हाशिये पर महाशक्ति

Summary :

अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद से ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार परस्पर विरोधी बयानबाजी करते आए हैं और उनके बयानों से युद्ध के बारे में उनके द्वारा कही गई किसी भी बात को गम्भीरता से लेना जटिल हो चुका है। इस युद्ध में ट्रम्प पूरी तरह अकेले पड़ गए हैं। उनके दोस्तों ने ही ट्रम्प को हाशिये पर धकेल दिया है। युद्ध के 34वें दिन डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने देशवासियों को 20 मिनट के सम्बोधन में जो कुछ भी कहा उसका अर्थ केवल यही निकलता है कि उन्होंने युद्ध के खिलाफ सड़कों पर उतरी अमेरिकी जनता…

अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद से ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार परस्पर विरोधी बयानबाजी करते आए हैं और उनके बयानों से युद्ध के बारे में उनके द्वारा कही गई किसी भी बात को गम्भीरता से लेना जटिल हो चुका है। इस युद्ध में ट्रम्प पूरी तरह अकेले पड़ गए हैं। उनके दोस्तों ने ही ट्रम्प को हाशिये पर धकेल दिया है। युद्ध के 34वें दिन डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने देशवासियों को 20 मिनट के सम्बोधन में जो कुछ भी कहा उसका अर्थ केवल यही निकलता है कि उन्होंने युद्ध के खिलाफ सड़कों पर उतरी अमेरिकी जनता को आश्वस्त करने की कोशिश की है कि 2-3 हफ्ते संकट के दिन रहेंगे, थोड़ा सा पेन होगा बाद में अमेरिका को काफी गेन होगा। ट्रम्प इस समय अपने ही देश में पूरी तरह से घिरे हुए हैं। उनके खिलाफ नो किंग्स बैनर वाले विरोध प्रदर्शन किए गए हैं। अमेरिका के 50 राज्यों से 3500 से अधिक स्थानों पर करीब 80 लाख लोग सड़कों पर उतरे हैं और ट्रम्प का इस्तीफा मांग रहे हैं। यह विरोध प्रदर्शन ट्रम्प के अधिनायकवाद के खिलाफ है और ब्रिटेन यूरोप तक फैल गए हैं। युद्ध दूसरे महीने में प्रवेश कर गया है और एक माह के युद्ध में ही अमेरिका को करीब 40 हजार करोड़ का नुक्सान हो चुका है।
एक राजनीतिज्ञ के तौर पर ट्रम्प की पहली प्राथमिकता घरेलू राजनीति और अपना वोट बैंक है। अपने सम्बोधन में उन्होंने अपनी पीठ थपथपाते हुए जनता को भरोसा दिलाया है कि इस युद्ध का बोझ उन पर नहीं पड़ेगा। ट्रम्प की ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से तहस-नहस करने के बयान के गहरे अर्थ निकाले जा रहे हैं। इसका अर्थ यही है कि आने वाले दिनों में अमेरिका ईरान में उसके परमाणु ठिकानों पर या तो भीषण हमले करेगा या फिर उसके संवर्द्धित यूरेनियम को हासिल करने के लिए जमीनी ऑपरेशन करेगा। ट्रम्प के संदेश से साफ है कि जंग अभी खत्म नहीं हुई बल्कि यह आैर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है। अपने सम्बोधन में ट्रम्प ने होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी बड़ा बयान दिया है। उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें होर्मुज स्ट्रेट की जरूरत नहीं है। उन्होंने अमेरिका का साथ नहीं देने वाले देशों को गद्दार तक कह डाला और दावा किया कि जैसे ही संघर्ष खत्म होगा होर्मुज अपने आप खुल जाएगा। पहले उन्होंने यह कहा था ​िक ईरान का तेल उनकी पहली पसंद है और वह ईरान के तेल भंडार वाले खार्ग द्वीप पर कब्जा करके उसकी कमर तोड़ देंगे लेकिन अब उन्होंने कहा है कि उनकी ईरान के तेल में कोई रुचि नहीं। वह ईरान के परमाणु हथियार हासिल करने की क्षमता को पूरी तरह से खत्म करना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि युद्ध में अमेरिका और इजराइल के अपने-अपने गोल (लक्ष्य) हाे गए हैं। यही कारण है कि ट्रम्प के लिए इस जंग से बाहर निकलने का कोई आसान रास्ता नजर नहीं आ रहा। अमेरिका आैर इजराइल न तो ईरान में सत्ता परिवर्तन करने में कामयाब हुए हैं और न ही ईरान की आक्रामकता को कम कर पाए हैं।
सवाल यह भी है कि ट्रम्प और नेतन्याहू की गुंडागर्दी को समूचा विश्व क्यों सहन करे। यूरोप, एशिया, अफ्रीका, लेटिन अमेरिका के देश इस युद्ध से प्रभावित हो रहे हैं। ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य अमेरिका के मित्र देश भी अब इस युद्ध से किनारा कर चुके हैं। होर्मुज स्ट्रेट पर ट्रम्प की बयानबाजी उनकी पराजय का ही संकेत मानी जा रही है। होर्मुज जलमार्ग पर ईरान का नियंत्रण खत्म करने में अमेरिका को भारी-भरकम नुक्सान होने की आशंका है। खाड़ी देशों में पहले अमेरिका की सैन्य मौजूदगी काफी मजबूत थी। आज खाड़ी क्षेत्र में स्थित अधिकांश अमेरिकी सैन्य अड्डे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या ने परमाणु बम के खिलाफ उनके फतवे को अमान्य कर दिया और वहां की संसद अब परमाणु अप्रसार संधि से हटने पर विचार कर रही है। इस जंग से पहले कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से कम थीं लेकिन अब ये कीमतें 114 डॉलर प्रति बैरल के आसपास घुमड़ रही हैं। भारी प्रतिबंधों के तले दबा ईरान, युद्धकालीन प्रतिबंधों में ढील के चलते अब ज्यादा धन कमा रहा है। अमेरिका के लिए यह जंग पहले ही एक आफत बन चुकी है और ट्रम्प जमीनी सैनिकों को भेजकर इसे और भी बदतर बना देंगे। अमेरिका ने बड़े पैमाने पर जमीनी हमले शुरू करने के लिए पर्याप्त लड़ाकू सैनिकों को जुटाया नहीं है। कई लोगों का तर्क है कि अमेरिका दबाव बनाने के लिए खाड़ी में कुछ द्वीपों पर कब्जा करने की कोशिश कर सकता है, लेकिन कोई भी हमला सैनिकों और दुनिया की अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए बेहद जोखिम भरा साबित होगा। ईरान के नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमला करने की धमकी समेत ट्रम्प की तमाम भड़काऊ बयानबाजियां सिर्फ उनकी हताशा को ही रेखांकित करती है।
अगर ट्रम्प ईरान में ग्राउंड आॅपरेशन शुरू करते हैं तो युद्ध बहुत लम्बा चलने के आसार बन जाएंगे। जमीनी लड़ाई में आज तक अमेरिका न तो ​िवयतनाम में जीत पाया न ही अफगानिस्तान में जीत पाया। ईरान के कब्रिस्तान बनाने के उनके इरादे अमेरिकी फौजियों के लिए भयानक साबित हो सकते हैं। पेंटागन ने भी ट्रम्प को जमीनी युद्ध के परिणामों के बारे में आगाह कर दिया है। ईरान की सेना अमेरिकी फौजियों को बंधक बना सकती है। ट्रम्प ने जिस गड्ढे में खुद को फंसा लिया है, अगर वह उसमें ज्यादा धंसे तो उनके बाहर निकलने का रास्ता नहीं बचेगा। बेहतर यही होगा कि यूरोपीय और नाटो देश एकजुट होकर ईरान से संवाद कायम करें और होर्मुज स्ट्रेट खुलवाने के ​िलए कूटनीति से काम लें। अन्यथा समूची दुनिया को बहुत नुक्सान होगा।

Aditya Chopra

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