियों पुराना है। राजस्थान के मेलों की भी दुनियाभर में अलग पहचान है और हर खास मौके पर यहां पर अलग-अलग मेलों का आयोजन किया जाता है। आज तक आपने इंसानों के लिए लगने वाले मेलों के बारे में तो बहुत सुना होगा लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मेले के बारे में बताने वाले है जो खासतौर पर भूतों के लिए लगाया जाता है।

जी हां, उदयपुर संभाग के चित्तौड़ दुर्ग में दीवाली की रात लगने वाले मेले में इंसानों के आने पर पांबदी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि दीवाली रात को यहां पर खासतौर पर भूतों के लिए मेले का आयोजन किया जाता है। भूतों के इस खास मेले के बारे में लोक कलाविद डॉक्टर महेंद्र भाणावत ने अपनी किताब ‘अजूबा भारत’ में जिक्र किया है और इसके बारे में कुछ रोचक बातें भी बताई है।

अजूबा भारत के लेखक डॉक्टर महेंद्र भाणावत ने बताया कि तीसरा साका या तीसरे जौहर के बाद 1700 विक्रम संवत के बाद इस मेले के शुरुआत हुई थी। तब लेकर अब तक लगातार इस मेले का आयोजन होता आ रहा है। इस मेले में वो आत्माएं शामिल होती हैं जो युद्ध के दौरान शहीद हुए थे।

इसलिए इस दिन को इन भूतों के मेल-मिलाप का दिन माना जाता है और इसी वजह से इस मेले में जिंदा इंसानों के आने पर बैन है। अभी तक ये मेला उन चुनिंदा लोगों ने देखा है जिन पर लोकदेवता कल्लाजी बावजी का आशीर्वाद रहा है। उनकी मेहरबानी से ही डॉ. महेंद्र भाणावत ने ये मेला देखा था। इस मेले में बकायदा मिठाइयों, फलों और नमकीन की खास दुकानें सजती है।

डॉ. महेंद्र भाणावत के मुताबिक ये एक काल्पनिक मेला है और उन्होंने मेले में आत्माओं को महसूस किया है। उदयपुर का चित्तौड़ दुर्ग का नाम दुनियाभर में शान और गर्व से लिया जाता है क्योंकि यहां की रानी पद्मावती का जौहर के साथ ही अन्य 17 जौहर की कहानियां भी इतिहास के पन्नों में अमर है। रानी पद्मावती पर तो बॉलीवुड में फिल्म भी बन चुकी है।


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